मध्य पूर्व की राजनीति लंबे समय से वैश्विक कूटनीति का केंद्र रही है। इस क्षेत्र में होने वाला हर बड़ा फैसला न केवल आसपास के देशों को प्रभावित करता है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। इसी पृष्ठभूमि में इस्राइल ने एक ऐसा कूटनीतिक कदम उठाया है, जिसने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस्राइल ने संयुक्त राष्ट्र की सात एजेंसियों और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ तत्काल प्रभाव से सभी प्रकार के संबंध समाप्त करने का ऐलान कर दिया है।

इस फैसले को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे इस्राइल की बदलती विदेश नीति और वैश्विक मंचों पर अपने प्रति हो रहे व्यवहार के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश के रूप में समझा जा रहा है। इस्राइल का कहना है कि कई संयुक्त राष्ट्र संस्थाएं वर्षों से उसके खिलाफ पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रही हैं और बार-बार उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की कोशिश कर रही हैं।
बढ़ते तनाव के बीच लिया गया फैसला
पिछले कुछ वर्षों में इस्राइल और संयुक्त राष्ट्र के रिश्तों में लगातार खटास देखी गई है। गाजा संघर्ष, वेस्ट बैंक की स्थिति, नागरिकों की सुरक्षा, और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र मंचों पर इस्राइल की तीखी आलोचना होती रही है। इस्राइल का आरोप है कि इन आलोचनाओं में निष्पक्षता का अभाव है और कई बार उसे आतंकवादी संगठनों के समान स्तर पर रखकर पेश किया जाता है, जो किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए स्वीकार्य नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में इस्राइल के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह जानकारी सार्वजनिक की कि वह संयुक्त राष्ट्र की कुछ एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों से पहले ही संबंध तोड़ चुका था, जबकि कुछ अन्य संस्थाओं से अब औपचारिक रूप से नाता खत्म किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार, यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा, निष्पक्षता और संप्रभुता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
अमेरिका की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय संकेत
इस फैसले के समय को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया कि अमेरिका की हालिया घोषणाओं में जिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का उल्लेख हुआ था, उनमें से कई के साथ इस्राइल पहले से ही सहयोग समाप्त कर चुका था। अब बाकी संस्थाओं के साथ भी औपचारिक दूरी बनाकर इस्राइल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी ऐसे मंच का हिस्सा नहीं बनेगा, जहां उसके खिलाफ एकतरफा माहौल बनाया जाए।
यह कदम इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि इस्राइल अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपनी नीति को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। वह यह दिखाना चाहता है कि वैश्विक मंचों पर मान्यता और सहयोग तभी संभव है, जब निष्पक्षता और संतुलन का पालन किया जाए।
पहले से किन संस्थाओं से संबंध टूट चुके थे
इस्राइल ने स्पष्ट किया कि कुछ संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं के साथ उसके रिश्ते पहले ही समाप्त हो चुके थे। इनमें सशस्त्र संघर्ष में बच्चों के मुद्दे पर काम करने वाले महासचिव के विशेष प्रतिनिधि का कार्यालय शामिल है। इस्राइल का आरोप है कि इस कार्यालय ने वर्ष 2024 में इस्राइली रक्षा बलों को एक विवादित काली सूची में डाल दिया था, जिसे इस्राइल ने एकतरफा और राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम बताया।
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी संस्था पर भी इस्राइल ने गंभीर आरोप लगाए हैं। इस्राइल का कहना है कि 7 अक्टूबर 2023 को इस्राइली महिलाओं के खिलाफ हुए यौन अपराधों को इस संस्था ने नजरअंदाज किया और इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी, जो उसके अनुसार अस्वीकार्य है।
व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन तथा पश्चिमी एशिया के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक आयोग जैसी संस्थाओं पर भी वर्षों से इस्राइल विरोधी रिपोर्टें जारी करने का आरोप लगाया जाता रहा है। इस्राइल का कहना है कि इन रिपोर्टों में तथ्यों की अनदेखी कर उसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया।
अब किन नए संगठनों से नाता तोड़ा गया
इस ताजा घोषणा में जिन नए संगठनों से इस्राइल ने संबंध समाप्त किए हैं, उनमें संयुक्त राष्ट्र सभ्यताओं का गठबंधन, संयुक्त राष्ट्र ऊर्जा से जुड़े मंच और प्रवासन व विकास पर वैश्विक मंच शामिल हैं। इस्राइल का आरोप है कि इन मंचों का इस्तेमाल अक्सर उसके बिना उसकी आलोचना करने और उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय माहौल तैयार करने के लिए किया गया।
इस्राइल का मानना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच का उद्देश्य संवाद और समाधान होना चाहिए, न कि किसी एक देश को निशाना बनाना। जब मंच इस सिद्धांत से भटक जाते हैं, तो उनके साथ सहयोग जारी रखना व्यावहारिक नहीं रह जाता।
इस्राइल का पक्ष: निष्पक्षता और राष्ट्रीय हित
इस पूरे घटनाक्रम में इस्राइल ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि वह संयुक्त राष्ट्र या अंतरराष्ट्रीय सहयोग के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह केवल उस चयनात्मक व्यवहार का विरोध कर रहा है, जिसमें उसे अलग-थलग किया जाता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, कुछ अंतरराष्ट्रीय मंचों ने इस्राइल को आतंकवादी संगठनों के समान स्तर पर रखकर पेश किया, जो एक लोकतांत्रिक और संप्रभु राष्ट्र के लिए अस्वीकार्य है।
इस्राइल का यह भी कहना है कि आने वाले समय में वह अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका की समीक्षा करेगा। यदि यह पाया गया कि कोई मंच निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा है, तो उसके खिलाफ भी इसी तरह के कदम उठाए जा सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक राजनीति पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से इस्राइल और संयुक्त राष्ट्र के रिश्तों में और तनाव आ सकता है। इससे न केवल कूटनीतिक संवाद सीमित होगा, बल्कि मध्य पूर्व के जटिल समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है। कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि इस्राइल की भूमिका अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीमित हो सकती है, जिससे भविष्य में होने वाली बहुपक्षीय चर्चाओं में उसकी आवाज कम सुनी जा सकती है।
हालांकि, इस्राइल का तर्क है कि सहयोग तभी सार्थक होता है, जब सभी पक्षों के साथ समान व्यवहार किया जाए। उसके अनुसार, राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं और किसी भी कीमत पर उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या यह दीर्घकालिक रणनीति है
इस फैसले को केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जा रहा। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्राइल की दीर्घकालिक विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने खिलाफ हो रहे कथित पक्षपात का खुलकर विरोध करेगा। यह रणनीति घरेलू राजनीति में भी संदेश देती है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे पर किसी भी दबाव में नहीं झुकेगी।
निष्कर्ष: बदलते वैश्विक रिश्तों का संकेत
इस्राइल का यह कदम वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और राष्ट्रों के बीच रिश्ते अब केवल औपचारिक नहीं रहे, बल्कि वे परस्पर विश्वास, निष्पक्षता और सम्मान पर आधारित होते जा रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाएं इस फैसले पर कैसे प्रतिक्रिया देती हैं और क्या इससे मध्य पूर्व की राजनीति में कोई नया मोड़ आता है।
