दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने यह दावा किया है कि वर्ष 2025 में दुनियाभर में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव के मामलों में ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 38 करोड़ 80 लाख ईसाई किसी न किसी रूप में प्रताड़ना का शिकार हुए हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया जा रहा है। यह संख्या न केवल चिंताजनक है, बल्कि वैश्विक स्तर पर धार्मिक सहिष्णुता की स्थिति पर भी सवाल खड़े करती है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 की तुलना में 2025 में करीब 80 लाख अधिक ईसाइयों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं दर्ज की गईं। अध्ययन करने वाले संगठनों का कहना है कि यह वृद्धि अचानक नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों से लगातार बन रहे माहौल का नतीजा है। धार्मिक पहचान के आधार पर होने वाली हिंसा, सामाजिक बहिष्कार, कानूनी पाबंदियां और मानसिक दबाव जैसे कारक इस बढ़ोतरी के पीछे बताए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिन 38.8 करोड़ ईसाइयों के उत्पीड़न का दावा किया गया है, उनमें से 20 करोड़ से अधिक महिलाएं और लड़कियां हैं। इसके अलावा लगभग 11 करोड़ पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं। यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि हिंसा और भेदभाव का असर केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे गहरा प्रभाव बच्चों और महिलाओं पर पड़ रहा है।
इस वैश्विक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि दुनिया के 15 देशों में ईसाइयों के लिए हालात सबसे अधिक खतरनाक बताए गए हैं। इन देशों में उत्पीड़न का स्तर ‘बहुत ज्यादा’ श्रेणी में रखा गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस सूची में भारत का नाम भी शामिल किया गया है। रिपोर्ट में भारत को 12वां स्थान दिया गया है और 100 में से 84 अंक दिए गए हैं, जो इस श्रेणी में गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
सूची में सबसे ऊपर उत्तर कोरिया को रखा गया है, जहां ईसाई होना सबसे ज्यादा जोखिम भरा बताया गया है। इसके अलावा सोमालिया, इरिट्रिया, लीबिया, अफगानिस्तान, यमन, सूडान, माली, नाइजीरिया, पाकिस्तान, ईरान, भारत, सऊदी अरब, म्यांमार और सीरिया जैसे देशों का नाम शामिल है। रिपोर्ट का दावा है कि इन देशों में ईसाइयों को न केवल सामाजिक और धार्मिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, बल्कि कई मामलों में जान का खतरा भी बना रहता है।
सीरिया को लेकर रिपोर्ट में विशेष चिंता जताई गई है। कहा गया है कि वहां ईसाइयों के खिलाफ हिंसा ‘बहुत ज्यादा’ स्तर तक पहुंच चुकी है। आंकड़ों के अनुसार, सीरिया में अब केवल लगभग तीन लाख ईसाई बचे हैं, जबकि एक दशक पहले यह संख्या कई गुना अधिक थी। गृहयुद्ध, कट्टरपंथी हिंसा और लगातार अस्थिरता ने वहां ईसाई समुदाय को लगभग खत्म होने की कगार पर ला खड़ा किया है।
अफ्रीकी देशों की स्थिति भी बेहद गंभीर बताई गई है। विशेष रूप से सब-सहारा अफ्रीका को ईसाइयों के लिए सबसे खतरनाक इलाकों में से एक बताया गया है। वर्ष 2025 में इस क्षेत्र में ईसाइयों की हत्याओं की संख्या बढ़कर 4,849 तक पहुंच गई, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 4,476 था। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 13 ईसाइयों की हत्या की गई। इनमें से सबसे अधिक घटनाएं नाइजीरिया में दर्ज की गईं, जहां अकेले 3,490 ईसाइयों की हत्या का दावा किया गया है। यह संख्या दुनिया भर में मारे गए कुल ईसाइयों का लगभग 70 प्रतिशत बताई गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सब-सहारा अफ्रीका में ईसाई होने के कारण हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। हालांकि अपहरण के मामलों में थोड़ी कमी दर्ज की गई है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा, जबरन विवाह और यौन उत्पीड़न के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई है। यह पहलू रिपोर्ट को और भी गंभीर बना देता है।
भारत को लेकर रिपोर्ट में किए गए दावे सबसे ज्यादा विवादास्पद साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट का कहना है कि भारत में धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने वालों को विशेष रूप से सामाजिक भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसमें यह दावा किया गया है कि कुछ समूह भारतीय पहचान को केवल एक धर्म से जोड़कर देखते हैं, जिससे अन्य धार्मिक समुदायों के लिए मुश्किलें खड़ी होती हैं।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत में धार्मिक राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण ईसाई समुदाय के खिलाफ व्यवस्थित भेदभाव देखने को मिलता है। इसमें कहा गया है कि धर्म प्रचार की गतिविधियां जोखिम भरी होती जा रही हैं और सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत जानकारियां और आरोप हिंसा को और बढ़ावा देते हैं।
हालांकि भारत को लेकर किए गए इन दावों पर कई सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट का नजरिया एकतरफा है और इसमें भारत के सामाजिक और कानूनी ढांचे की जटिलताओं को नजरअंदाज किया गया है। उनका तर्क है कि भारत में धर्म परिवर्तन को लेकर जो बहस है, वह हिंसा से ज्यादा कानून, सामाजिक संतुलन और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रिपोर्टें केवल आंकड़ों का खेल नहीं होतीं, बल्कि इनके पीछे वैश्विक राजनीति, धार्मिक संस्थाओं की चिंताएं और वैचारिक टकराव भी शामिल होते हैं। भारत को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि धर्म परिवर्तन के खिलाफ उठने वाली आवाजों को सीधे तौर पर उत्पीड़न के रूप में पेश किया गया है, जबकि जमीनी हकीकत कहीं अधिक जटिल है।
इसके बावजूद, यह रिपोर्ट एक बड़े सवाल की ओर इशारा जरूर करती है। दुनिया भर में धार्मिक असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और क्यों धार्मिक पहचान के आधार पर लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं। क्या यह केवल कुछ देशों की समस्या है या फिर यह एक वैश्विक प्रवृत्ति बनती जा रही है।
भारत जैसे विविधता भरे देश के लिए यह रिपोर्ट खास मायने रखती है। यहां सैकड़ों धर्म, पंथ और परंपराएं सदियों से साथ-साथ रही हैं। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत का नाम आना स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। यह बहस केवल भारत की छवि की नहीं, बल्कि उस संतुलन की है, जहां धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक एकता दोनों साथ चल सकें।
