मध्य पूर्व में गाजा की तबाही ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। हजारों जानें जा चुकी हैं, बुनियादी ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और मानवीय संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय समुदाय गाजा को स्थिर करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर विचार कर रहा है। लेकिन इस मानवीय त्रासदी के बीच पाकिस्तान को भी अपने लिए एक अवसर नजर आने लगा है। शांति और स्थिरता की बात करते हुए इस्लामाबाद दरअसल अपने राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक हित साधने की कोशिश में जुटा हुआ दिखाई दे रहा है।

सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान गाजा में प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स में सिर्फ शामिल ही नहीं होना चाहता, बल्कि उसका नेतृत्व भी अपने हाथ में लेने की इच्छा जता चुका है। पाकिस्तान की सेना और सरकार का मानना है कि यदि यह अंतरराष्ट्रीय शांति बल गठित होता है, तो उसकी कमान किसी पाकिस्तानी जनरल को सौंपी जानी चाहिए। इस मांग को लेकर पाकिस्तान अमेरिका और अन्य प्रभावशाली देशों के साथ लगातार संपर्क में है।
गाजा संकट और अंतरराष्ट्रीय फोर्स की चर्चा
गाजा में लंबे समय से जारी संघर्ष के कारण हालात बेहद नाजुक हो चुके हैं। युद्धविराम के बाद भी वहां कानून व्यवस्था बहाल करना आसान नहीं होगा। इसी को देखते हुए एक अंतरराष्ट्रीय स्टैबलाइजेशन फोर्स की परिकल्पना सामने आई है, जिसका उद्देश्य गाजा में शांति बनाए रखना, मानवीय सहायता का रास्ता साफ करना और प्रशासनिक ढांचे को दोबारा खड़ा करने में मदद करना है।
इस प्रस्तावित व्यवस्था में कई देश शामिल हो सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान ने खुद को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में पेश करने की कोशिश शुरू कर दी है। इस्लामाबाद यह दिखाना चाहता है कि उसके पास मुस्लिम दुनिया में स्वीकार्यता है और उसकी सेना को अंतरराष्ट्रीय अभियानों का अनुभव भी है।
पाकिस्तान की असली मंशा क्या है
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की दिलचस्पी सिर्फ गाजा की मदद तक सीमित नहीं है। असल में यह कदम उसकी वैश्विक छवि सुधारने और अपने डगमगाते आर्थिक हालात को संभालने की रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। विदेशी कर्ज, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी हालत कमजोर कर दी है।
ऐसे में गाजा मिशन के जरिए पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को जरूरी साबित करना चाहता है। इसके बदले वह आर्थिक मदद, सुरक्षा सहयोग और राजनीतिक समर्थन हासिल करने की कोशिश में है।
शर्तों के साथ आगे बढ़ रहा पाकिस्तान
पाकिस्तान ने इस मिशन में शामिल होने के लिए कई शर्तें सामने रखी हैं। सबसे अहम शर्त यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टू-स्टेट सॉल्यूशन को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए। यानी एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की गारंटी दी जाए। पाकिस्तान यह भी चाहता है कि उसकी भूमिका केवल शांति बनाए रखने और हालात को स्थिर करने तक सीमित रहे, न कि हथियार जब्त करने या किसी गुट के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई तक।
इसके अलावा पाकिस्तान ने साफ किया है कि उसे अमेरिका के साथ-साथ सऊदी अरब, यूएई, कतर और मिस्र जैसे प्रभावशाली अरब देशों का समर्थन चाहिए। वह नहीं चाहता कि यह मिशन किसी एक देश की मर्जी से चले, बल्कि उसे व्यापक मुस्लिम समर्थन मिले।
आर्थिक पैकेज की उम्मीद
इस पूरे प्रस्ताव के पीछे पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरी भी साफ नजर आती है। सूत्रों के अनुसार इस्लामाबाद ने अमेरिका और खाड़ी देशों से लंबी अवधि के आर्थिक और सुरक्षा पैकेज की मांग रखी है। पाकिस्तान चाहता है कि गाजा मिशन में उसकी भागीदारी के बदले उसे आर्थिक राहत मिले, निवेश बढ़े और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का रुख उसके पक्ष में हो।
अमेरिका से विशेष दर्जे की मांग
पाकिस्तान ने इस मौके को अमेरिका के साथ अपने रिश्ते फिर से मजबूत करने के तौर पर भी देखा है। उसने अमेरिका से अपना ‘मेजर नॉन-नाटो एलाय’ दर्जा बहाल करने की मांग की है। यह दर्जा उसे उन्नत सैन्य तकनीक, प्रशिक्षण और हथियारों तक आसान पहुंच दिला सकता है।
अतीत में यह दर्जा पाकिस्तान को मिला हुआ था, लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में आई ठंडक के कारण इसका महत्व कम हो गया। अब गाजा संकट के बहाने पाकिस्तान इस रिश्ते को दोबारा जीवित करना चाहता है।
ट्रंप प्रशासन और पाकिस्तान की उम्मीदें
अमेरिका में सत्ता समीकरण बदलने के साथ पाकिस्तान को यह उम्मीद है कि वाशिंगटन उसके प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार करेगा। डोनाल्ड ट्रंप गाजा में हालात सामान्य होते ही किसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में बताए जा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान खुद को एक उपयोगी साझेदार के रूप में पेश कर रहा है।
अमेरिकी और पाकिस्तानी रक्षा अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। सेना प्रमुख आसिम मुनीर और अमेरिकी सेंटकॉम कमांडर की संभावित मुलाकात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
भारत और इजरायल से जुड़ा संवेदनशील पहलू
इस पूरे मामले में भारत और इजरायल का एंगल भी अहम है। पाकिस्तान ने इस मिशन में शामिल होने से पहले इजरायल से सुरक्षा आश्वासन की बात उठाई है। इसकी वजह इजरायल और भारत के बीच मजबूत रणनीतिक रिश्ते बताए जा रहे हैं।
पाकिस्तान चाहता है कि इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स के लिए एक साझा कोऑर्डिनेशन हेडक्वार्टर बने, जिसमें अमेरिका, इजरायल और अन्य प्रमुख देश शामिल हों। इससे वह खुद को सुरक्षित महसूस करता है और किसी अप्रत्याशित स्थिति से बचना चाहता है।
मध्य पूर्व में दोबारा सक्रिय होने की कोशिश
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान लंबे समय बाद मध्य पूर्व में अपनी सैन्य और राजनीतिक मौजूदगी फिर से मजबूत करना चाहता है। हाल के महीनों में पाकिस्तानी सेना प्रमुख की सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र और लीबिया यात्राओं को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
इन दौरों का मकसद यह संदेश देना है कि पाकिस्तान सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मुस्लिम दुनिया में भी एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।
मानवीय संकट या राजनीतिक सौदेबाजी
गाजा का संकट मानवीय है, लेकिन पाकिस्तान का रुख इसे एक अवसर की तरह देखने का संकेत देता है। शांति की बात करते हुए वह नेतृत्व, आर्थिक मदद और रणनीतिक फायदे की मांग कर रहा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह प्रयास वास्तव में गाजा के लोगों की भलाई के लिए है या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी कमजोर स्थिति सुधारने की कोशिश।
आने वाले समय में यह साफ होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान की इन मांगों को किस हद तक स्वीकार करता है। फिलहाल इतना तय है कि गाजा संकट ने पाकिस्तान को एक नई कूटनीतिक चाल चलने का मौका दे दिया है।
