राजधानी भोपाल में मेट्रो प्रोजेक्ट को लेकर एक बार फिर इंजीनियरिंग की गलती सुर्खियों में है। मेट्रो स्टेशन के निर्माण में तकनीकी मानकों की अनदेखी ने अब प्रशासन के साथ शहरवासियों की भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दरअसल, केंद्रीय विद्यालय मेट्रो स्टेशन की ऊंचाई निर्धारित मानक से कम रख दी गई, जिससे भारी वाहनों का गुजरना लगभग असंभव हो गया है। अब इस गलती की भरपाई के लिए सड़क की खुदाई की जा रही है — लेकिन इसके चलते ट्रैफिक और जलभराव जैसी नई समस्याएं खड़ी हो गई हैं।

इंजीनियरिंग की बड़ी भूल: स्टेशन की ऊंचाई रखी कम
भोपाल मेट्रो कार्पोरेशन ने खंभों पर केंद्रीय विद्यालय स्टेशन का निर्माण किया है। लेकिन इंजीनियरिंग की इस प्रक्रिया में एक गंभीर लापरवाही हो गई — स्टेशन के आधार (बेस) की ऊंचाई सड़क की सतह से केवल 4.8 फीट रखी गई, जबकि मानक ऊंचाई 5.5 फीट तय है। यह लगभग 8 इंच कम है। अब जब स्टेशन का निर्माण पूरा हो चुका है, तो यह गलती सामने आई है। इसका सीधा असर यह है कि ट्रक, ट्राले और डंपर जैसे भारी वाहन स्टेशन के नीचे से नहीं गुजर पा रहे हैं। यदि वे वहां से गुजरने की कोशिश करते हैं, तो स्टेशन के आधार से टकराने की आशंका बनी रहती है।
अब सड़क खोदने की नौबत
स्टेशन की संरचना में बदलाव अब संभव नहीं है, इसलिए मेट्रो प्रबंधन ने सड़क की सतह को नीचे करने का फैसला किया है। मैदामिल रोड को करीब 150 मीटर लंबाई तक एक फीट गहराई में खोदा जा रहा है, ताकि ऊंचाई का अंतर कुछ हद तक संतुलित किया जा सके।
अधिकारियों के अनुसार, खुदाई पूरी होने के बाद सड़क पर दोबारा डामर बिछाया जाएगा, ताकि ऊंचाई लगभग 5.5 फीट तक पहुंच सके। लेकिन इस “अस्थायी सुधार” से शहर की अन्य परेशानियां बढ़ सकती हैं — विशेष रूप से बरसात के मौसम में।
बरसात में तालाब बनेगी सड़क
मैदामिल रोड के जिस हिस्से को खोदा जा रहा है, वहां से एक नाला भी गुजरता है। पहले से ही इस क्षेत्र में जलभराव की समस्या रहती है। अब सड़क को और नीचे कर देने से बारिश के दिनों में यह हिस्सा तालाब में बदल सकता है। आसपास के घरों और दुकानों के लिए यह स्थिति और भी दिक्कतें खड़ी करेगी। स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि मानसून के दौरान यहां सामान्य बारिश भी सड़क को डूबा देगी और यातायात पूरी तरह ठप हो जाएगा।
अधिकारियों की चुप्पी और जिम्मेदारी से बचाव
मेट्रो की इस बड़ी चूक पर भोपाल मेट्रो के अधिकारी जवाब देने से बच रहे हैं। यहां तक कि मेट्रो के प्रबंध संचालक एस. कृष्ण चैतन्य ने भी इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वहीं, नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है और इस बारे में मेट्रो रेल के एमडी ही कुछ बता सकते हैं। यानी जिम्मेदारी की गेंद एक विभाग से दूसरे विभाग में फेंकी जा रही है।
यह पहली गलती नहीं है
भोपाल मेट्रो के इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट में यह पहली गलती नहीं है। इससे पहले एमपी नगर स्टेशन के निर्माण के दौरान भी इसी तरह की त्रुटि की गई थी। वहां भी सड़क की ऊंचाई को कम कर के स्थिति को संभालना पड़ा था। इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि यह “दोहराई जाने वाली गलती” बताती है कि मेट्रो प्रोजेक्ट में तकनीकी ऑडिट और निरीक्षण की प्रक्रिया कितनी कमजोर है।
भोपाल मेट्रो की ‘अजब इंजीनियरिंग’ की फेहरिस्त में एक और उदाहरण
भोपाल मेट्रो की निर्माण प्रक्रिया पहले भी कई बार विवादों में रही है। कुछ साल पहले रेलवे ओवरब्रिज के 90-डिग्री मोड़ को लेकर भी मेट्रो की योजना का मजाक उड़ा था। अब यह नया मामला उस पर एक और “इंजीनियरिंग मिसाल” जोड़ रहा है। शहर के नागरिकों में यह चर्चा है कि करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट में इस तरह की बुनियादी गलतियां होना, प्रबंधन की निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाता है।
ट्रैफिक डाइवर्जन और अस्थायी उपाय
भोपाल मेट्रो रेल कार्पोरेशन ने हाल ही में यातायात पुलिस को पत्र लिखकर एक महीने का ट्रैफिक डाइवर्जन मांगा था। पुलिस ने वैकल्पिक सड़क तैयार करने का सुझाव दिया। एसीपी मिलन जैन ने बताया कि मेट्रो प्रबंधन ने खुदाई वाली सड़क के समानांतर एक अस्थायी सड़क बना ली है, जिससे ट्रैफिक को मोड़कर ले जाया जा रहा है। हालांकि, यह केवल अस्थायी राहत है। खुदाई पूरी होने और डामर बिछाने के बाद ही स्थिति सामान्य हो पाएगी।
इंजीनियरिंग विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क की ऊंचाई घटाने से भविष्य में कई तकनीकी और पर्यावरणीय समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों में जहां बारिश का बहाव ज्यादा है, वहां सतह को नीचे करना गलत निर्णय है। इससे जलभराव और सड़क के तेजी से खराब होने की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
भोपाल मेट्रो का यह नया “इंजीनियरिंग प्रयोग” शहरवासियों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। एक तरफ सरकार और प्रशासन इसे शहर की आधुनिक परिवहन प्रणाली के रूप में पेश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ऐसी लापरवाह गलतियां भोपाल मेट्रो की साख को लगातार चोट पहुंचा रही हैं। अब देखना यह होगा कि क्या यह गलती सिर्फ “सड़क खोदने” तक सिमटती है या आने वाले वक्त में इस पर कोई ठोस जिम्मेदारी तय होती है।
