अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित होते हैं। यह कहावत इन दिनों वेनेज़ुएला के लिए बेहद सटीक साबित हो रही है। जिस देश ने दो दशकों तक खुद को वैश्विक शक्ति संतुलन की धुरी पर खड़ा करने की कोशिश की, आज वही देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसके सबसे करीबी माने जाने वाले सहयोगी भी केवल औपचारिक समर्थन तक सीमित नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा आक्रामक रुख अपनाने के बाद वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन इस बार रूस और चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत और सीमित दिखाई दे रही है।

वेनेज़ुएला और अमेरिका: टकराव का पुराना इतिहास
वेनेज़ुएला और अमेरिका के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। यह टकराव ह्यूगो शावेज़ के दौर से ही शुरू हो गया था, जब वेनेज़ुएला ने खुले तौर पर अमेरिकी नीतियों का विरोध किया और समाजवादी मॉडल को अपनाया। निकोलस मादुरो ने सत्ता संभालने के बाद इसी विरासत को आगे बढ़ाया। अमेरिका ने मादुरो सरकार पर मानवाधिकार उल्लंघन, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने और ड्रग तस्करी को संरक्षण देने जैसे गंभीर आरोप लगाए। जवाब में वेनेज़ुएला ने अमेरिका पर सत्ता परिवर्तन की साजिश रचने का आरोप लगाया।
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद यह टकराव और तीखा हो गया है। कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों में तेजी, युद्धपोतों और सैनिकों की तैनाती, और समुद्री कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया है कि वॉशिंगटन अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहता।
सैन्य तैनाती और दबाव की रणनीति
हाल के महीनों में अमेरिका ने कैरेबियन क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों, निगरानी विमानों और हजारों सैनिकों की तैनाती ने क्षेत्रीय संतुलन को हिला दिया है। आधिकारिक तौर पर इसे ड्रग तस्करी के खिलाफ अभियान बताया जा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह दबाव मादुरो सरकार को कमजोर करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिकी नौसेना द्वारा वेनेज़ुएला के तट के पास तेल टैंकर जब्त किए जाने की घटनाएं भी इसी दबाव नीति की कड़ी मानी जा रही हैं। इन कार्रवाइयों से वेनेज़ुएला की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है।
रूस और चीन: पुराने साथी, बदली प्राथमिकताएं
एक समय था जब रूस और चीन वेनेज़ुएला के सबसे मजबूत अंतरराष्ट्रीय समर्थक माने जाते थे। आर्थिक संकट के दौर में चीन ने भारी कर्ज दिया और रूस ने सैन्य सहयोग के जरिए मादुरो सरकार को संबल प्रदान किया। यह सहयोग केवल रणनीतिक नहीं था, बल्कि वैचारिक भी था। अमेरिका विरोधी धुरी में वेनेज़ुएला की भूमिका दोनों देशों के लिए उपयोगी थी।
लेकिन समय के साथ वैश्विक परिस्थितियां बदलीं। रूस यूक्रेन युद्ध में उलझ गया और उसकी आर्थिक व सैन्य क्षमता पर भारी दबाव पड़ा। पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस की प्राथमिकताओं को सीमित कर दिया। ऐसे में वह उन सहयोगियों पर संसाधन खर्च करने की स्थिति में नहीं है, जिनसे उसे तत्काल रणनीतिक लाभ नहीं मिल रहा।
चीन की स्थिति भी अलग नहीं है। बीजिंग अब आक्रामक विस्तार के बजाय आर्थिक स्थिरता और वैश्विक संतुलन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों में सुधार की कोशिशों के बीच वह किसी ऐसे विवाद में खुलकर कूदने से बच रहा है, जिससे नए प्रतिबंध या टैरिफ का खतरा पैदा हो।
प्रतीकात्मक समर्थन की राजनीति
हालिया घटनाक्रम में रूस और चीन दोनों ने वेनेज़ुएला के समर्थन में बयान जरूर दिए हैं, लेकिन ये बयान अधिकतर कूटनीतिक भाषा तक सीमित रहे हैं। फोन कॉल, संयम बरतने की अपील और बाहरी हस्तक्षेप की आलोचना जैसे कदम वास्तविक सैन्य या आर्थिक मदद से काफी दूर हैं।
यह स्थिति मादुरो के लिए चिंता का विषय है। जिन सहयोगियों पर वे सबसे ज्यादा निर्भर थे, वही अब जोखिम लेने से बचते नजर आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह एक स्पष्ट संकेत है कि समर्थन तभी मिलता है, जब उससे समर्थक देश को भी स्पष्ट लाभ दिखाई दे।
आर्थिक बदहाली और घटता जनसमर्थन
वेनेज़ुएला की आंतरिक स्थिति भी रूस और चीन की दूरी का एक बड़ा कारण मानी जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था वर्षों से संकट में है। तेल उत्पादन में गिरावट, मुद्रास्फीति और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने सरकार की साख को कमजोर किया है। ऐसे में बाहरी शक्तियों के लिए यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या एक कमजोर और अलोकप्रिय सरकार में निवेश करना व्यावहारिक है।
हालिया राष्ट्रपति चुनावों को लेकर उठे सवालों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर आरोप लगाए और वैकल्पिक आंकड़े पेश किए। इससे मादुरो सरकार की वैधता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह बढ़ा है।
चीन की गणनात्मक चुप्पी
चीन के लिए वेनेज़ुएला अब वैचारिक सहयोगी से ज्यादा एक आर्थिक जोखिम बन चुका है। बीजिंग ने नए कर्ज देने में कटौती कर दी है और पुराने कर्ज की वसूली पर ध्यान केंद्रित किया है। उसे यह भी अंदेशा है कि यदि भविष्य में सत्ता परिवर्तन होता है, तो मौजूदा सरकार के साथ अत्यधिक निकटता नए शासकों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसलिए चीन ने एक संतुलित रुख अपनाया है। वह किसी भी सरकार से संवाद बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है, ताकि उसके आर्थिक हित सुरक्षित रहें।
रूस की सीमित क्षमता
रूस की स्थिति और भी जटिल है। यूक्रेन युद्ध ने उसकी सैन्य शक्ति को व्यस्त कर रखा है। ऐसे में कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिका के साथ सीधा टकराव मोल लेना उसके लिए रणनीतिक रूप से उचित नहीं है। रूस वेनेज़ुएला के समर्थन में बयान देकर अपने पुराने रिश्तों को जीवित रखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन व्यावहारिक मदद से वह फिलहाल दूर है।
क्या मादुरो सच में अकेले हैं
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में मादुरो पहले से कहीं ज्यादा अलग-थलग पड़ गए हैं। घरेलू असंतोष, आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी ने उनकी स्थिति कमजोर कर दी है। रूस और चीन की खामोशी इस बात का संकेत है कि अब वेनेज़ुएला उनके लिए प्राथमिकता नहीं रहा।
अमेरिका का दीर्घकालिक लक्ष्य
अमेरिका के कदम केवल सैन्य दबाव तक सीमित नहीं हैं। यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य वेनेज़ुएला में राजनीतिक बदलाव की संभावनाओं को मजबूत करना है। हालांकि अमेरिका सीधे सत्ता परिवर्तन की बात से इनकार करता है, लेकिन उसके कदमों से यही संदेश जाता है कि वह मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है।
वैश्विक राजनीति का बदलता चेहरा
वेनेज़ुएला का मामला इस बात का उदाहरण है कि वैश्विक राजनीति में स्थायी मित्रता नहीं होती। रूस और चीन जैसे देश भी अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हैं। जब जोखिम बढ़ता है और लाभ घटता है, तो समर्थन सीमित हो जाता है।
निष्कर्ष: खामोशी के मायने
रूस और चीन की खामोशी केवल मौन नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है। यह संदेश यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समर्थन तभी तक मिलता है, जब तक वह रणनीतिक रूप से लाभकारी हो। मादुरो के लिए यह समय आत्ममंथन का है, क्योंकि जिस अंतरराष्ट्रीय सहारे पर वे वर्षों से निर्भर थे, वह अब केवल शब्दों तक सिमट गया है।
