ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह बीते दो दशकों से भारत की विदेश नीति, व्यापारिक रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन का एक अहम स्तंभ रहा है। यह बंदरगाह केवल एक समुद्री ढांचा नहीं, बल्कि भारत के उस दीर्घकालिक दृष्टिकोण का प्रतीक है जिसके तहत वह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और आगे यूरोप तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है। लेकिन वर्ष 2026 की शुरुआत में जैसे ही अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की, चाबहार एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले के बाद भारत में यह बहस तेज हो गई कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रख पाएगा या फिर उसे वैश्विक दबावों के आगे झुकना पड़ेगा। ईरान के साथ भारत का कुल व्यापार भले ही सीमित हो, लेकिन चाबहार का महत्व आंकड़ों से कहीं आगे जाता है। यह बंदरगाह भारत को उस भू-राजनीतिक नक्शे पर मजबूती से खड़ा करता है जहां चीन पहले से पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुका है।
भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर बातचीत की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी। उस समय भारत ने यह महसूस किया कि पाकिस्तान के साथ बिगड़ते रिश्तों और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच उसे वैकल्पिक व्यापार मार्गों की सख्त जरूरत है। इसी सोच से इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की परिकल्पना सामने आई, जो भारत को ईरान, अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशिया से जोड़ता है। चाबहार इस पूरे कॉरिडोर का प्रवेश द्वार माना गया।
हालांकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस परियोजना की रफ्तार को बार-बार प्रभावित किया। कई बार ऐसा लगा कि यह परियोजना कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। लेकिन 2016 में भारत के प्रधानमंत्री के ईरान दौरे के बाद इस दिशा में ठोस प्रगति देखने को मिली। वर्षों बाद 2019 में पहली बार अफगानिस्तान से भारत तक माल चाबहार के रास्ते पहुंचा, जिसने इस परियोजना की व्यवहारिकता को साबित किया।
वर्ष 2024 में भारत और ईरान के बीच चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को लेकर दस साल का समझौता हुआ। इसे उस समय भारत सरकार की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया गया। संदेश साफ था कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर किसी तीसरे देश का दबाव स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन अब, जब अमेरिकी प्रतिबंध-छूट की मियाद अप्रैल 2026 में खत्म होने वाली है, हालात फिर बदलते नजर आ रहे हैं।
हाल ही में आई रिपोर्टों में दावा किया गया कि भारत ने चाबहार परियोजना से रणनीतिक रूप से दूरी बनानी शुरू कर दी है। कहा गया कि भारत ने अपनी निवेश राशि पहले ही स्थानांतरित कर दी है और संचालन से जुड़ी भारतीय सरकारी कंपनी ने औपचारिक रूप से कदम पीछे खींच लिए हैं। इन खबरों ने राजनीतिक गलियारों से लेकर रणनीतिक विशेषज्ञों तक में हलचल मचा दी।
भारत सरकार ने इन अटकलों के बीच यह स्पष्ट किया कि वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ लगातार संपर्क में है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत जारी है और भारत घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है। सरकार का यह भी कहना है कि ईरान के साथ भारत के संबंध लंबे समय से चले आ रहे हैं और उन्हें अचानक खत्म नहीं किया जा सकता।
इसके बावजूद विपक्षी दलों और कई वरिष्ठ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत बार-बार अमेरिका के दबाव में अपने फैसले बदल रहा है। उनका तर्क है कि 2019 में ईरान से तेल आयात बंद करने से लेकर अब चाबहार को लेकर अनिश्चितता तक, हर कदम में भारत के दीर्घकालिक हित कमजोर हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि इन फैसलों का सबसे बड़ा फायदा चीन को मिला है, जो आज भी ईरान से सस्ते दामों पर तेल खरीद रहा है।
रणनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चाबहार से पीछे हटना भारत के लिए केवल एक आर्थिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा। ग्वादर पोर्ट के जरिए चीन पहले से ही हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। ऐसे में चाबहार भारत के लिए एक जरूरी जवाब माना जाता रहा है।
दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत के विकल्प सीमित हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीक और सैन्य ताकत के सामने खुला टकराव भारत के लिए जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि जब देश औपचारिक सैन्य गठबंधनों से दूर रहना चाहता है, तो उसे अपने फैसलों में व्यावहारिक संतुलन बनाना पड़ता है।
इस पूरी बहस के बीच भारत की विदेश नीति की मूल अवधारणा, यानी मल्टीपोलर संतुलन, फिर चर्चा में है। विचार यह है कि भारत किसी एक शक्ति खेमे में बंधने के बजाय सभी प्रमुख देशों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखे। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह संतुलन साधना पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है।
चाबहार को लेकर उठे सवाल केवल एक बंदरगाह तक सीमित नहीं हैं। यह बहस भारत की उस व्यापक रणनीति को लेकर है जिसमें वह खुद को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। क्या भारत आने वाले समय में अपने निर्णय पूरी तरह स्वायत्त रूप से ले पाएगा या फिर उसे बार-बार वैश्विक दबावों के बीच समझौते करने पड़ेंगे, यह सवाल अभी खुला हुआ है।
