देश के शहरी इलाकों से लेकर कस्बों और कॉलोनियों तक, आवारा कुत्तों का मुद्दा लंबे समय से आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बना हुआ है। बच्चों का स्कूल जाना, बुजुर्गों का सुबह-शाम टहलना और आम नागरिकों का सड़कों पर सुरक्षित चलना कई जगहों पर डर और असुरक्षा के साए में है। आए दिन कुत्तों के काटने की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें कई बार मासूम बच्चे और बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, तो कई मामलों में जान तक चली जाती है।

इसी पृष्ठभूमि में 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को कुत्ता काटता है और वह जख्मी होता है या उसकी मौत होती है, तो इसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी और उन्हें पीड़ित या उसके परिजनों को मुआवजा देना होगा।
यह फैसला सिर्फ कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि राज्यों, स्थानीय प्रशासन और समाज तीनों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी है कि अब इस समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दिल्ली-एनसीआर से लेकर देशभर में बढ़ता संकट
बीते कुछ वर्षों में खासकर दिल्ली-एनसीआर और बड़े महानगरों में आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रिहायशी इलाकों, पार्कों, स्कूलों के आसपास और अस्पतालों तक में कुत्तों के झुंड देखे जा सकते हैं। कई जगहों पर लोग सुबह या देर शाम घर से निकलने से डरने लगे हैं।
अक्सर यह तर्क दिया जाता रहा है कि पशु प्रेम और मानवीय संवेदनाओं के नाम पर कुत्तों को खुले में खाना खिलाया जाना चाहिए। लेकिन जब यही कुत्ते आक्रामक होकर लोगों पर हमला करने लगते हैं, तब यह सवाल खड़ा होता है कि आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में इसी मूल सवाल को केंद्र में रखा है और साफ किया है कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और चेतावनी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि यदि किसी बच्चे या बुजुर्ग को कुत्ते के काटने से चोट लगती है या उनकी मृत्यु होती है, तो राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा देना राज्यों की कानूनी जिम्मेदारी होगी।
न्यायालय का यह रुख इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ सहानुभूति या संवेदना के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस जवाबदेही के आधार पर इस समस्या से निपटा जाएगा।
कुत्तों को खाना खिलाने वालों पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जो लोग आवारा कुत्तों को सार्वजनिक जगहों पर खाना खिलाते हैं, उन्हें भी इस समस्या की जिम्मेदारी समझनी चाहिए। अदालत ने साफ कहा कि यदि कोई व्यक्ति कुत्तों को खाना खिलाता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे दूसरों के लिए खतरा न बनें।
जस्टिस विक्रम नाथ ने यहां तक कहा कि अगर लोग कुत्तों से इतना प्रेम करते हैं, तो उन्हें अपने घर ले जाएं और वहीं उनकी देखभाल करें। उन्हें सड़कों पर छोड़कर आम लोगों के लिए डर और खतरा पैदा करना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
यह टिप्पणी पशु प्रेम और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की ओर इशारा करती है।
राज्य सरकारों की भूमिका और जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकारों की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। अब यह सिर्फ नगर निगम या स्थानीय प्रशासन का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि सीधे राज्य सरकारों की जवाबदेही से जुड़ गया है।
इस आदेश का अर्थ यह भी है कि यदि भविष्य में कुत्तों के हमले की कोई घटना होती है और पीड़ित को मुआवजा देना पड़ता है, तो राज्य सरकारों को अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा।
आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास और उनकी संख्या नियंत्रण जैसे उपायों को अब सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सर्वोपरि
अदालत ने विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों का उल्लेख किया, क्योंकि यही वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित होता है। छोटे बच्चे अक्सर खेलते समय या स्कूल जाते हुए कुत्तों का शिकार बन जाते हैं। वहीं बुजुर्गों के लिए अचानक हमला जानलेवा साबित हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है कि अब इन कमजोर वर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संदेश दिया गया है।
मुआवजा केवल समाधान नहीं, चेतावनी भी
कुत्ते के काटने पर मुआवजा देना अपने आप में समाधान नहीं है। यह एक चेतावनी है कि यदि राज्य सरकारें समय रहते ठोस कदम नहीं उठातीं, तो उन्हें आर्थिक और कानूनी दोनों स्तरों पर इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
यह फैसला प्रशासनिक उदासीनता पर भी सवाल उठाता है। कई बार स्थानीय स्तर पर शिकायतें होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, जिसका खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।
पशु प्रेम और मानव सुरक्षा का संतुलन
यह मुद्दा केवल कानून या प्रशासन तक सीमित नहीं है। यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा है। पशु प्रेम जरूरी है, लेकिन मानव जीवन और सुरक्षा की कीमत पर नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि भावनाओं के साथ-साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाना, बिना उनके व्यवहार और सुरक्षा पर विचार किए, समस्या को और बढ़ा सकता है।
आगे क्या बदलेगा
इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकारें आवारा कुत्तों से जुड़ी नीतियों को गंभीरता से लागू करेंगी। नगर निकायों की जवाबदेही तय होगी और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा।
साथ ही, आम नागरिकों में भी यह संदेश जाएगा कि केवल शिकायत करना ही काफी नहीं, बल्कि सामूहिक सोच और जिम्मेदार व्यवहार भी जरूरी है।
एक सामाजिक बहस की शुरुआत
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी सामाजिक बहस की शुरुआत भी है। यह सवाल अब और मुखर होकर सामने आएगा कि शहरों और कस्बों में इंसानों और जानवरों के सह-अस्तित्व का संतुलन कैसे बनाया जाए।
जहां एक ओर करुणा और संवेदना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा और व्यवस्था भी उतनी ही अहम है। यही संतुलन भविष्य की नीतियों का आधार बनेगा।
