डिजिटल युग ने जहां जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं इसने अपराध के नए और खतरनाक रास्ते भी खोल दिए हैं। तकनीक का दुरुपयोग कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित साइबर गिरोह अब आम नागरिकों को ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित और पेशेवर लोगों को भी निशाना बना रहे हैं। ऐसा ही एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें कंबोडिया और नेपाल में बैठे हैंडलरों ने भारत के अलग-अलग राज्यों में फैले साइबर स्लीपर सेल के जरिए एक एनआरआई डॉक्टर दंपती को 17 दिनों तक तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखकर 14.85 करोड़ रुपये की ठगी को अंजाम दिया।

यह मामला न केवल ठगी की बड़ी रकम के कारण गंभीर है, बल्कि इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें शामिल आरोपियों की सामाजिक पहचान और पेशेवर पृष्ठभूमि चौंकाने वाली है। कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट है, कोई पुजारी, कोई आईटी एक्सपर्ट, तो कोई निजी संस्थानों में नौकरी करने वाला पढ़ा-लिखा युवक।
डिजिटल अरेस्ट: डर, भ्रम और मनोवैज्ञानिक दबाव का खेल
ग्रेटर कैलाश में रहने वाले एनआरआई डॉक्टर दंपती की कहानी यह दिखाती है कि साइबर अपराधी किस तरह डर और भ्रम का इस्तेमाल कर लोगों को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। 24 दिसंबर को डॉक्टर दंपती के पास एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने दावा किया कि उनके नाम पर रजिस्टर्ड एक सिम कार्ड मनी लॉन्ड्रिंग केस में इस्तेमाल हुआ है।
इसके बाद उन्हें वीडियो कॉल पर जोड़ा गया, जहां खुद को सीबीआई और पुलिस अधिकारी बताने वाले लोगों ने बातचीत शुरू की। फर्जी पहचान, नकली वर्दी, सरकारी भाषा और तकनीकी शब्दों के सहारे आरोपियों ने डॉक्टर दंपती को यह यकीन दिला दिया कि वे एक गंभीर अपराध में फंस चुके हैं।
कुछ ही समय में उन्हें कथित अरेस्ट वारंट दिखाया गया, फर्जी कोर्ट की कार्यवाही कराई गई और यहां तक कि डुप्लीकेट कोर्ट के जरिए सजा सुनाए जाने का नाटक भी किया गया। इस पूरे घटनाक्रम में पीड़ितों को मानसिक रूप से इस कदर घेर लिया गया कि वे 17 दिनों तक खुद को ‘डिजिटल अरेस्ट’ में मान बैठे।
17 दिनों में 14.85 करोड़ की लूट
डिजिटल अरेस्ट के दौरान साइबर अपराधियों ने डॉक्टर दंपती को लगातार निगरानी में रखा। उन्हें फोन और वीडियो कॉल के जरिए निर्देश दिए जाते रहे कि वे किसी से संपर्क न करें और केवल दिए गए आदेशों का पालन करें।
आरोपियों ने दंपती को उनके फिक्स्ड डिपॉजिट, शेयर निवेश और अन्य वित्तीय संसाधनों के बारे में जानकारी देने के लिए मजबूर किया। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया गया और अलग-अलग खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए।
इस तरह कुल 14,84,26,954 रुपये अलग-अलग म्यूल बैंक अकाउंट्स में ट्रांसफर करा लिए गए। यह रकम दर्शाती है कि साइबर अपराधी केवल तकनीक का ही नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान का भी गहराई से अध्ययन कर चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय हैंडलर और भारतीय स्लीपर सेल
जांच में सामने आया कि इस पूरे साइबर फ्रॉड का संचालन कंबोडिया और नेपाल में बैठे हैंडलर कर रहे थे। भारत में मौजूद आरोपी उनके निर्देशों पर काम कर रहे थे। इन्हें साइबर स्लीपर सेल कहा जा सकता है, जो सामान्य जीवन जीते हुए सही समय पर सक्रिय होते हैं।
ये स्लीपर सेल पैसे निकालने, म्यूल बैंक अकाउंट खरीदने और ऑपरेट करने, डिजिटल टूल्स के जरिए ट्रांजैक्शन छुपाने और रकम को आगे ट्रांसफर करने का काम करते थे।
कई राज्यों में एक साथ छापेमारी
जैसे ही मामले की गंभीरता सामने आई, विशेष साइबर यूनिट ने डिजिटल फुटप्रिंट्स, टेक्निकल सर्विलांस और ग्राउंड इंटेलिजेंस का गहन विश्लेषण शुरू किया। इस विश्लेषण के आधार पर देश के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ छापेमारी की गई।
वडोदरा, वाराणसी, प्रयागराज, लखनऊ और भुवनेश्वर जैसे शहरों में की गई इन कार्रवाइयों में कुल आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इससे पूरे नेटवर्क की परतें खुलती चली गईं।
म्यूल अकाउंट्स का जाल और पहली गिरफ्तारी
जांच का पहला ठोस सुराग तब मिला जब म्यूल अकाउंट होल्डर्स में से एक, वडोदरा निवासी पटेल दिव्यांग तक पुलिस पहुंची। उसके बैंक अकाउंट में पीड़ित डॉक्टर दंपती के खाते से सीधे चार करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए थे।
पटेल की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में कई अहम जानकारियां सामने आईं। इसी कड़ी में वडोदरा से ही एक अन्य आरोपी शितोले कृतिक को भी गिरफ्तार किया गया।
नेटवर्क की परतें खुलती गईं
वडोदरा के बाद जांच भुवनेश्वर तक पहुंची, जहां से महावीर शर्मा को गिरफ्तार किया गया। इसके साथ ही अंकित मिश्रा को भी उसी समय वडोदरा से पकड़ा गया।
जांच आगे बढ़ी तो वाराणसी में अरुण कुमार तिवारी की गिरफ्तारी हुई, जिसके खाते में 2.10 करोड़ रुपये आए थे। उसकी निशानदेही पर प्रद्युम्न तिवारी को भी वाराणसी से गिरफ्तार किया गया।
लखनऊ में भूपेंद्र मिश्रा और आदेश यादव को पकड़ा गया। इन सभी की गिरफ्तारी के बाद यह साफ हो गया कि यह कोई स्थानीय गिरोह नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का हिस्सा है।
आरोपियों की चौंकाने वाली सामाजिक पहचान
इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात आरोपियों की शैक्षणिक और सामाजिक पृष्ठभूमि है। मुख्य आरोपी पटेल दिव्यांग चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी कर चुका है और ‘फ्लोरेस्टा फाउंडेशन’ के नाम से एक एनजीओ भी चलाता है।
दूसरा आरोपी शितोले कृतिक न्यूजीलैंड से आईटी में डिप्लोमा होल्डर है। तीसरा आरोपी अरुण कुमार तिवारी आयकर कार्यालय के बाहर निजी डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में काम करता था।
महावीर शर्मा बीकॉम पास है, जबकि प्रद्युम्न तिवारी वाराणसी के घाटों पर पुजारी के रूप में कार्य करता है। अंकित मिश्रा एसबीआई कैप सिक्योरिटीज में सेल्स एग्जीक्यूटिव रहा है। भूपेंद्र मिश्रा एमबीए करने के बाद नौकरी कर रहा था और आदेश यादव छात्रों को ट्यूशन व प्राइवेट कोचिंग देता था।
इन प्रोफाइल्स से यह स्पष्ट होता है कि साइबर अपराध अब केवल बेरोजगारी या गरीबी से जुड़ा मामला नहीं रहा, बल्कि पढ़े-लिखे और समाज में सम्मानित माने जाने वाले लोग भी इसमें शामिल हो रहे हैं।
एडवांस्ड डिजिटल टूल्स और तकनीकी चालें
इस साइबर सिंडिकेट ने ठगी के लिए अत्याधुनिक डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल किया। फर्जी वीडियो कॉल सेटअप, नकली सरकारी पहचान, वर्चुअल बैकग्राउंड और तकनीकी शब्दावली के सहारे पीड़ितों को भ्रमित किया गया।
म्यूल बैंक अकाउंट्स के जरिए पैसे को कई हिस्सों में बांटकर ट्रांसफर किया गया ताकि जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके। यह तकनीक दर्शाती है कि गिरोह ने साइबर सुरक्षा और बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों का गहराई से अध्ययन किया था।
जांच टीम और समन्वित प्रयास
इस पूरे ऑपरेशन में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही। डिजिटल एनालिसिस से लेकर जमीनी स्तर पर छापेमारी तक, हर चरण में समन्वित प्रयास देखने को मिला।
टीम ने कथित बैंक अकाउंट्स की विस्तृत जानकारी जुटाई, ट्रांजैक्शन पैटर्न का विश्लेषण किया और तकनीकी सर्विलांस के जरिए आरोपियों की लोकेशन ट्रैक की।
साइबर अपराध का बदलता स्वरूप
यह मामला बताता है कि साइबर अपराध अब केवल फिशिंग ईमेल या छोटे ऑनलाइन फ्रॉड तक सीमित नहीं रहा। अब इसमें मनोवैज्ञानिक दबाव, फर्जी न्यायिक प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क शामिल हो चुके हैं।
डिजिटल अरेस्ट जैसे नए शब्द और तरीके आम लोगों के लिए भय का कारण बनते जा रहे हैं। ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है।
आम नागरिकों के लिए चेतावनी
इस घटना से यह स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही शिक्षित या आर्थिक रूप से सक्षम क्यों न हो, साइबर अपराधियों का शिकार बन सकता है। अनजान कॉल, वीडियो कॉल पर सरकारी अधिकारी होने का दावा और त्वरित कार्रवाई का दबाव, ये सभी खतरे के संकेत हैं।
किसी भी संदिग्ध कॉल या डिजिटल धमकी की स्थिति में तुरंत स्थानीय प्रशासन और साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना ही सुरक्षित रास्ता है।
