मध्य प्रदेश, जो लंबे समय से कृषि प्रधान राज्यों में गिना जाता है, इस समय एक ऐसे पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है जिसकी गंभीरता लगातार बढ़ती जा रही है—पराली जलाना। रबी सीजन की शुरुआत होते ही प्रदेश के कई जिलों में पराली जलाने के मामले जिस तेजी से बढ़े हैं, उसने न केवल राज्य सरकार को चिंतित कर दिया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मध्य प्रदेश ने एक चिंताजनक रिकॉर्ड बना डाला है।

ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 15 सितंबर से 13 नवंबर 2025 के बीच देशभर में पराली जलाने की 15,002 घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें सबसे अधिक 5,146 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए। इस तरह मध्य प्रदेश ने पराली जलाने के मामले में पंजाब (4,734) को भी पीछे छोड़ दिया है, जबकि परंपरागत रूप से पंजाब को हमेशा पराली जलाने का मुख्य केंद्र माना जाता रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर है कि सिर्फ 13 नवंबर को देश में दर्ज 1,209 घटनाओं में से 709 घटनाएँ अकेले मध्य प्रदेश से रिपोर्ट हुईं। जबकि इसी दिन पंजाब में केवल 72 मामले सामने आए।
सरकार के प्रयास क्यों नहीं ला पा रहे असर?
पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने पराली जलाने के खिलाफ कई कदम उठाए हैं—
- किसानों को जागरूक करने के लिए अभियान
- जिला स्तर पर चेतावनी और जुर्माने
- कई जगह FIR तक दर्ज
- सब्सिडी वाले उपकरण उपलब्ध करवाना
- कंपनियों को पराली खरीदने के लिए प्रोत्साहन
इसके बावजूद घटनाओं में कमी आने के बजाय तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इसका कारण बहुत हद तक किसानों की मजबूरी और कृषि चक्र की जटिलताएँ हैं।
इस वर्ष पराली जलाना क्यों बढ़ा? किसानों की मजबूरी भी बड़ी वजह
2025 का खरीफ सीजन किसानों के लिए आसान नहीं रहा।
- अतिवर्षा के चलते कई जिलों में खरीफ बोवनी देर से हुई।
- कुछ क्षेत्रों में दोबारा बोवनी करनी पड़ी।
- कटाई का काम भी समय पर पूरा नहीं हो पाया।
अब रबी सीजन की बुवाई का समय नजदीक है। किसानों का दबाव है कि वे खेत जल्दी खाली कर दें।
- मजदूरों की कमी
- मशीनरी के खर्च में बढ़ोतरी
- समय की पाबंदी
—इन सभी कारणों ने किसानों को पराली जलाने जैसे विकल्प की ओर धकेल दिया है।
खेती के इस तंग समय चक्र में किसान चाहते हैं कि धान कटते ही खेत तुरंत बोवाई के लिए तैयार हो जाएँ, और यही पराली जलाने का मुख्य कारण बन रहा है।
पराली जलाने से मिट्टी की सेहत बिगड़ रही, पर्यावरण पर भी भारी असर
वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से—
- मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट होते हैं
- खेत की जैविक क्षमता कम हो जाती है
- वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है
- धुआँ मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है
- वातावरण में कार्बन का स्तर बढ़ता है
- फसल उत्पादन भी प्रभावित होता है
कई जगहों पर यह धुआँ शहरों की हवा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है। यही वजह है कि दिल्ली NCR में हर साल सर्दियों में हवा जहरीली हो जाती है।
सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी—लेकिन किसान क्यों नहीं ले पा रहे लाभ?
मध्य प्रदेश सरकार कृषि यंत्रों पर भारी सब्सिडी दे रही है—
- हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, मल्चर, रीपर जैसे उपकरणों पर 50% सब्सिडी
- पराली एकत्रित कर प्लांट भेजने वाली मशीनों पर 65% तक अनुदान
- 2025-26 में कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय को 1,928 आवेदन भी मिले हैं
ट्राइडेंट और वर्धमान जैसी कंपनियाँ किसानों से पराली खरीदकर उद्योग में उपयोग करती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक लाभ भी मिल सकता है।
लेकिन समस्या यह है कि—
- ये मशीनें महंगी हैं
- सभी किसानों की पहुँच में नहीं
- छोटे और सीमांत किसान इन्हें वहन नहीं कर सकते
- किराए की मशीनें अक्सर समय पर उपलब्ध नहीं होतीं
इसलिए पराली जलाना किसानों के लिए अब भी एक आसान और “त्वरित समाधान” बना हुआ है।
सिर्फ 8 दिनों में 4,393 घटनाएँ—स्थिति चिंताजनक
6 से 13 नवंबर के बीच पराली जलाने की घटनाओं में अचानक बड़ा उछाल देखा गया।
सैटेलाइट डेटा के अनुसार—
- 6 नवंबर – 354
- 7 नवंबर – 237
- 8 नवंबर – 353
- 9 नवंबर – 398
- 10 नवंबर – 422
- 11 नवंबर – 1052
- 12 नवंबर – 868
- 13 नवंबर – 709
कुल—4,393 घटनाएँ सिर्फ आठ दिनों में।
यह कोई सामान्य स्थिति नहीं बल्कि एक पर्यावरणीय आपातकाल की चेतावनी है।
कौन से जिले सबसे ज्यादा प्रभावित?
| जिला | घटनाएँ |
|---|---|
| नर्मदापुरम | 928 |
| सिवनी | 721 |
| अशोकनगर | 346 |
| सतना | 307 |
| दतिया | 282 |
| रायसेन | 221 |
| जबलपुर | 196 |
| सीहोर | 192 |
| ग्वालियर | 18 |
स्पष्ट है कि नर्मदापुरम, सिवनी और अशोकनगर जैसे जिलों में यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।
देशभर पर प्रभाव—दिल्ली की हवा भी हो रही जहरीली
पराली का धुआँ केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहता।
हवा की दिशा के कारण यह—
- दिल्ली
- ग्वालियर
- भोपाल
- उत्तर भारत के अन्य हिस्सों
तक पहुँचता है और वायु गुणवत्ता को खराब करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में सख्ती दिखाते हुए पंजाब और हरियाणा सरकारों से रिपोर्ट मांगी है।
समाधान क्या है?
समस्या गंभीर है लेकिन हल भी मौजूद हैं—
- किसानों को सब्सिडी वाले उपकरण समय पर मिलें
- पराली को उद्योगों में उपयोग करने वाली कंपनियों की संख्या बढ़े
- जिला स्तर पर पराली कलेक्शन सेंटर स्थापित हों
- किसानों को मजदूरी और मशीनरी सहायता मिले
- ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान तेज हों
- पंचायत स्तर पर पराली प्रबंधन समितियाँ बनें
- पराली से जैविक खाद बनाने की यूनिटें बढ़ें
पराली प्रबंधन को खेती का हिस्सा मानना होगा, न कि बोझ।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं का बढ़ना पर्यावरण, स्वास्थ्य और कृषि—तीनों के लिए गंभीर संकट है। यह केवल कानून-व्यवस्था या किसानों की गलती नहीं, बल्कि कृषि चक्र, आर्थिक दबाव, संसाधनों की कमी और जागरूकता की कमी का सम्मिलित परिणाम है।
अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसकी समस्या और भयावह रूप ले सकती है। सरकार, किसान, उद्योग और समाज—सभी को मिलकर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।
