भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जनगणना केवल जनसंख्या गिनने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह शासन, प्रशासन और भविष्य की योजनाओं की रीढ़ मानी जाती है। हर दस वर्षों में होने वाली यह प्रक्रिया सरकार को यह समझने में मदद करती है कि देश की जनसंख्या कहां, कैसे और किस गति से बढ़ रही है। इसी जनगणना के आधार पर संसाधनों का वितरण, योजनाओं की रूपरेखा, निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन और प्रशासनिक इकाइयों की संरचना तय होती है।

इसी कारण जैसे ही जनगणना की आधिकारिक तैयारी शुरू होती है, वैसे ही देशभर में प्रशासनिक सीमाओं को स्थिर यानी फ्रीज कर दिया जाता है। इसका सीधा मतलब होता है कि जनगणना पूरी होने तक न तो नए जिले बनाए जा सकते हैं, न नई तहसीलें गठित की जा सकती हैं और न ही किसी जिले, तहसील या अन्य प्रशासनिक इकाई की सीमा में कोई बदलाव किया जा सकता है।
प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज होने का निर्णय और उसका समय
देश में आगामी जनगणना को लेकर सभी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। इसी के साथ केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्यों को यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जनगणना की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रशासनिक ढांचे में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाएगा। मध्य प्रदेश में इस संबंध में अंतिम तारीख 31 दिसंबर तय की गई थी। जैसे ही यह तारीख समाप्त हुई, राज्य में स्वतः ही सभी प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज मानी जाने लगीं।
अब इस निर्णय का सीधा असर यह हुआ है कि मध्य प्रदेश में न तो कोई नया जिला अस्तित्व में आ सकेगा और न ही किसी नई तहसील के गठन को मंजूरी मिल पाएगी। इसके अलावा पहले से प्रस्तावित किसी भी सीमा परिवर्तन पर भी फिलहाल रोक लग गई है।
क्यों जरूरी होता है सीमा फ्रीज करना
जनगणना के दौरान देश के हर नागरिक को किसी न किसी प्रशासनिक इकाई से जोड़ा जाता है। अगर इस प्रक्रिया के बीच में जिले या तहसील की सीमाएं बदलती रहती हैं, तो आंकड़ों की सटीकता प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी क्षेत्र को जनगणना के दौरान नए जिले में शामिल कर दिया जाए, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उस क्षेत्र की जनसंख्या पुराने जिले में गिनी जाए या नए जिले में।
इसी भ्रम और आंकड़ों की गड़बड़ी से बचने के लिए सरकार जनगणना से पहले एक स्पष्ट रेखा खींच देती है। इसके बाद जब तक पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती, तब तक प्रशासनिक ढांचे को जस का तस रखा जाता है।
मध्य प्रदेश पर पड़ा सीधा असर
मध्य प्रदेश में लंबे समय से प्रशासनिक पुनर्गठन को लेकर चर्चाएं चल रही थीं। कई क्षेत्रों से नए जिले और नई तहसीलें बनाए जाने की मांग उठ रही थी। भोपाल संभाग सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रशासनिक सुविधा और बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव तैयार किए गए थे।
भोपाल जिले में ही पांच नई तहसीलों के गठन का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इन तहसीलों के बनने से न केवल प्रशासनिक कामकाज आसान होता, बल्कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी कम लगाने पड़ते। हालांकि अब सीमा फ्रीज होने के कारण यह सभी प्रस्ताव अटक गए हैं।
भोपाल की पांच तहसीलों का मामला
राजधानी भोपाल लगातार विस्तार कर रही है। जनसंख्या में तेजी से वृद्धि, शहरीकरण और आसपास के ग्रामीण इलाकों के शहर में विलय के कारण प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसी को देखते हुए भोपाल जिले में पांच नई तहसीलें बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।
इन प्रस्तावों पर प्राथमिक स्तर पर चर्चा भी हो चुकी थी और माना जा रहा था कि जल्द ही इन पर फैसला लिया जा सकता है। लेकिन जैसे ही 31 दिसंबर की समय-सीमा समाप्त हुई और प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज हो गईं, वैसे ही इन सभी प्रस्तावों पर फिलहाल विराम लग गया।
जनता पर क्या पड़ेगा असर
नई तहसील या जिला बनने का सबसे बड़ा फायदा आम नागरिकों को होता है। छोटे प्रशासनिक क्षेत्र होने से लोगों को राजस्व, भूमि रिकॉर्ड, प्रमाण पत्र और अन्य सरकारी कामों के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। जब ये प्रस्ताव अटकते हैं, तो इसका सीधा असर जनता की सुविधा पर पड़ता है।
भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोग जो नई तहसीलों की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें अब जनगणना पूरी होने तक इंतजार करना होगा। इसका मतलब यह है कि अगले कुछ वर्षों तक प्रशासनिक ढांचा उसी रूप में बना रहेगा, चाहे जनसंख्या कितनी ही क्यों न बढ़ जाए।
सरकार की मजबूरी और नियमों की सख्ती
हालांकि कई लोग इस फैसले से असंतुष्ट नजर आ सकते हैं, लेकिन सरकार के लिए यह कदम मजबूरी भी है। जनगणना एक संवैधानिक और राष्ट्रीय स्तर की प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी तरह की ढील देने से पूरे देश के आंकड़े प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए चाहे कितने भी जरूरी प्रस्ताव लंबित हों, सरकार जनगणना के दौरान प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव की अनुमति नहीं देती। यह नियम सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है।
जनगणना पूरी होने के बाद क्या होगा
एक बार जनगणना की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद सरकार फिर से प्रशासनिक पुनर्गठन पर विचार कर सकती है। तब नए जिले, नई तहसीलें और सीमा परिवर्तन के प्रस्तावों पर दोबारा काम शुरू होगा। भोपाल की अटकी हुई पांच तहसीलों का प्रस्ताव भी उसी समय फिर से सामने आ सकता है।
हालांकि यह प्रक्रिया तुरंत नहीं होती। जनगणना के आंकड़े आने, उनके विश्लेषण और सरकारी मंजूरी में समय लगता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि जिन प्रस्तावों पर आज रोक लगी है, उन्हें अमल में आने में अभी लंबा वक्त लग सकता है।
प्रशासनिक संतुलन और भविष्य की योजनाएं
जनगणना के आंकड़े केवल वर्तमान स्थिति नहीं बताते, बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव रखते हैं। स्कूल, अस्पताल, सड़कें, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की योजना इन्हीं आंकड़ों के आधार पर बनाई जाती है। ऐसे में प्रशासनिक सीमाओं का स्थिर रहना बेहद जरूरी हो जाता है।
मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां कई जिले भौगोलिक रूप से काफी विस्तृत हैं, वहां नए जिलों और तहसीलों की मांग स्वाभाविक है। लेकिन जनगणना के दौरान इन मांगों को थोड़े समय के लिए रोकना ही व्यवस्था की मजबूरी है।
निष्कर्ष
देश में जनगणना की प्रक्रिया शुरू होते ही प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज कर देना एक तयशुदा और जरूरी कदम है। मध्य प्रदेश में भी 31 दिसंबर की समय-सीमा खत्म होते ही नए जिले और तहसील बनाने की प्रक्रिया पर रोक लग गई है। इसका सीधा असर भोपाल सहित कई क्षेत्रों में प्रस्तावित प्रशासनिक बदलावों पर पड़ा है।
हालांकि यह रोक अस्थायी है, लेकिन जब तक जनगणना पूरी नहीं हो जाती, तब तक राज्य को इसी प्रशासनिक ढांचे के साथ काम करना होगा। जनगणना के बाद ही यह तय हो पाएगा कि किन क्षेत्रों को नए जिले या तहसील की जरूरत है और किन प्रस्तावों को मंजूरी दी जा सकती है।
