रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध को रोकने की दिशा में अबू धाबी में हुई पहली त्रिपक्षीय बैठक से दुनिया को बड़ी उम्मीदें थीं। यह बैठक इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही थी क्योंकि वर्ष 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार रूस और यूक्रेन आमने-सामने बातचीत की मेज पर बैठे थे और इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। लेकिन दो दिनों तक चली गहन बातचीत के बावजूद कोई ठोस समझौता नहीं हो सका और यह वार्ता बिना किसी डील के समाप्त हो गई।

अबू धाबी में हुई इस बैठक का अंत भले ही किसी औपचारिक शांति समझौते के बिना हुआ हो, लेकिन इसे पूरी तरह विफल भी नहीं माना जा रहा। बातचीत के बाद रूस और यूक्रेन, दोनों पक्षों ने संकेत दिए कि वे आगे भी संवाद जारी रखने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में इसे एक ठहराव के रूप में देखा जा रहा है, न कि पूर्ण विराम के रूप में।
त्रिपक्षीय बैठक का ऐतिहासिक संदर्भ
यह बैठक कई मायनों में ऐतिहासिक थी। रूस द्वारा यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला शुरू करने के बाद यह पहली बार था जब रूस, यूक्रेन और अमेरिका एक साझा मंच पर युद्ध समाप्त करने की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे थे। संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी को इस बैठक के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यूएई खुद को एक तटस्थ और भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
यूएई सरकार के प्रवक्ता ने बातचीत के बाद बताया कि रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों के बीच आमने-सामने चर्चा हुई और इस दौरान अमेरिका द्वारा प्रस्तावित शांति फ्रेमवर्क पर विचार किया गया। इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य युद्ध रोकने के लिए संभावित शर्तों और सीमाओं को तय करना था।
अमेरिका की मध्यस्थता और रणनीतिक भूमिका
इस पूरी वार्ता प्रक्रिया में अमेरिका की भूमिका बेहद अहम रही। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में जारी सबसे घातक युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। अमेरिकी प्रशासन मानता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध न केवल यूरोप बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए अस्थिरता का कारण बना हुआ है।
अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने इससे पहले दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान संकेत दिया था कि बातचीत में काफी प्रगति हो चुकी है और केवल एक अहम मुद्दा ही बाकी रह गया है। यही बयान इस वार्ता से पहले उम्मीदों को और मजबूत कर गया था।
बातचीत के दौरान क्या हुआ
अबू धाबी में दो दिनों तक चली बातचीत के दौरान युद्ध समाप्त करने से जुड़े संभावित पैरामीटर पर चर्चा हुई। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने बातचीत के बाद सोशल मीडिया पर बताया कि चर्चा का मुख्य फोकस यह था कि युद्ध को किस तरह और किन शर्तों पर समाप्त किया जा सकता है।
एक अमेरिकी अधिकारी ने, नाम न बताने की शर्त पर, बातचीत के माहौल के बारे में बताया कि चर्चा की मेज पर सभी पक्षों के बीच सम्मान बना रहा और यह साफ दिखाई दे रहा था कि सभी समाधान खोजने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि, जमीनी हकीकत और राजनीतिक बाधाओं ने किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने से रोक दिया।
वार्ता के समानांतर जारी युद्ध की भयावहता
जहां एक ओर अबू धाबी में शांति की बात हो रही थी, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर युद्ध की भयावहता कम नहीं हुई। बातचीत के दौरान और उसके तुरंत बाद रूस ने यूक्रेन पर रात भर हवाई हमले जारी रखे। इन हमलों के चलते दस लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिक कड़ाके की ठंड में बिना बिजली के रहने को मजबूर हो गए।
यह स्थिति इस युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी को उजागर करती है, जहां कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद आम नागरिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। ऊर्जा ढांचे पर हमलों ने यूक्रेन की मानवीय स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।
डोनबास क्षेत्र बना सबसे बड़ा गतिरोध
रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत जहां आकर अटक गई, वह मुद्दा है डोनबास क्षेत्र। माना जा रहा है कि यही एकमात्र ऐसा बड़ा विवादित विषय है, जिसने अब तक शांति समझौते को रोक रखा है। रूस इस समय यूक्रेन के लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए हुए है, जिसमें पूर्वी डोनबास का बड़ा हिस्सा शामिल है।
मॉस्को चाहता है कि यूक्रेन उस क्षेत्र के बड़े हिस्से को औपचारिक रूप से रूस को सौंप दे। वहीं, राष्ट्रपति जेलेंस्की इस मांग को पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। उनका साफ कहना है कि यह युद्ध केवल जमीन का नहीं, बल्कि यूक्रेन की संप्रभुता और अस्तित्व का सवाल है।
जेलेंस्की का रुख और सुरक्षा गारंटी की मांग
वोलोदिमिर जेलेंस्की लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि किसी भी शांति समझौते की स्थिति में यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने पहले भी कहा था कि यदि कोई डील होती है, तो उसके साथ अमेरिका से भविष्य की सुरक्षा गारंटी भी जरूरी होगी।
जेलेंस्की ने यह भी संकेत दिया कि उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ यूक्रेन के लिए संभावित अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को लेकर बातचीत की है। उनका मानना है कि बिना मजबूत अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा आश्वासन के यूक्रेन किसी भी समझौते पर भरोसा नहीं कर सकता।
रूस का दृष्टिकोण और आगे की रणनीति
रूसी समाचार एजेंसी के अनुसार मॉस्को ने संकेत दिए हैं कि वह यूक्रेन और अमेरिका दोनों के साथ बातचीत जारी रखने के लिए तैयार है। रूस का कहना है कि वह कूटनीतिक समाधान के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसकी सुरक्षा चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रूस लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि नाटो का विस्तार और यूक्रेन का पश्चिमी झुकाव उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। यही कारण है कि वह डोनबास और अन्य क्षेत्रों को लेकर कठोर रुख अपनाए हुए है।
यूएई की भूमिका और वैश्विक कूटनीति
संयुक्त अरब अमीरात ने इस बैठक की मेजबानी कर खुद को एक उभरते वैश्विक कूटनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। यूएई पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है और अब रूस-यूक्रेन जैसे जटिल संघर्ष में उसकी भूमिका को गंभीरता से देखा जा रहा है।
हालांकि पहली बैठक से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, लेकिन यह तथ्य कि बातचीत हुई और आगे भी होने की संभावना है, अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब आगे क्या, दुनिया की नजरें अगली बैठक पर
बातचीत के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि अगले सप्ताह के अंत में फिर से वार्ता होने की उम्मीद है। दोनों पक्षों ने यह भी कहा है कि वे अपनी-अपनी राजधानियों में लौटकर नेताओं से चर्चा करेंगे और आगे की रणनीति पर विचार करेंगे।
अब सवाल यह है कि क्या अगली बैठक में कोई ठोस प्रगति हो पाएगी या डोनबास का मुद्दा फिर से गतिरोध पैदा करेगा। वैश्विक समुदाय की नजरें अब इसी पर टिकी हैं।
