भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में गिने जाने वाले पद्म पुरस्कारों की घोषणा हर वर्ष गणतंत्र दिवस के आसपास होती है। वर्ष 2026 के पद्म अवॉर्ड्स का ऐलान आज होने जा रहा है और देशभर में उन लोगों की चर्चा है, जिन्होंने बिना शोर-शराबे के अपने क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया। इस बार की सूची खास इसलिए भी मानी जा रही है, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल हैं, जिन्हें “गुमनाम नायक” कहा जा सकता है। वे लोग, जिन्होंने न तो प्रसिद्धि की लालसा रखी और न ही प्रचार की, बल्कि चुपचाप समाज, संस्कृति, शिक्षा और मानवीय मूल्यों की सेवा करते रहे।

सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में कुल 45 व्यक्तियों को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। इन नामों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों से आने वाले लोग शामिल हैं। इन सभी का योगदान अलग-अलग क्षेत्रों में है, लेकिन इनकी सोच और कर्म एक ही सूत्र में बंधे दिखाई देते हैं—सेवा, समर्पण और समाज के प्रति जिम्मेदारी।
पद्म पुरस्कारों की परंपरा और महत्व
पद्म पुरस्कार भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल हैं। इन्हें तीन श्रेणियों में प्रदान किया जाता है—पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री। ये सम्मान कला, साहित्य, शिक्षा, समाज सेवा, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, खेल, उद्योग, व्यापार और सिविल सेवा जैसे विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिए जाते हैं।
इन पुरस्कारों का उद्देश्य केवल प्रसिद्ध हस्तियों को सम्मानित करना नहीं है, बल्कि उन लोगों को भी राष्ट्रीय मंच पर लाना है, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी समाज के लिए असाधारण काम किया। वर्ष 2026 की सूची इसी भावना को और मजबूती से सामने लाती है।
गुमनाम नायकों की श्रेणी में विशेष पहचान
इस वर्ष जिन नामों को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है, उनमें कई ऐसे व्यक्ति शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक अपने-अपने क्षेत्र में कार्य किया, लेकिन राष्ट्रीय पहचान से दूर रहे। मध्य प्रदेश के भगवान दास रायकवार, राजस्थान के गफरुद्दीन मेवाती और जम्मू-कश्मीर के ब्रिज लाल भट जैसे नाम इस श्रेणी में शामिल हैं।
इनके अलावा उत्तर प्रदेश के चिरंजी लाल यादव, गुजरात के धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या, छत्तीसगढ़ की बुधरी ताती, ओडिशा के चरण हेम्ब्रम, कर्नाटक के अंके गौड़ा और महाराष्ट्र की अरमिडा फर्नांडिस को भी गुमनाम नायकों की श्रेणी में पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।
राजस्थान के गफरुद्दीन मेवाती: लोकसंगीत की अनमोल धरोहर
राजस्थान के डीग जिले से ताल्लुक रखने वाले गफरुद्दीन मेवाती का नाम लोकसंगीत प्रेमियों के लिए किसी पहचान का मोहताज नहीं है। वे जोगी भपंग वादक और ‘पांडुन का कड़ा’ के एकमात्र गायक माने जाते हैं। पांडुन का कड़ा एक दुर्लभ लोकगायन शैली है, जिसे जीवित रखने का श्रेय लगभग पूरी तरह गफरुद्दीन मेवाती को जाता है।
उन्होंने इस लोककला को न सिर्फ अपने गांव और क्षेत्र में संरक्षित रखा, बल्कि देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया। गफरुद्दीन को पांडुन का कड़ा के 2500 से अधिक दोहे कंठस्थ हैं, जो उनकी साधना और समर्पण को दर्शाते हैं। वर्ष 2024 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। पद्मश्री 2026 का सम्मान उनके जीवन भर के योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति माना जा रहा है।
कर्नाटक के अंके गौड़ा: ज्ञान के लिए घर तक बेच दिया
कर्नाटक के मैसूर के पास हरालाहल्ली गांव के रहने वाले अंके गौड़ा की कहानी प्रेरणा से भरी हुई है। उन्होंने महज 20 साल की उम्र में बस कंडक्टर की नौकरी करते हुए किताबें इकट्ठा करना शुरू किया। धीरे-धीरे किताबों के प्रति उनका प्रेम जुनून में बदल गया।
अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्होंने किताबों पर खर्च किया और एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अपनी लाइब्रेरी के विस्तार के लिए अपना घर तक बेच दिया। आज उनकी ‘पुस्तक माने’ लाइब्रेरी में 20 लाख से अधिक दुर्लभ किताबें मौजूद हैं। यह लाइब्रेरी न सिर्फ कर्नाटक बल्कि पूरे देश के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का खजाना बन चुकी है। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री 2026 से सम्मानित किया जाएगा।
पूर्व डीआईजी इंद्रजीत सिंह सिद्धू: सेवा की मिसाल
पंजाब के 88 वर्षीय पूर्व डीआईजी इंद्रजीत सिंह सिद्धू का जीवन यह सिखाता है कि सेवा के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती। वे 1964 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे और 1996 में सेवानिवृत्त हुए। चंडीगढ़ के सेक्टर 49 में रहने वाले सिद्धू पिछले दस वर्षों से हर सुबह छह बजे सैनिटेशन कार्ट उधार लेकर सड़कों की सफाई करते हैं।
उनका यह कार्य न तो किसी पुरस्कार की उम्मीद में है और न ही किसी प्रशंसा के लिए। यह उनके भीतर की नागरिक जिम्मेदारी और समाज के प्रति प्रेम को दर्शाता है। पद्मश्री 2026 के माध्यम से देश उनके इस निस्वार्थ योगदान को सलाम कर रहा है।
छत्तीसगढ़ की बुधरी ताती: समाजसेवा का समर्पित जीवन
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हिरानार गांव की रहने वाली बुधरी ताती का जीवन संघर्ष और सेवा की मिसाल है। उन्होंने मात्र 15 वर्ष की उम्र से समाजसेवा शुरू कर दी थी। बस्तर क्षेत्र में महिलाओं को जागरूक करने, उन्हें शिक्षित करने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए।
बुधरी ताती ने वृद्धा आश्रम और अनाथ आश्रम की स्थापना कर जरूरतमंदों को सहारा दिया। उन्होंने समाजसेवा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और इसी कारण विवाह नहीं किया। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने बस्तर संभाग के करीब 545 गांवों की पदयात्रा की। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें ‘डॉक्टर’ की उपाधि भी दी गई है और अब तक वे 22 पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं, जिनमें तीन से अधिक राष्ट्रीय स्तर के सम्मान शामिल हैं। पद्मश्री 2026 उनके इस समर्पण को राष्ट्रीय पहचान देता है।
अन्य सम्मानित नाम और उनका योगदान
उत्तर प्रदेश के चिरंजी लाल यादव, गुजरात के धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या, ओडिशा के चरण हेम्ब्रम, महाराष्ट्र की अरमिडा फर्नांडिस और जम्मू-कश्मीर के ब्रिज लाल भट जैसे नाम भी इस सूची में शामिल हैं। इन सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में वर्षों तक निस्वार्थ सेवा की है। चाहे वह सामाजिक कार्य हो, सांस्कृतिक संरक्षण हो या शिक्षा और जनकल्याण का क्षेत्र, इन सभी का योगदान समाज के लिए अमूल्य रहा है।
पिछले वर्षों की परंपरा और निरंतरता
वर्ष 2025 में भी पद्म पुरस्कारों के जरिए देश ने कई दिग्गज और समर्पित व्यक्तित्वों को सम्मानित किया था। उस वर्ष शारदा सिन्हा और ओसामु सुजुकी समेत सात हस्तियों को पद्म विभूषण, जबकि पूर्व हॉकी गोलकीपर पीआर श्रीजेश, पंकज उधास और सुशील मोदी समेत 19 लोगों को पद्म भूषण दिया गया था। इसके अलावा राजस्थान की लोक गायिका बतूल बेगम और दिल्ली की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नीरजा भटला समेत 113 लोगों को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
यह परंपरा बताती है कि भारत अपनी विविधता और बहुआयामी प्रतिभाओं को सम्मान देने में विश्वास रखता है।
पद्म अवॉर्ड्स 2026: प्रेरणा का संदेश
वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कार यह संदेश देते हैं कि देश केवल बड़े मंचों पर चमकने वालों को ही नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और दूरदराज इलाकों में चुपचाप काम करने वालों को भी उतना ही महत्व देता है। ये पुरस्कार आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा देते हैं कि सच्चा योगदान दिखावे का मोहताज नहीं होता।
लोककला, शिक्षा, समाजसेवा और मानवीय मूल्यों को जीवित रखने वाले इन गुमनाम नायकों का सम्मान वास्तव में पूरे देश का सम्मान है।
