भारत की अर्थव्यवस्था लगातार बदलावों और नीतिगत निर्णयों के बीच आगे बढ़ रही है। हाल ही में जारी एक प्रमुख आर्थिक आकलन में देश की विकास दर में एक महत्वपूर्ण उछाल की बात सामने आई है। यह उछाल किसी सामान्य वृद्धि का संकेत नहीं है बल्कि भारतीय आर्थिक ढांचे में हुए परिवर्तन, नीतिगत निर्णयों की सटीकता और बाजार में सुधरते संकेतों का परिणाम माना जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में आने वाली तिमाहियों में ब्याज दरों में राहत की संभावना भी बढ़ी है। इससे बाजार में उधारी सस्ती होने की उम्मीद है, जिसका लाभ व्यवसाय, आम निवेशक और उद्योग जगत सभी को हो सकता है।

भारतीय सेवा क्षेत्र, उपभोग खर्च, ग्रामीण मांग और सरकारी पूंजी निवेश ने इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले वित्तीय वर्षों में जहां कई देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट और मंदी का असर दिखाई दिया, वहीं भारत ने अपेक्षाकृत अधिक मजबूत स्थिति बनाई। वैश्विक स्तर पर गिरावट, युद्ध, क्रूड आयल की ऊंची कीमत और भू-राजनैतिक अनिश्चितता के बावजूद भारत ने अपने विकास संकेतक को स्थिर रखा।
विकास दर में उछाल क्यों महत्वपूर्ण
भारत की जीडीपी वृद्धि दर इस बार बढ़कर 7.4 प्रतिशत के आस-पास पहुंचने का अनुमान जताया गया। हाल ही में खत्म हुई तिमाही में विकास दर 8.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो एक बड़ी प्रगति है। इसके पिछले कई तिमाहियों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने स्थिरता बनाए रखी है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह सिर्फ एक तात्कालिक सुधार नहीं बल्कि दीर्घकालिक पुनर्बलन का संकेत है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर खर्च किया। राजमार्ग विस्तार, रेलवे नेटवर्क में सुधार, नदियों के किनारे औद्योगिक क्लस्टर, रक्षा उपकरण निर्माण, अंतरिक्ष तकनीक में प्रगति और ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में निवेश ने भारतीय विकास को ठोस आधार दिया।
नीतिगत दृष्टि से कर ढांचे में सुधार, डिजिटलीकरण, भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता, सरकारी योजनाओं में डायरेक्ट ट्रांसफर के कारण धन का प्रवाह तेजी से नीचे के स्तर तक पहुंच रहा है। यह प्रवाह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, उपभोग बढ़ाने और छोटे व्यवसायों को गति देने में सहायक रहा।
ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद और उसका असर
जब अर्थव्यवस्था मजबूत संकेत देती है और महंगाई नियंत्रण स्तर में होती है, तब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती की दिशा में कदम बढ़ाता है। वर्तमान आर्थिक परिस्थिति को देखते हुए व्यापक उम्मीद बन रही है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों में कटौती देखने को मिल सकती है।
यदि ब्याज दरें कम होती हैं तो छोटे व्यापारियों, कर्जधारकों, गृह ऋण लेने वालों और पूंजी निवेश करने वाले उद्योगों के लिए अधिक अनुकूल माहौल तैयार होगा। रियल एस्टेट, ऑटो सेक्टर और पूंजीगत वस्तुओं वाले उद्योगों में विशेष तेजी आ सकती है।
उधारी सस्ती होने का बड़ा लाभ निवेश आकर्षित करने में मिलता है, जिससे रोजगार बढ़ता है। बेहतर रोजगार क्षमता उपभोग खर्च को बढ़ाती है, जिसके परिणामस्वरूप रिटेल बिक्री, उत्पादन और सेवाओं का मूल्य बढ़ता है।
सरकारी खर्च ने दिया विकास को सहारा
पिछले एक वर्ष के दौरान सरकार द्वारा सार्वजनिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सड़क, जलमार्ग, रेल, स्मार्ट सिटी मिशन, बिजली ग्रिड विस्तार और ग्रामीण कौशल विकास पर केंद्रित योजनाओं ने भारतीय बाजार को नई ऊर्जा प्रदान की। खासतौर पर निर्माण क्षेत्र में काम कर रहे उद्योगों को बड़े पैमाने पर लाभ मिला।
सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं पर होने वाले खर्च से कई संबंधित क्षेत्रों को लाभ पहुंचता है। निर्माण उद्योग को श्रमिकों की आवश्यकता होती है, इससे ग्रामीण रोजगार बढ़ता है और गांव से शहरों के बीच मांग का संतुलित प्रवाह बनता है।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
देश के प्रमुख उद्योगों, व्यापार संघों और निवेश बाजारों ने वर्तमान आर्थिक संकेतों को सकारात्मक माना है। कई कंपनियों ने उधारी घटने की उम्मीद में अपने पूंजी प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। व्यापक उपभोक्ता मांग ने कंपनियों के उत्पादन स्तर में इजाफा किया।
कई स्टार्टअप्स और टेक आधारित कंपनियों को भी निवेश माहौल बेहतर होने की उम्मीद है। विदेशी संस्थागत निवेशक भी भारतीय पूंजी बाजार में बढ़ती स्थिरता को सकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं।
आम लोगों पर आर्थिक प्रभाव
विकास दर में सकारात्मक परिवर्तन केवल सरकारी आंकड़ा नहीं है बल्कि आम लोगों को भी इसका लाभ मिलता है। बेरोज़गारी में धीरे-धीरे कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में आय सृजन, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार, महंगाई में स्थिरता और डिजिटल भुगतान में वृद्धि ने आम लोगों की जीवनशैली को सरल बनाया है।
रोजगार आधारित योजनाओं जैसे युवा उद्यमिता योजना, कृषि मूल्य स्थिरीकरण और कौशल विकास कार्यक्रमों ने कई युवाओं को अवसर प्रदान किए। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर संकेत दे रही थी, भारत का संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
भविष्य पर असर
अगले वर्ष के लिए अर्थव्यवस्था में सुधार की गुंजाइश और बढ़ सकती है। कुछ नए व्यापार समझौते और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ने से निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, सेवा क्षेत्र और डिजिटल बाजार का दायरा बढ़ेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का विकास टिकाऊ है क्योंकि उसकी वास्तविक मांग घरेलू अर्थव्यवस्था से आती है।
भारत की बढ़ती आय पर आधारित विकास विद्रोही नहीं बल्कि संतुलित तरीके से बढ़ने वाला मॉडल है। इससे भारत आगामी दशक में दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में दूसरे या तीसरे स्थान पर पहुंच सकता है।
