शिक्षा और चिकित्सा जैसे पवित्र माने जाने वाले क्षेत्रों में जब धोखाधड़ी सामने आती है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह पूरे समाज की विश्वास प्रणाली को हिला देता है। भोपाल में सामने आया फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र से मेडिकल सीट हासिल करने का मामला इसी तरह का है, जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वर्षों तक चली एक गलत प्रक्रिया का हिसाब आखिर कब और कैसे होगा।

भोपाल जिला अदालत ने डॉ. सुनील सोनकर को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास और दो हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति के लिए दंड नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि शिक्षा में की गई धोखाधड़ी कितने वर्षों बाद भी कानून के शिकंजे से बच नहीं सकती।
2010 से 2026 तक फैला मामला, जिसने पकड़ा कानूनी मोड़
यह मामला वर्ष 2010 की प्री मेडिकल टेस्ट परीक्षा से जुड़ा है, जो उस समय व्यावसायिक परीक्षा मंडल के माध्यम से आयोजित की जाती थी। उस दौर में मेडिकल सीट पाना लाखों छात्रों का सपना हुआ करता था और सीमित सीटों के कारण प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ी थी।
इसी परीक्षा के जरिए डॉ. सुनील सोनकर ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। लेकिन यह प्रवेश योग्यता और पारदर्शिता के आधार पर नहीं, बल्कि एक ऐसे फर्जी दस्तावेज के सहारे हुआ, जिसने उन्हें राज्य कोटे की सीट का अनुचित लाभ दिलाया।
मूल निवासी प्रमाण पत्र की भूमिका और उसका दुरुपयोग
मध्यप्रदेश में मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया के दौरान राज्य कोटे की सीटों के लिए मूल निवासी प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है। यह प्रमाण पत्र यह साबित करता है कि अभ्यर्थी वास्तव में राज्य का निवासी है और उसे राज्य कोटे का लाभ मिलना चाहिए।
जांच में यह सामने आया कि डॉ. सुनील सोनकर ने ऐसा ही एक प्रमाण पत्र प्रवेश प्रक्रिया में प्रस्तुत किया था, जो बाद में पूरी तरह फर्जी पाया गया। इस दस्तावेज के आधार पर उन्होंने न केवल मेडिकल सीट हासिल की, बल्कि आगे चलकर डॉक्टर के रूप में पेशा भी शुरू किया।
एसटीएफ जांच में खुला फर्जीवाड़े का राज
इस मामले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब विशेष कार्य बल ने व्यापमं से जुड़े मामलों की जांच तेज की। दस्तावेजों की गहन पड़ताल के दौरान सुनील सोनकर द्वारा प्रस्तुत मूल निवासी प्रमाण पत्र संदेह के घेरे में आया।
जांच एजेंसियों ने संबंधित रिकॉर्ड खंगाले, प्रशासनिक दस्तावेजों का मिलान किया और निष्कर्ष निकाला कि प्रमाण पत्र न तो वैध प्रक्रिया से जारी हुआ था और न ही उसमें दर्ज जानकारी सही थी। इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा।
अदालत में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया
इस प्रकरण में कानूनी प्रक्रिया वर्षों तक चली। अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने का प्रयास किया कि आरोपी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेज का उपयोग किया और राज्य कोटे की मेडिकल सीट पर कब्जा किया।
अदालत में पेश साक्ष्यों, गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी को यह पूरी जानकारी थी कि वह जिस प्रमाण पत्र का उपयोग कर रहा है, वह वास्तविक नहीं है। इसके बावजूद उसने परीक्षा दी, प्रवेश लिया और मेडिकल शिक्षा पूरी की।
भोपाल जिला अदालत का ऐतिहासिक फैसला
सभी तथ्यों और सबूतों पर विचार करने के बाद भोपाल जिला अदालत ने डॉ. सुनील सोनकर को दोषी करार दिया। अदालत ने यह माना कि इस तरह की धोखाधड़ी न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह उन सैकड़ों योग्य छात्रों के अधिकारों का भी हनन है, जो ईमानदारी से प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हुए थे।
अदालत ने तीन साल के कठोर कारावास के साथ दो हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह फैसला उन मामलों में गिना जा रहा है, जहां शिक्षा से जुड़ी धोखाधड़ी पर सख्त रुख अपनाया गया है।
व्यापमं मामलों की पृष्ठभूमि में इस फैसले का महत्व
मध्यप्रदेश में व्यापमं से जुड़े मामलों ने पहले ही व्यवस्था की खामियों को उजागर किया था। यह मामला उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है, जहां वर्षों बाद भी न्यायिक प्रक्रिया ने अपना काम किया।
इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चाहे मामला कितना भी पुराना क्यों न हो, अगर अपराध साबित होता है तो सजा से बचा नहीं जा सकता।
समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए संदेश
इस फैसले का संदेश केवल एक आरोपी तक सीमित नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है, जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे अपने करियर को आगे बढ़ाने की सोचते हैं।
मेडिकल जैसे क्षेत्र में जहां सीधे मानव जीवन से जुड़ा काम होता है, वहां प्रवेश प्रक्रिया में की गई कोई भी गड़बड़ी समाज के लिए घातक हो सकती है। अदालत का यह रुख शिक्षा व्यवस्था की शुचिता बनाए रखने की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष
फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र से मेडिकल सीट हासिल करने का यह मामला बताता है कि गलत रास्ते से मिली सफलता कितनी अस्थायी होती है। वर्षों तक चला पेशेवर जीवन भी एक दिन कानून के सामने जवाबदेह बन सकता है।
भोपाल जिला अदालत का यह फैसला न्याय, पारदर्शिता और ईमानदारी के पक्ष में एक स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा में धोखाधड़ी को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
