मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया और मताधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। इंदौर में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया के तहत फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग को लेकर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं। शुक्रवार को इंदौर के राजेंद्र नगर थाने पर उस समय सियासी माहौल गर्म हो गया, जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में पार्टी का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल शिकायत दर्ज कराने पहुंचा। कांग्रेस का दावा है कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल दलित और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं के वोट काटने की साजिश के तौर पर किया जा रहा है।

यह मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि यह लोकतंत्र की उस बुनियादी संरचना को छूता है, जहां हर नागरिक के मताधिकार को समान और सुरक्षित माना जाता है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि इस तरह की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा।
राजेंद्र नगर थाना और बढ़ता राजनीतिक तापमान
इंदौर का राजेंद्र नगर थाना शुक्रवार को सामान्य दिनों से अलग नजर आया। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने माहौल को पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस को एक लिखित शिकायत सौंपी और आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया जा रहा है।
प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास है, जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को उनके मताधिकार से वंचित करना है। कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि यह मुद्दा केवल इंदौर तक सीमित नहीं है, बल्कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो इसका असर राज्य की चुनावी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
क्या है SIR प्रक्रिया और फॉर्म-7
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना होता है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने, संशोधन करने या हटाने के लिए अलग-अलग फॉर्म निर्धारित किए जाते हैं। फॉर्म-7 का उपयोग आम तौर पर मतदाता सूची से नाम हटाने या किसी मतदाता की पात्रता पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
कांग्रेस का आरोप है कि इसी फॉर्म-7 का गलत तरीके से इस्तेमाल कर दलित और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं के नाम सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन यहां बिना पर्याप्त जांच और सूचना के मतदाताओं के अधिकारों पर हमला किया जा रहा है।
कांग्रेस के आरोप और राजनीतिक संदेश
कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे मामले को लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से जोड़ते हुए कहा कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी सीधे तौर पर चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करती है। जीतू पटवारी के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी दलित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क से लेकर प्रशासन तक हर स्तर पर लड़ाई लड़ेगी।
कांग्रेस का यह भी कहना है कि फॉर्म-7 के दुरुपयोग से जिन वर्गों के वोट प्रभावित हो रहे हैं, वे पहले से ही सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में उनके मताधिकार पर चोट करना न केवल संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर भी प्रहार है।
प्रशासनिक प्रक्रिया बनाम राजनीतिक आरोप
इस विवाद ने एक बार फिर प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक आरोपों के बीच की रेखा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जहां एक ओर प्रशासन का तर्क होता है कि SIR जैसी प्रक्रियाएं मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने के लिए जरूरी हैं, वहीं विपक्ष का कहना है कि इन्हीं प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर चुनावी गणित बदला जा सकता है।
कांग्रेस का आरोप है कि यदि फॉर्म-7 के जरिए बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर कुछ खास वर्गों को निशाना बनाने जैसा होगा। पार्टी ने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से न हटे।
दलित और पिछड़े वर्गों के वोट का सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू दलित और पिछड़े वर्गों के वोट से जुड़ा है। कांग्रेस का दावा है कि इन वर्गों के मतदाताओं के नाम सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है, जिससे उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर हो सकती है। पार्टी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में हर वोट की बराबर कीमत होती है और किसी भी वर्ग को व्यवस्थित तरीके से बाहर करना संविधान की भावना के खिलाफ है।
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत की चुनावी राजनीति में दलित और पिछड़े वर्गों की भूमिका निर्णायक रही है। ऐसे में उनके मताधिकार पर उठते सवाल केवल एक पार्टी या एक चुनाव तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को प्रभावित करते हैं।
पुलिस में शिकायत और आगे की कार्रवाई
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने राजेंद्र नगर थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए मांग की कि फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग की जांच की जाए। पार्टी का कहना है कि यदि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, तो वे आगे और बड़े स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
पुलिस की ओर से शिकायत को दर्ज कर लिया गया है और मामले की जांच की प्रक्रिया की बात कही गई है। हालांकि, इस स्तर पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और प्रशासन इस मामले को कैसे संभालता है।
चुनावी प्रक्रिया और जनता का भरोसा
मतदाता सूची की शुद्धता चुनावी प्रक्रिया की रीढ़ मानी जाती है। यदि जनता का भरोसा इस प्रक्रिया से उठता है, तो इसका सीधा असर लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है। यही वजह है कि SIR प्रक्रिया और फॉर्म-7 जैसे मुद्दों पर उठे आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
कांग्रेस का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी प्रशासनिक प्रक्रिया का विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि वे हर उस कदम का समर्थन करेंगे, जो मतदाता सूची को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाता हो।
राजनीतिक माहौल और आने वाले संकेत
इंदौर में उठे इस विवाद ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है। विपक्ष जहां प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्तापक्ष पर यह जिम्मेदारी होगी कि वह पारदर्शिता और निष्पक्षता को साबित करे।
यह मामला केवल एक शहर या एक थाने तक सीमित नहीं रह सकता। यदि आरोपों में दम पाया गया, तो इसका असर राज्य स्तर पर पड़ सकता है। वहीं यदि जांच में आरोप निराधार साबित होते हैं, तो यह भी एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा।
लोकतंत्र, सतर्कता और जवाबदेही
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र में सतर्कता और जवाबदेही कितनी जरूरी है। मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में छोटी-सी चूक भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है। राजनीतिक दलों, प्रशासन और नागरिकों सभी की जिम्मेदारी है कि वे इस प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं।
इंदौर में कांग्रेस द्वारा उठाया गया यह मुद्दा आने वाले दिनों में किस दिशा में जाता है, यह जांच और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि फॉर्म-7 और SIR प्रक्रिया अब केवल तकनीकी शब्द नहीं रह गए हैं, बल्कि वे लोकतंत्र और मताधिकार की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुके हैं।
