भोपाल — जिसे झीलों का शहर कहा जाता है, अब विज्ञान की दुनिया में भी अपनी पहचान बना रहा है। यहाँ स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER Bhopal) के वैज्ञानिकों ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उन्होंने दुनिया में पहली बार बुलबुल पक्षी (Red-vented Bulbul) की जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) पूरी की है — यानी उस पक्षी के डीएनए के हर अणु का रहस्य अब वैज्ञानिकों के सामने है। यह शोध न केवल जीवविज्ञान में एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह प्राकृतिक विविधता, पक्षियों के व्यवहार और संरक्षण के क्षेत्र में भी नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

क्या है जीनोम सिक्वेंसिंग और यह क्यों खास है?
जीनोम सिक्वेंसिंग का मतलब है — किसी जीव के पूरे डीएनए अनुक्रम को पढ़ना और उसका नक्शा तैयार करना।
डीएनए में ही यह जानकारी छिपी होती है कि उस जीव का रंग कैसा होगा, उसका स्वभाव कैसा है, वह किस परिस्थिति में कैसे बर्ताव करेगा, और उसकी अनुकूलन क्षमता कितनी है।
जब वैज्ञानिक किसी जीव का पूरा जीनोम पढ़ लेते हैं, तो वे उसके व्यवहार, विकास (Evolution) और बीमारियों या आक्रामकता के कारणों को भी समझ पाते हैं।बुलबुल, जो भारत के हर हिस्से में पाई जाती है — उसके लिए यह पहली बार हुआ है कि किसी ने उसका आनुवंशिक मानचित्र तैयार किया हो।
बुलबुल — चुलबुली परिंदे की अनजानी दुनिया
आम तौर पर बुलबुल को हम एक प्यारी, गाने वाली, चहकती पक्षी के रूप में जानते हैं। इसके मधुर स्वर पर कविताएँ लिखी गईं, गीत रचे गए और यह कई भारतीय मुहावरों का हिस्सा बन चुकी है। लेकिन IISER भोपाल की इस खोज ने दिखाया है कि यह चुलबुली बुलबुल केवल सुरों की रानी नहीं, बल्कि प्रकृति की एक बेहद रणनीतिक, बुद्धिमान और आक्रामक पक्षी भी है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, Red-vented Bulbul यानी लाल पेट वाली बुलबुल को दुनिया का तीसरा सबसे आक्रामक पक्षी माना गया है।
पहले नंबर पर European Starling, दूसरे पर Common Myna, और तीसरे पर हमारी बुलबुल!
आक्रामक स्वभाव और क्षेत्र पर कब्जा करने की क्षमता
शोध में पाया गया है कि बुलबुल का स्वभाव बेहद क्षेत्रीय (Territorial) और आक्रामक है। यह न केवल अपने घोंसले की रक्षा करती है, बल्कि दूसरे पक्षियों के घोंसलों पर कब्जा भी कर लेती है। यह खास तौर पर मिलन काल (Breeding Season) में अपने क्षेत्र को बचाने के लिए बेहद हिंसक हो जाती है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि बुलबुल की यह प्रवृत्ति उसकी जीन संरचना से जुड़ी है — यानी इसके डीएनए में ही यह स्वभाव कोडित है।इस अध्ययन से यह भी सामने आया कि बुलबुल की अनुकूलन क्षमता (Adaptability) असाधारण है| यह पक्षी चाहे पहाड़ी क्षेत्र हो या गर्म शहर, हर वातावरण में खुद को ढाल लेती है।
IISER भोपाल की टीम और उनका शोध
इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर विनीत के. शर्मा ने किया। उनके साथ शोधार्थी मार्टिन अब्राहम, मनोहर एस. बिष्ट, पुथुमाना और मिताली सिंह शामिल थे।
टीम ने पहली बार बुलबुल के माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम (Mitochondrial Genome) और मार्कर जीन (Marker Genes) का अनुक्रमण किया। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का “पावरहाउस” कहा जाता है — यानी वह ऊर्जा पैदा करने का केंद्र है। उनके अध्ययन में पाया गया कि बुलबुल के जीनोम में 37 मुख्य जीन हैं, जिनमें से कई का संबंध इसके व्यवहार, प्रवृत्ति और पर्यावरणीय अनुकूलन से है।
संरक्षण और पर्यावरण के लिए इसका महत्व
यह अध्ययन केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं है। इससे वैज्ञानिक अब यह समझ पाएंगे कि किसी पक्षी की प्रजाति अपने पर्यावरण में कैसे बदलाव करती है, और मानव गतिविधियों के कारण किस हद तक प्रभावित होती है। बुलबुल जैसे पक्षी इकोसिस्टम बैलेंस (Ecosystem Balance) बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ये बीज फैलाने, पौधों के परागण और कीट नियंत्रण में योगदान देते हैं।
लेकिन जब कोई प्रजाति अत्यधिक आक्रामक हो जाती है, तो वह दूसरी प्रजातियों को नुकसान भी पहुंचा सकती है। इसलिए, इस शोध से यह भी तय करने में मदद मिलेगी कि बुलबुल जैसी प्रजातियों का संरक्षण किस संतुलन में किया जाए।
दुनिया में पहली बार बुलबुल का जीनोम – क्यों ऐतिहासिक है यह उपलब्धि?
अब तक कई पक्षियों जैसे कबूतर, गौरैया और तोते की जीनोम सिक्वेंसिंग की जा चुकी थी, लेकिन बुलबुल जैसी आम परंतु जटिल प्रजाति का जीनोम पहली बार डिकोड किया गया है। यह अध्ययन विज्ञान की अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है और दुनिया भर के पक्षीविज्ञानियों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। यह भविष्य में प्रजाति संरक्षण, जेनेटिक ब्रीडिंग, और यहां तक कि पर्यावरणीय बदलाव के प्रभावों के अध्ययन में एक आधारशिला साबित हो सकता है।
आक्रामकता का जीन – क्या इंसानों में भी होता है ऐसा?
इस अध्ययन ने एक और बड़ा सवाल उठाया है — क्या आक्रामकता केवल पशुओं में होती है या इंसानों के डीएनए में भी छिपी है? प्रोफेसर विनीत शर्मा बताते हैं कि “बुलबुल में पाए गए कुछ जीन, वही हैं जो इंसानों में ‘स्ट्रेस रिस्पॉन्स’ और ‘अड्रेनालिन रिलीज’ से जुड़े हैं।” यह दिखाता है कि प्रकृति के स्तर पर, व्यवहार और आक्रामकता का जीन संबंधी आधार सभी जीवों में समान हो सकता है।
आने वाले शोध की संभावनाएं
IISER की यह टीम अब आगे बुलबुल की अन्य प्रजातियों – जैसे White-eared Bulbul और Himalayan Bulbul – पर भी शोध की तैयारी कर रही है। इससे यह पता चलेगा कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में एक ही प्रजाति के डीएनए में क्या बदलाव आते हैं। शोधकर्ता इसे “Evolutionary Genomics of Songbirds” नामक अंतरराष्ट्रीय परियोजना से जोड़ने की योजना बना रहे हैं।
भोपाल के लिए गर्व का क्षण
यह उपलब्धि न केवल IISER भोपाल बल्कि पूरे मध्य प्रदेश और भारत के लिए गौरव की बात है। एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक भारत को तकनीकी शक्ति मान रहे हैं, वहीं यह शोध दिखाता है कि भारत अब मौलिक जैव अनुसंधान (Fundamental Biological Research) में भी अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष – बुलबुल का रहस्य और मानवता के लिए सबक
इस शोध से हम यह सीखते हैं कि प्रकृति के हर जीव में एक अनूठी कहानी छिपी होती है। बुलबुल, जो अपने मधुर गीतों के लिए जानी जाती है, असल में प्रकृति की एक जटिल रचना है — जिसमें भावनाएँ, रणनीति और अस्तित्व की लड़ाई सब कुछ शामिल है। यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह उस हर चिड़िया, फूल और हवा की सांस में मौजूद है जो हमारे आस-पास है।
