मध्य प्रदेश पुलिस ने साइबर अपराधों की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। पिछले कुछ वर्षों में साइबर ठगी, डिजिटल फ्रॉड, ऑनलाइन चोरी, बैंकिंग स्कैम और सोशल मीडिया क्राइम के मामलों में जिस तरह अचानक और तेज़ी से वृद्धि हुई है, उसने न केवल आम नागरिकों बल्कि पूरे पुलिस तंत्र को चिंता में डाल दिया है। हर दिन नए-नए तरीके सामने आते हैं, जिससे अपराधियों के इरादे और तकनीकी समझ दोनों का स्तर काफी ऊँचा साबित हो रहा है। ऐसे परिदृश्य में पुलिस कर्मियों को लगातार अपडेटेड रखना ज़रूरी हो गया है। इसी उद्देश्य से एमपी पुलिस मुख्यालय ने हर महीने पुलिस जवानों की साइबर परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया है।

इस नई प्रक्रिया के तहत राज्य के सभी पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों को आदेश जारी किए गए हैं कि वे हर माह निर्धारित तारीखों पर साइबर और नए आपराधिक कानूनों से जुड़े प्रश्नपत्र तैयार कर परीक्षा करवाएँ। इन परीक्षाओं की निगरानी सीनियर पुलिस अधिकारी स्वयं करेंगे, ताकि प्रशिक्षण का स्तर उच्चतम रहे और परिणाम निष्पक्ष हों।
क्यों ज़रूरी है हर माह परीक्षा?
साइबर अपराध किसी स्थिर विषय की तरह नहीं है। यह हर दिन बदलता है—कभी फिशिंग, कभी फार्मिंग, तो कभी किसी उपयोगी ऐप का नकली वर्ज़न बनाकर ठगी। बैंकिंग सिस्टम जितना सुरक्षित हो रहा है, अपराधी उतने ही अधिक चालाक होते जा रहे हैं। उनकी तकनीकें तेज़ी से विकसित हो रही हैं, और कहीं-न-कहीं पुलिस के लिए यह चुनौती अब एक निरंतर सीखने की प्रक्रिया बन गई है।
आज एक पुलिस जवान को सिर्फ परंपरागत कानून और व्यवस्था संभालने के कौशल की ही ज़रूरत नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया की हर बारीकी को समझने की क्षमता भी चाहिए। अगर एक जवान साइबर फ्रॉड के तरीकों, डिजिटल साक्ष्यों, सोशल इंजीनियरिंग, फर्जी कॉल्स, ऑनलाइन ठगी और डेटा चोरी की तकनीकों को नहीं समझेगा, तो वह आम लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाएगा। यही वजह है कि हर माह परीक्षा कराने का निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एडीजी ट्रेनिंग राजा बाबू सिंह ने कहा कि नव आरक्षकों को साइबर सुरक्षा और नए आपराधिक कानूनों में दक्ष बनाना समय की मांग है। सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वालों को डीजीपी के हाथों सम्मानित भी किया जाएगा।
कैसे होगी परीक्षा? क्या है पूरा ढांचा?
इस परीक्षा को आधुनिक, सरल और किफायती बनाने के लिए पुलिस मुख्यालय ने कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं—
1. परीक्षा 100 नंबर की होगी
हर माह दो परीक्षाएँ होंगी—
- साइबर विषय – 100 अंक
- नए आपराधिक कानून – 100 अंक
सभी प्रश्न वैकल्पिक (Objective Type) होंगे, जिससे प्रक्रिया तेज़ और सटीक होगी।
2. अवधि होगी 1 घंटा
एक ही घंटे में जवानों की समझ, तैयारी और तकनीकी ज्ञान की परख हो जाएगी।
3. स्मार्टफोन पर ऑनलाइन परीक्षा
जवान अपने स्वयं के स्मार्टफोन से परीक्षा देंगे, जिससे प्रक्रिया:
- पेपरलेस होगी
- समय की बचत होगी
- तुरंत मूल्यांकन की सुविधा मिलेगी
4. प्रश्नपत्र तैयार करेगा राज्य साइबर सेल
हर माह एसपी प्रणय नागवंशी के नेतृत्व में एक विशेष टीम प्रश्नपत्र तैयार करेगी।
यह टीम साइबर जगत में सामने आ रहे नए अपराधों, उनकी तकनीकों और सुरक्षा उपायों पर लगातार अध्ययन करती है।
परीक्षा में पूछे जाने वाले सवालों के उदाहरण
- साइबर फिशिंग का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- एक मजबूत पासवर्ड किन तत्वों से मिलकर बनता है?
- एंटी-वायरस सॉफ़्टवेयर का मूल कार्य क्या है?
- ओटीपी का उपयोग कहाँ और किसलिए किया जाता है?
- फायरवॉल का क्या कार्य होता है?
- सोशल इंजीनियरिंग के कौन-कौन से प्रकार हैं?
- बैंकिंग फ्रॉड की पहचान कैसे की जाए?
- डिजिटल सबूत को कैसे सुरक्षित रखा जाए?
इन सवालों से यह स्पष्ट है कि पुलिस जवानों को अब सिर्फ घटनाओं को समझना नहीं, बल्कि डिजिटल क्राइम की गहराई में उतरकर अपराधियों से मुकाबला करना भी सीखना है।
साइबर सुरक्षा अब क्यों बनी सबसे बड़ी चुनौती?
देशभर में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है। गाँव से लेकर शहर तक, मोबाइल बैंकिंग से लेकर सोशल मीडिया तक—हर जगह ठगी की घटनाएँ आम हो चुकी हैं। एक क्लिक में किसी का बैंक खाता खाली हो सकता है। जालसाजों के पास:
- उन्नत तकनीक
- डार्क वेब
- फेक वेबसाइट
- डीपफेक
- स्कैम कॉलिंग सॉफ़्टवेयर
जैसे उपकरण मौजूद हैं।
साथ ही, जागरूकता की कमी का भी अपराधियों को खूब फायदा मिलता है। कई लोग अभी भी:
- अंजान नंबरों से आए लिंक पर क्लिक कर देते हैं
- ओटीपी शेयर कर देते हैं
- फर्जी ऐप डाउनलोड कर लेते हैं
- स्क्रीन शेयरिंग ऐप का झांसा खा जाते हैं
ऐसे में पुलिस कर्मियों को भी प्रैक्टिकल नॉलेज की आवश्यकता होती है, ताकि वे घटनाओं का समाधान करते समय तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें।
नए आपराधिक कानूनों को समझना भी ज़रूरी
2023 के बाद से देश के आपराधिक कानूनों—भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम—में कई बदलाव किए गए हैं।
इन बदलावों का प्रभाव सीधा पुलिस की कार्यप्रणाली पर पड़ता है।
जवानों को नए कानूनों की जानकारी होगी तभी वे:
- सही FIR लिख सकेंगे
- सही धाराएँ लगा सकेंगे
- न्याय प्रक्रिया में त्रुटियों से बच सकेंगे
इसलिए नए कानूनों की परीक्षा भी आवश्यक है।
राज्य भर में ट्रेनिंग सेंटर तैयार
सभी पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों में:
- डिजिटल लैब
- इंटरनेट सुविधा
- स्मार्टफोन आधारित परीक्षा प्रबंधन
- वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी
का इंतज़ाम किया गया है, ताकि परीक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।
निष्कर्ष: आधुनिक पुलिसिंग की ओर एक बड़ा कदम
एमपी पुलिस का यह निर्णय भविष्य के लिए बेहद प्रभावी और आवश्यक कदम है।
दिन-ब-दिन डिजिटल अपराधों की चुनौती बढ़ रही है। ऐसे समय में पुलिस जवानों को निरंतर सीखने की प्रक्रिया में रखना ही सबसे तेज़ और कारगर उपाय है।
यह कदम न सिर्फ पुलिस की कार्यकुशलता को बढ़ाएगा, बल्कि आम लोगों को भी सुरक्षित महसूस कराएगा। आधुनिक पुलिस का स्वरूप अब बदल चुका है—अब एक जवान को पुलिसिंग के साथ-साथ डिजिटल दुनिया का भी विशेषज्ञ बनना होगा।
