दक्षिण एशिया की राजनीति में बांग्लादेश हमेशा से एक महत्वपूर्ण देश रहा है और वहां होने वाले राजनीतिक परिवर्तन का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। हाल ही में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर देश में नई राजनीतिक शुरुआत का संकेत दिया है। इस शपथ ग्रहण समारोह में भारत की ओर से उच्चस्तरीय भागीदारी ने भी खास संदेश दिया। भारत का प्रतिनिधित्व लोकसभा स्पीकर और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने किया।

तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना कई मायनों में बांग्लादेश की राजनीति में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। लंबे समय तक अवामी लीग के शासन के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम और चुनावी परिणामों ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता साफ किया। ऐसे समय में भारत की उपस्थिति ने यह दर्शाया कि नई सरकार के साथ संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
शपथ समारोह के बाद अहम मुलाकातें
शपथ ग्रहण के बाद लोकसभा स्पीकर ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की और भारत के प्रधानमंत्री की ओर से शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इस दौरान भारत यात्रा का औपचारिक निमंत्रण भी सौंपा गया। यह निमंत्रण दोनों देशों के बीच निरंतर संवाद की इच्छा को दर्शाता है।
इसी क्रम में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बांग्लादेश में नेता प्रतिपक्ष और जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान से भी शिष्टाचार मुलाकात की। यह मुलाकात केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इसमें द्विपक्षीय संबंधों की दिशा और क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा के संकेत मिले।
मुलाकात का संदेश और कूटनीतिक संकेत
विदेश सचिव ने डॉ. शफीकुर रहमान को उनकी नई भूमिका के लिए शुभकामनाएं दीं और भारत की ओर से बांग्लादेश के साथ स्थायी समर्थन की प्रतिबद्धता दोहराई। इस दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि दोनों देशों के संबंध केवल सरकारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे लोगों के बीच गहरे और ऐतिहासिक रिश्तों पर आधारित हैं।
डॉ. शफीकुर रहमान ने भी भारत और बांग्लादेश के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया। यह संदेश स्पष्ट था कि राजनीतिक बदलावों के बावजूद दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं बनी रहनी चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति और प्रतिनिधित्व
बांग्लादेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शपथ समारोह में आमंत्रित किया था, लेकिन पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत उन्हें मुंबई में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ वार्ता में शामिल होना था। इसलिए भारत की ओर से प्रतिनिधिमंडल ने भाग लेकर आधिकारिक उपस्थिति सुनिश्चित की। यह कूटनीतिक संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व के माध्यम से संबंधों की निरंतरता बनाए रखी गई।
चुनाव परिणाम और राजनीतिक पृष्ठभूमि
12 फरवरी को हुए 13वें संसदीय चुनावों में बीएनपी ने 297 में से 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह चुनाव परिणाम बीएनपी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि लंबे समय तक पार्टी राजनीतिक दबाव और चुनौतियों का सामना करती रही थी।
अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद अवामी लीग सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। इन घटनाओं ने देश की राजनीति में बड़ा मोड़ ला दिया और नए चुनावों का मार्ग प्रशस्त किया।
द्विपक्षीय संबंधों का भविष्य
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक आयामों से भी जुड़े हैं। सीमा पार व्यापार, ऊर्जा सहयोग, जल बंटवारा, कनेक्टिविटी परियोजनाएं और सुरक्षा सहयोग जैसे कई मुद्दे दोनों देशों के एजेंडे में शामिल हैं। नई सरकार के गठन के बाद इन मुद्दों पर आगे की रणनीति को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।
विदेश सचिव की विपक्ष और जमात प्रमुख से मुलाकात यह संकेत देती है कि भारत बांग्लादेश की सभी प्रमुख राजनीतिक धाराओं के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है। यह दक्षिण एशिया की जटिल राजनीति में संतुलित कूटनीति का उदाहरण माना जा सकता है।
क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्व
दक्षिण एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और बांग्लादेश के संबंध रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। आर्थिक साझेदारी, सुरक्षा सहयोग और लोगों के बीच संपर्क को मजबूत करना दोनों देशों के हित में है। नई सरकार के साथ संवाद की यह शुरुआत आने वाले समय में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा दे सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच संवाद की प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी। नई सरकार, नई प्राथमिकताएं और क्षेत्रीय चुनौतियों के बीच यह कूटनीतिक सक्रियता आने वाले समय में दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित कर सकती है।
