दुनिया की आर्थिक व्यवस्था दशकों से एक ऐसी मुद्रा के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिसे सुरक्षित, शक्तिशाली और भरोसेमंद माना गया। अमेरिकी डॉलर न केवल व्यापार का माध्यम बना, बल्कि वैश्विक राजनीति और कूटनीति का भी सबसे प्रभावी हथियार रहा। लेकिन अब वही डॉलर अपने सबसे कठिन दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है। हाल के महीनों में सामने आए आंकड़े, केंद्रीय बैंकों के फैसले और वैश्विक बाजारों की दिशा इस ओर इशारा कर रही है कि शायद दुनिया एक नए आर्थिक युग की दहलीज पर खड़ी है।

जनवरी 2026 के अंत में एक ही दिन दो बड़ी घटनाएं सामने आईं। अमेरिकी डॉलर चार महीने के निचले स्तर पर फिसल गया, जबकि सोने की कीमतों ने इतिहास रचते हुए पहली बार 5,000 डॉलर प्रति औंस का आंकड़ा पार कर लिया। यह केवल बाजार की अस्थायी उथल-पुथल नहीं थी, बल्कि एक गहरे बदलाव का संकेत था, जो वैश्विक वित्तीय सोच में धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
डॉलर से मोहभंग और सोने की ओर वापसी
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक किसी भी देश की आर्थिक सेहत का आईना होते हैं। जब यही संस्थान किसी मुद्रा से दूरी बनाने लगें, तो यह संकेत बेहद गंभीर माना जाता है। हाल के वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने अमेरिकी डॉलर के बजाय सोने को अपनी तिजोरियों में भरना शुरू किया है। इस प्रक्रिया को अब डी-डॉलराइजेशन के नाम से पहचाना जा रहा है।
1999 में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 71 प्रतिशत थी। उस समय डॉलर निर्विवाद रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुद्रा था। लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। 2024 तक आते-आते यह हिस्सेदारी घटकर केवल 55.5 प्रतिशत रह गई। यह गिरावट किसी एक साल या एक देश की वजह से नहीं, बल्कि कई वर्षों में धीरे-धीरे बने उस अविश्वास का परिणाम है, जो अब खुलकर सामने आ रहा है।
डॉलर की कमजोरी के पीछे छिपी वैश्विक बेचैनी
डॉलर की ताकत केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था से नहीं आती थी, बल्कि उसकी राजनीतिक स्थिरता, नीतिगत स्पष्टता और वैश्विक नेतृत्व से भी जुड़ी थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति, व्यापार युद्धों और प्रतिबंधों ने दुनिया के कई देशों को असहज कर दिया है।
जब किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता किसी देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए खतरा बनने लगे, तो विकल्प तलाशना स्वाभाविक हो जाता है। कई देशों को यह अहसास हुआ कि अगर उनका पूरा विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में है और अमेरिका किसी कारणवश उस पर प्रतिबंध या दबाव डाल दे, तो उनकी अर्थव्यवस्था संकट में पड़ सकती है।
ट्रंप युग की नीतियां और बढ़ती अनिश्चितता
डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति हमेशा से आक्रामक और अप्रत्याशित रही है। उनके बयान और फैसले कई बार वैश्विक बाजारों में हलचल मचाने के लिए काफी रहे हैं। व्यापार युद्ध, टैरिफ की धमकियां और सहयोगी देशों पर भी आर्थिक दबाव डालने की नीति ने अमेरिका के मित्र देशों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
इसी दौर में डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अब केवल एक आर्थिक प्रयोग नहीं रहा, बल्कि कूटनीतिक जरूरत बन चुका है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ की अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक सोने की चमक डॉलर की फीकी पड़ती साख को उजागर करती रहेगी।
2025 में डॉलर की ऐतिहासिक गिरावट
साल 2025 अमेरिकी डॉलर के लिए बेहद कठिन साबित हुआ। इस दौरान डॉलर में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। यह गिरावट सिर्फ विनिमय दर तक सीमित नहीं रही, बल्कि अमेरिकी आर्थिक नेतृत्व पर उठते सवालों को भी दर्शाने लगी।
डॉलर की कमजोरी ने निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों की ओर मोड़ दिया और सोना एक बार फिर सबसे पसंदीदा निवेश बनकर उभरा। जैसे-जैसे डॉलर कमजोर हुआ, वैसे-वैसे सोने की कीमतें नई ऊंचाइयों को छूती चली गईं।
सोने की कीमत 5,000 डॉलर प्रति औंस के पार
सोने की कीमतों का 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार करना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक संकेत है। यह दर्शाता है कि वैश्विक निवेशक और केंद्रीय बैंक दोनों ही भविष्य को लेकर कितने असमंजस में हैं।
सोना हमेशा से संकट के समय सुरक्षित निवेश माना गया है। जब मुद्रा और शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है, तो निवेशक सोने की ओर रुख करते हैं। मौजूदा दौर में यह प्रवृत्ति अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच गई है।
भारत और भारतीय रिजर्व बैंक की रणनीति
इस वैश्विक बदलाव से भारत भी अछूता नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने समय रहते इस लहर को भांप लिया। 16 जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले 10 महीनों में 4 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
इस बढ़ोतरी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका एक-तिहाई हिस्सा केवल आरबीआई के 880 टन सोने के भंडार की बढ़ी हुई कीमत की वजह से आया है। जहां पिछले एक साल में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का मूल्य केवल 5 प्रतिशत बढ़ा, वहीं सोने की होल्डिंग्स का मूल्य करीब 70 प्रतिशत तक उछल गया।
इसका साफ मतलब है कि भारत का खजाना अब डॉलर की तुलना में सोने की वजह से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। आरबीआई ने भले ही हाल के समय में आक्रामक तरीके से सोना न खरीदा हो, लेकिन उसकी पुरानी होल्डिंग्स ने ही उसे बड़ा फायदा पहुंचाया है।
दुनिया भर में सोना खरीदने की होड़
भारत अकेला देश नहीं है, जो अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए सोने पर भरोसा बढ़ा रहा है। दुनिया के कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को ट्रंप-प्रूफ बनाने के लिए सोने की खरीदारी तेज कर दी है।
साल 2025 में पोलैंड ने 95 टन सोना खरीदा। कजाखस्तान ने 49 टन, ब्राज़ील ने 43 टन, तुर्की ने 27 टन और चीन ने 26 टन सोना अपने भंडार में जोड़ा। यह आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न महाद्वीपों के देश एक जैसी रणनीति अपना रहे हैं।
इन देशों का सोने की ओर झुकाव इस बात का संकेत है कि वे भविष्य में अपनी मुद्रा को स्थिर रखने के लिए पीली धातु पर ज्यादा निर्भर रहना चाहते हैं।
क्या यह डॉलर के अंत की शुरुआत है
यह सवाल अब सिर्फ विश्लेषकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम निवेशकों और सरकारों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। नोमुरा जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी ऋण बाजारों में डी-डॉलराइजेशन को लेकर चर्चा अब गंभीर मोड़ पर पहुंच चुकी है।
राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यूरोपीय देश अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बेचना जारी रखते हैं, तो अमेरिका कड़ी जवाबी कार्रवाई कर सकता है। यह बयान खुद इस बात का संकेत है कि अमेरिका को इस रुझान से कितनी चिंता हो रही है।
यूरोप की भूमिका और अमेरिका की चिंता
नवंबर 2025 तक यूरोपीय संघ के पास करीब 10.4 ट्रिलियन डॉलर की अमेरिकी संपत्तियां थीं। यह कुल विदेशी स्वामित्व वाली अमेरिकी संपत्तियों का लगभग 29 प्रतिशत हिस्सा है। अगर यूरोप और अन्य मित्र देश अपनी डॉलर होल्डिंग्स को धीरे-धीरे सोने या अन्य मुद्राओं में बदलने लगें, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसका डॉलर-आधारित वित्तीय तंत्र रहा है। यदि यही तंत्र कमजोर पड़ता है, तो न केवल उसकी अर्थव्यवस्था, बल्कि उसकी वैश्विक राजनीतिक पकड़ भी ढीली हो सकती है।
डी-डॉलराइजेशन केवल आर्थिक नहीं, कूटनीतिक प्रक्रिया
विशेषज्ञ मानते हैं कि डी-डॉलराइजेशन को केवल मुद्रा परिवर्तन के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह प्रक्रिया अब कूटनीति, सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता से जुड़ चुकी है।
कई देश यह महसूस कर रहे हैं कि डॉलर पर निर्भरता उन्हें अमेरिका की नीतियों के प्रति असहाय बना देती है। ऐसे में सोना और अन्य मुद्राएं उन्हें अधिक स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।
सोना बनाम डॉलर: भरोसे की लड़ाई
डॉलर और सोने की तुलना केवल मूल्य के आधार पर नहीं की जा सकती। डॉलर एक सरकारी वादा है, जबकि सोना एक भौतिक संपत्ति है। इतिहास गवाह है कि जब भी सरकारों और नीतियों पर भरोसा डगमगाया है, सोने ने अपनी चमक बनाए रखी है।
मौजूदा दौर में भी यही देखने को मिल रहा है। डॉलर के फीके पड़ते रंग के बीच सोना एक बार फिर भरोसे का प्रतीक बन गया है।
आगे की राह क्या होगी
यह कहना जल्दबाजी होगी कि डॉलर का अंत हो चुका है। लेकिन इतना तय है कि उसका एकाधिकार कमजोर पड़ रहा है। दुनिया धीरे-धीरे एक बहु-मुद्रा प्रणाली की ओर बढ़ रही है, जहां किसी एक देश या मुद्रा का वर्चस्व नहीं होगा।
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या डॉलर खुद को नए हालात के अनुरूप ढाल पाता है या फिर सोना और अन्य मुद्राएं वैश्विक वित्तीय मंच पर और मजबूत होती हैं।
