संयुक्त राष्ट्र का मंच अक्सर वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील अखाड़ा बन जाता है, जहां केवल प्रस्ताव पारित नहीं होते बल्कि देशों की नीतियां, दोस्तियां और रणनीतिक प्राथमिकताएं भी बेनकाब होती हैं। जनवरी 2026 में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ऐसा ही एक क्षण सामने आया, जब ईरान मानवाधिकारों के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के निशाने पर था। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य नाटो सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, लेकिन उसी वक्त भारत ने ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को चौंका दिया। भारत ने बिना किसी हिचक के ईरान के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का विरोध किया और स्पष्ट संदेश दिया कि वह किसी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ खड़ा है।

यूएन मानवाधिकार परिषद में क्या हुआ?
यह पूरा घटनाक्रम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की एक आपात बैठक के दौरान सामने आया। इस बैठक में ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति, विशेष रूप से हाल के वर्षों में हुए विरोध प्रदर्शनों और उन पर की गई कार्रवाई को लेकर एक प्रस्ताव पेश किया गया। प्रस्ताव का उद्देश्य 2022 से चल रही जांच को आगे बढ़ाना और हालिया घटनाओं को भी उसके दायरे में लाना था।
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ईरान में हुए इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों की जान गई, बड़ी संख्या में नागरिकों को हिरासत में लिया गया और कठोर बल प्रयोग किया गया। पश्चिमी देशों ने इसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सबसे बड़ा दमन बताया।
ईरान क्यों फंसा पश्चिमी देशों के घेरे में?
ईरान में विरोध प्रदर्शनों की चिंगारी उस समय भड़की जब एक महिला, महसा अमीनी, की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। यह घटना महिला अधिकारों और हिजाब कानूनों के खिलाफ व्यापक आंदोलन में बदल गई। देशभर में महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से हिजाब उतारकर विरोध जताया। सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कीं, सुरक्षा बलों को तैनात किया और सख्त कदम उठाए।
पश्चिमी देशों ने इन घटनाओं को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया और अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की। उनका मानना था कि ईरान पर दबाव बनाकर ही वहां सुधार संभव है।
पश्चिमी और नाटो देशों का सख्त रुख
अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य पश्चिमी देशों ने खुलकर इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह ईरान में हो रहे कथित अत्याचारों पर चुप न रहे।
इन देशों के लिए यह प्रस्ताव केवल ईरान तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वैश्विक मानवाधिकार व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ था।
भारत का अप्रत्याशित लेकिन निर्णायक कदम
जब वोटिंग का समय आया, तब सबकी नजर भारत पर थी। एक ऐसा देश जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, उससे यह उम्मीद की जा रही थी कि वह पश्चिमी देशों के साथ खड़ा होगा या कम से कम तटस्थ रहेगा। लेकिन भारत ने सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।
भारत के इस फैसले ने पश्चिमी देशों को चौंका दिया। यह कदम केवल ईरान के समर्थन में नहीं था, बल्कि भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का स्पष्ट संकेत था।
भारत ने ईरान का साथ क्यों दिया?
भारत का रुख इस सिद्धांत पर आधारित रहा है कि किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप से बचा जाना चाहिए। भारत ने यह स्पष्ट किया कि मानवाधिकारों का मुद्दा राजनीति का औजार नहीं बनना चाहिए।
भारत और ईरान के बीच दशकों पुराने संबंध हैं। ऊर्जा सहयोग, व्यापार, सांस्कृतिक रिश्ते और क्षेत्रीय स्थिरता में दोनों देशों की साझी रुचि रही है। भारत ईरान से तेल आयात करता रहा है और दोनों देशों के बीच रणनीतिक संवाद लगातार चलता रहा है।
चीन ने भी ईरान का दिया साथ
भारत के साथ-साथ चीन ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया। चीन का कहना था कि ईरान में हुई घटनाएं उसका आंतरिक मामला हैं और अंतरराष्ट्रीय जांच से हालात और जटिल हो सकते हैं।
चीन के राजदूत ने बैठक की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए और कहा कि संयुक्त राष्ट्र पहले से ही फंडिंग संकट से जूझ रहा है, ऐसे में नई जांच शुरू करना व्यावहारिक नहीं है।
वोटिंग का पूरा गणित
इस प्रस्ताव पर कुल 46 देशों ने मतदान किया। प्रस्ताव के पक्ष में 25 वोट पड़े, जबकि 7 देशों ने इसका विरोध किया। 14 देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी।
प्रस्ताव के समर्थन में मुख्य रूप से पश्चिमी और नाटो देश थे, जिनमें अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देश शामिल थे।
विरोध करने वालों में भारत, चीन, पाकिस्तान, क्यूबा, इथियोपिया, वेनेजुएला और बोलीविया जैसे देश शामिल रहे।
तटस्थ रहने वालों में ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका और कई एशियाई व लैटिन अमेरिकी देश थे।
ईरान की प्रतिक्रिया और आरोप
ईरान ने इस प्रस्ताव की कड़ी निंदा की। तेहरान सरकार का कहना है कि देश में हुए विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर अशांति फैलाने का आरोप लगाया।
ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने साफ कहा कि वह किसी भी तरह के बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा और अंतरराष्ट्रीय जांच को अपने संप्रभु अधिकारों पर हमला मानता है।
भारत की विदेश नीति का स्पष्ट संदेश
भारत का यह फैसला दिखाता है कि उसकी विदेश नीति किसी एक ध्रुव के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। भारत न तो आंख मूंदकर पश्चिम का समर्थन करता है और न ही किसी दबाव में आकर अपने सिद्धांतों से समझौता करता है।
यह कदम भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है, जहां वह अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय संतुलन दोनों को ध्यान में रखता है।
वैश्विक राजनीति में बंटती दुनिया की तस्वीर
ईरान पर हुई यह वोटिंग इस बात का प्रमाण है कि दुनिया तेजी से ध्रुवीकृत हो रही है। एक ओर पश्चिमी देश हैं, जो मानवाधिकारों के नाम पर दबाव की नीति अपनाते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन जैसे देश हैं, जो संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत को प्राथमिकता देते हैं।
यह विभाजन आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति को और जटिल बना सकता है।
निष्कर्ष: भारत का फैसला और उसका दूरगामी असर
यूएन मानवाधिकार परिषद में भारत द्वारा ईरान के समर्थन में दिया गया वोट केवल एक कूटनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका का संकेत भी है। भारत ने यह दिखा दिया कि वह वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र आवाज रखता है और दबाव की राजनीति से प्रभावित नहीं होता।
यह फैसला न केवल भारत-ईरान संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देगा कि आने वाले समय में भारत वैश्विक मामलों में संतुलन साधने वाली अहम शक्ति बना रहेगा।
