दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बड़ा और दूरगामी असर डालने वाला फैसला पाकिस्तान ने लिया है। दशकों से चली आ रही पाकिस्तान-ईरान सीमा से जुड़ी एक विशेष व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है, जिसे स्थानीय भाषा में रहदारी सिस्टम कहा जाता था। इस फैसले के बाद अब दोनों देशों की सीमा पार करने के लिए सामान्य अंतरराष्ट्रीय नियम लागू होंगे, यानी पासपोर्ट और वीजा के बिना आवाजाही संभव नहीं होगी।

यह निर्णय केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पाकिस्तान की बदलती विदेश नीति, वैश्विक दबावों और नई रणनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा जा रहा है। खास तौर पर अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकियों और डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कूटनीतिक कोशिशों के संदर्भ में यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है।
क्या था रहदारी सिस्टम और क्यों था खास
रहदारी सिस्टम पाकिस्तान और ईरान के सीमावर्ती इलाकों के लिए किसी जीवनरेखा से कम नहीं था। इस व्यवस्था के तहत पाकिस्तान के बलूचिस्तान और ईरान के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग केवल स्थानीय पहचान पत्र के आधार पर सीमा पार कर सकते थे। इसके पीछे तर्क यह था कि दोनों तरफ रहने वाले लोगों के पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक संबंध और पारंपरिक व्यापार सदियों पुराने हैं।
सीमा के दोनों ओर रहने वाले कई परिवारों के रिश्तेदार एक-दूसरे के यहां बसे हुए हैं। रोजमर्रा की जरूरतों, छोटे व्यापार, मजदूरी और सामाजिक मेल-जोल के लिए सीमा पार आना-जाना उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। रहदारी सिस्टम ने इन लोगों को बिना जटिल कानूनी प्रक्रिया के यह सुविधा दी थी।
अचानक क्यों लिया गया सिस्टम खत्म करने का फैसला
पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यह फैसला सुरक्षा कारणों से लिया गया है। सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान से सटी सीमा का इस्तेमाल लंबे समय से आतंकी नेटवर्क, हथियारों की तस्करी, ड्रग्स और अवैध धन की आवाजाही के लिए किया जा रहा था।
बलूचिस्तान पहले से ही अशांत इलाका माना जाता है, जहां अलगाववादी गतिविधियां, हिंसा और सीमा पार अपराधों की आशंका बनी रहती है। पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि रहदारी सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा है और इसे खत्म करना जरूरी है।
इसी दबाव के बीच सरकार ने यह बड़ा कदम उठाया और दशकों पुरानी व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला कर लिया।
चरणबद्ध तरीके से लागू होगा नया नियम
पाकिस्तान सरकार ने साफ किया है कि यह बदलाव एक साथ लागू नहीं होगा, बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। 15 मार्च से इसकी शुरुआत होगी और 31 मार्च 2026 तक इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।
इस अवधि के बाद स्थानीय पहचान पत्र के आधार पर सीमा पार करने की अनुमति नहीं मिलेगी। हर व्यक्ति को पासपोर्ट और वीजा जैसी औपचारिकताओं से गुजरना होगा, जैसा किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होता है।
क्या यह सिर्फ सुरक्षा का मामला है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान की विदेश नीति में हाल के वर्षों में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिशें तेज हुई हैं, जबकि ईरान के साथ रिश्तों में ठंडापन नजर आने लगा है।
ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक राजनीति के दबावों के बीच पाकिस्तान यह संकेत देना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों और अमेरिकी रणनीतिक हितों के साथ खड़ा है। रहदारी सिस्टम को खत्म करना इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
ईरान के साथ बिना नए समझौते के लिया गया फैसला
इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि इसे ईरान के साथ किसी नए द्विपक्षीय समझौते के बिना लागू किया गया है। आमतौर पर इस तरह के सीमा संबंधी बदलाव आपसी बातचीत और सहमति से किए जाते हैं।
बिना किसी नए समझौते के यह कदम उठाना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान अपने क्षेत्रीय समीकरणों में एकतरफा बदलाव करने से भी नहीं हिचक रहा है। इससे ईरान-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
बलूचिस्तान पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत पर पड़ने वाला है। यहां बड़ी संख्या में लोग रोजाना सीमा पार जाकर काम करते थे। छोटे व्यापारी, मजदूर और स्थानीय परिवार इस व्यवस्था पर निर्भर थे।
अब पासपोर्ट और वीजा जैसी औपचारिकताओं के कारण उनकी रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो सकता है। दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया, खर्च और समय इन लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह फैसला जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करके लिया गया है।
घरेलू जरूरतें बनाम सुरक्षा प्राथमिकताएं
पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और अस्थिरता के बीच आम जनता पहले से ही दबाव में है। ऐसे में सीमा से जुड़े इलाकों में रहने वाले लोगों की परेशानियां बढ़ना सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान में इस समय सुरक्षा चिंताओं को घरेलू जरूरतों से ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। इसका असर लंबे समय में सामाजिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका और खाड़ी देशों को क्या संदेश देना चाहता है पाकिस्तान
इस फैसले को अमेरिका और खाड़ी देशों के लिए एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। पाकिस्तान यह दिखाना चाहता है कि वह ईरान से जुड़ी गतिविधियों पर सख्ती बरतने को तैयार है और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप के साथ रिश्तों को लेकर पाकिस्तान पहले भी कई संकेत देता रहा है। यह कदम उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें पाकिस्तान खुद को पश्चिमी खेमे के करीब दिखाने की कोशिश कर रहा है।
क्षेत्रीय राजनीति पर संभावित असर
पाकिस्तान-ईरान संबंध केवल द्विपक्षीय नहीं हैं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करते हैं। अफगानिस्तान, मध्य एशिया और खाड़ी देशों की राजनीति में इन रिश्तों की अहम भूमिका रही है।
रहदारी सिस्टम के खत्म होने से सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। इससे अवैध गतिविधियां पूरी तरह खत्म होंगी या नए रास्ते तलाशे जाएंगे, यह आने वाला समय बताएगा।
निष्कर्ष
पाकिस्तान द्वारा ईरान के साथ दशकों पुरानी सीमा व्यवस्था को खत्म करना एक साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह सुरक्षा, विदेश नीति और घरेलू राजनीति के जटिल समीकरणों का नतीजा है।
यह फैसला जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की नई प्राथमिकताओं को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर सीमावर्ती इलाकों के आम लोगों के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी करता है। आने वाले समय में यह कदम पाकिस्तान-ईरान रिश्तों और पूरे क्षेत्र की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
