भारतीय शेयर बाजार में बीते कुछ हफ्तों से जिन शेयरों ने निवेशकों की सबसे ज्यादा नींद उड़ाई है, उनमें मीशो का नाम सबसे ऊपर आ गया है। करीब एक महीने पहले बाजार में शानदार प्रीमियम के साथ एंट्री करने वाला यह ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अब लगातार दूसरे दिन लोअर सर्किट पर पहुंच चुका है। शेयरों में आई इस तेज गिरावट ने निवेशकों को ऐसा झटका दिया है कि महज कुछ ही कारोबारी सत्रों में कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक साफ हो गया है।

शुरुआत में जिसे नए जमाने की ई-कॉमर्स सफलता की कहानी माना जा रहा था, वही कहानी अब सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। बाजार में यह चर्चा तेज है कि आखिर इतनी जल्दी ऐसा क्या बदल गया कि निवेशकों का भरोसा डगमगा गया।
आईपीओ से रिकॉर्ड हाई तक और फिर अचानक फिसलन
मीशो ने 5,421 करोड़ रुपये का आईपीओ लाकर निवेशकों का ध्यान खींचा था। इस आईपीओ के तहत शेयर 111 रुपये के इश्यू प्राइस पर जारी किए गए थे। लिस्टिंग के दिन ही शेयरों ने करीब 46 प्रतिशत प्रीमियम के साथ बाजार में कदम रखा, जिसने निवेशकों को शुरुआती मुनाफा दिया। लिस्टिंग के बाद कुछ ही दिनों में शेयर 18 दिसंबर को 254.65 रुपये के रिकॉर्ड हाई स्तर तक पहुंच गए।
हालांकि यह तेजी ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी। शेयरों में उतार-चढ़ाव शुरू हुआ और 12 दिसंबर 2025 को यह लिस्टिंग के बाद के रिकॉर्ड निचले स्तर 153.95 रुपये तक फिसल गए। इसके बाद फिर कुछ रिकवरी दिखी, लेकिन अब एक बार फिर गिरावट ने रफ्तार पकड़ ली है।
लगातार दूसरे दिन लोअर सर्किट का झटका
जनवरी के पहले हफ्ते में मीशो के शेयरों पर दबाव अचानक बढ़ गया। पहले दिन शेयरों में बिकवाली इतनी तेज रही कि 5 प्रतिशत का लोअर सर्किट लग गया। निवेशक इससे संभल भी नहीं पाए थे कि अगले कारोबारी दिन एक और नकारात्मक खबर सामने आई, जिसने गिरावट को और गहरा कर दिया।
बीएसई पर शेयर 5 प्रतिशत गिरकर 164.55 रुपये पर आ गए और लगातार दूसरे दिन लोअर सर्किट में फंस गए। यह गिरावट सिर्फ कीमत तक सीमित नहीं रही, बल्कि कंपनी की साख और भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े करने लगी।
पहली वजह: लॉक-इन पीरियड का खत्म होना
मीशो के शेयरों में गिरावट की पहली और बड़ी वजह रही लॉक-इन पीरियड का खत्म होना। नुवामा अल्टरनेटिव एंड क्वांटिटेटिव रिसर्च के मुताबिक कंपनी के करीब 10.99 करोड़ शेयरों का एक महीने का लॉक-इन समाप्त हुआ है। यह संख्या कंपनी की कुल आउटस्टैंडिंग इक्विटी का लगभग 2 प्रतिशत हिस्सा है।
लॉक-इन खत्म होने का सीधा मतलब यह होता है कि अब इन शेयरों के धारक चाहें तो अपने शेयर बाजार में बेच सकते हैं। भले ही सभी शेयर तुरंत नहीं बिकते, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में शेयरों के ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होने से बाजार में सप्लाई बढ़ने की आशंका बन जाती है। यही आशंका निवेशकों को घबराने के लिए काफी होती है।
6 जनवरी को 182.30 रुपये की क्लोजिंग प्राइस के हिसाब से इन शेयरों की कुल वैल्यू करीब 2,003 करोड़ रुपये आंकी गई। इतने बड़े मूल्य के शेयरों के संभावित बाजार में आने की खबर ने पहले ही दिन शेयरों पर दबाव बना दिया।
दूसरी वजह: सीनियर मैनेजमेंट का इस्तीफा
पहले दिन की गिरावट के बाद निवेशक उम्मीद कर रहे थे कि शायद हालात संभल जाएं, लेकिन दूसरे दिन एक और नकारात्मक खबर ने चिंता को और बढ़ा दिया। मीशो ने एक्सचेंज फाइलिंग में जानकारी दी कि कंपनी की जनरल मैनेजर (बिजनेस) और सीनियर मैनेजमेंट पर्सन मेघा अग्रवाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
किसी भी कंपनी के लिए सीनियर मैनेजमेंट का इस्तीफा एक संवेदनशील खबर मानी जाती है, खासकर तब जब कंपनी हाल ही में सूचीबद्ध हुई हो। निवेशकों को डर रहता है कि कहीं यह किसी बड़े आंतरिक संकट या रणनीतिक मतभेद का संकेत तो नहीं।
इसी आशंका ने बाजार में घबराहट को और बढ़ाया और शेयरों में बिकवाली का सिलसिला तेज हो गया।
एक महीने में 35 प्रतिशत से ज्यादा टूटे शेयर
इन दोनों वजहों के मिलेजुले असर ने मीशो के शेयरों को रिकॉर्ड हाई से करीब 35 प्रतिशत से ज्यादा नीचे ला दिया है। महज एक महीने से भी कम समय में निवेशकों की संपत्ति में करीब 40 हजार करोड़ रुपये की भारी गिरावट आ चुकी है।
यह गिरावट खास तौर पर उन निवेशकों के लिए झटका है, जिन्होंने ऊंचे स्तरों पर शेयर खरीदे थे और कंपनी के लंबे समय के ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा किया था।
ऑपरेशनल स्तर पर मजबूती, फिर भी शेयरों में दबाव
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि ऑपरेशनल स्तर पर मीशो ने बीते कुछ वर्षों में कई सकारात्मक बदलाव किए हैं। कंपनी ने अपनी लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी में लगातार सुधार किया है। वित्त वर्ष 2023 में प्रति ऑर्डर लॉजिस्टिक्स लागत 55 रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2025 में घटकर 46 रुपये रह गई।
इस सुधार के पीछे कंपनी का खुद का लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म वाल्मो रहा है। डिलीवरी डेंसिटी बढ़ाने और छोटे शहरों में तेजी से विस्तार करने से कंपनी की लागत में कमी आई। इसके अलावा कैश ऑन डिलीवरी ऑर्डर्स का अनुपात पहले के 90 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 61 प्रतिशत रह गया, जिससे फेल डिलीवरी और अतिरिक्त खर्च कम हुआ।
इन कदमों से मीशो का बिजनेस मॉडल पहले के मुकाबले ज्यादा कैपिटल एफिशिएंट हुआ और कंपनी प्रॉफिटेबिलिटी के करीब पहुंची।
फिर भी निवेशक क्यों बेचने को मजबूर हुए
ऑपरेशनल सुधारों के बावजूद शेयरों में दबाव बना रहा। इसकी एक वजह कंपनी का वैल्यूएशन भी माना जा रहा है। अन्य कंज्यूमर इंटरनेट और रिटेल कंपनियों के मुकाबले मीशो का वैल्यूएशन कई निवेशकों को ऊंचा लग रहा था।
लिस्टिंग के बाद तेज चढ़ाव के दौरान मुनाफावसूली की संभावना पहले से बनी हुई थी। जैसे ही लॉक-इन खत्म होने और मैनेजमेंट इस्तीफे की खबर आई, निवेशकों ने जोखिम कम करने के लिए बिकवाली को तरजीह दी।
बाजार के लिए क्या संकेत देता है यह गिरावट
मीशो के शेयरों में आई यह तेज गिरावट नए जमाने की टेक और ई-कॉमर्स कंपनियों में निवेश को लेकर एक अहम सबक देती है। सिर्फ ग्रोथ स्टोरी और तेजी के भरोसे निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है। मैनेजमेंट की स्थिरता, वैल्यूएशन और शेयरों की सप्लाई जैसे कारक उतने ही अहम होते हैं।
यह घटना बाजार को यह भी याद दिलाती है कि आईपीओ के बाद शुरुआती उत्साह के शांत होते ही असली परीक्षा शुरू होती है।
आगे की राह और निवेशकों की नजर
अब निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि कंपनी आगे क्या कदम उठाती है। क्या मैनेजमेंट में बदलाव के बाद कोई स्पष्ट रणनीति सामने आती है, और क्या कंपनी अपने ऑपरेशनल सुधारों को मुनाफे में बदल पाती है।
अगर कंपनी पारदर्शिता बनाए रखती है और ग्रोथ के साथ स्थिरता दिखाती है, तो लंबी अवधि में भरोसा लौट सकता है। लेकिन फिलहाल बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है।
