मुख्य बातें
- भारत ने 2028-29 कार्यकाल के लिए UNSC की अस्थायी सदस्यता का आधिकारिक अभियान शुरू कर दिया है।
- एशिया-प्रशांत समूह की सीट पर भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से है, जिसे OIC के समर्थन का दावा है।
- भारत को कई प्रमुख लोकतांत्रिक देशों का समर्थन मिल रहा है और उसका संयुक्त राष्ट्र में मजबूत रिकॉर्ड रहा है।
- अंतिम फैसला 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान से होगा, जहां दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।

UNSC की अस्थायी सदस्यता के लिए वर्ष 2028-29 का चुनाव अभी लगभग एक वर्ष दूर है, लेकिन वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इसकी गूंज अभी से सुनाई देने लगी है। भारत ने आधिकारिक तौर पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर दी है और इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में एक नया कूटनीतिक मुकाबला शुरू हो गया है। इस बार मुकाबला केवल दो देशों के बीच चुनाव भर नहीं है, बल्कि यह वैश्विक प्रभाव, क्षेत्रीय राजनीति, रणनीतिक साझेदारियों और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों की भी परीक्षा माना जा रहा है।
भारत के सामने इस बार मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान चुनौती बनकर उभरा है। ताजिकिस्तान को इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के कई सदस्य देशों का समर्थन मिलने की चर्चा ने इस चुनाव को और अधिक रोचक बना दिया है। दूसरी ओर भारत अपने मजबूत वैश्विक संबंधों, लोकतांत्रिक छवि, विकास सहयोग और संयुक्त राष्ट्र में लंबे अनुभव के भरोसे मैदान में उतर रहा है।
यह चुनाव केवल वोटों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम से यह भी संकेत मिलेगा कि बदलती विश्व व्यवस्था में किस देश की कूटनीतिक पहुंच अधिक प्रभावी है और कौन वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज के रूप में अधिक स्वीकार्यता रखता है।
UNSC की अस्थायी सदस्यता क्यों महत्वपूर्ण
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दुनिया की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में गिनी जाती है। अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, प्रतिबंध, शांति सेना की तैनाती और कई वैश्विक संकटों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार इसी परिषद के पास होता है।
सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन। इनके पास वीटो शक्ति होती है। इनके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुना जाता है।
यद्यपि अस्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार नहीं होता, फिर भी वैश्विक मुद्दों पर उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहती है। परिषद में किसी भी प्रस्ताव पर चर्चा, संशोधन, कूटनीतिक पहल और अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने में अस्थायी सदस्य सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसी कारण अधिकांश देश समय-समय पर इस सदस्यता के लिए चुनाव लड़ते हैं।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भी मांग करता रहा है। ऐसे में UNSC की अस्थायी सदस्यता भारत के लिए केवल दो वर्षों का कार्यकाल नहीं बल्कि वैश्विक नेतृत्व क्षमता दिखाने का महत्वपूर्ण मंच भी है।
भारत का रिकॉर्ड मजबूत
अगर संयुक्त राष्ट्र में भारत के इतिहास पर नजर डालें तो उसका प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा है। स्वतंत्रता के बाद भारत कई बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है।
भारत 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है। यानी भारत कुल आठ बार इस जिम्मेदारी का निर्वहन कर चुका है।
इतिहास बताता है कि भारत को अधिकांश चुनावों में भारी बहुमत मिला। पिछली बार भी उसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ था। यह रिकॉर्ड भारत की विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का संकेत माना जाता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इतने लंबे अनुभव का लाभ इस चुनाव में भी भारत को मिल सकता है। कई देशों के लिए भारत ऐसा साझेदार है जिसने हमेशा बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करने, विकासशील देशों की आवाज उठाने और अंतरराष्ट्रीय कानून आधारित व्यवस्था का समर्थन किया है।
ताजिकिस्तान कैसे बना चुनौती
पहली नजर में भारत और ताजिकिस्तान की तुलना असमान दिखाई देती है। एक ओर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था और तेजी से उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्था है, जबकि दूसरी ओर मध्य एशिया का अपेक्षाकृत छोटा देश।
फिर भी इस चुनाव में ताजिकिस्तान को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के भीतर उसे मिल रहा समर्थन माना जा रहा है। यदि संगठन के अधिकांश सदस्य एकजुट होकर मतदान करते हैं तो ताजिकिस्तान को शुरुआती बढ़त मिल सकती है।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रत्येक देश स्वतंत्र रूप से मतदान करता है और किसी संगठन का समर्थन हमेशा समान मतदान में नहीं बदलता, फिर भी संगठित कूटनीतिक अभियान चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
यही वजह है कि भारत भी पिछले कुछ वर्षों से खाड़ी देशों, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और छोटे द्वीपीय देशों के साथ अपने संबंध लगातार मजबूत कर रहा है।
चुनाव का गणित कितना कठिन
UNSC की अस्थायी सदस्यता का चुनाव साधारण बहुमत से नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य देशों में से दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है।
व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है कि किसी भी उम्मीदवार को लगभग 129 वोट हासिल करने होंगे।
यहीं से यह चुनाव और दिलचस्प हो जाता है।
यदि किसी एक उम्मीदवार को शुरुआती चरण में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता तो कई दौर तक मतदान हो सकता है। ऐसे मामलों में पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत, नए समझौते, क्षेत्रीय समर्थन और द्विपक्षीय संबंध निर्णायक भूमिका निभाने लगते हैं।
भारत की चुनौती केवल समर्थक देशों की सूची बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि मतदान के दिन वे सभी देश उसके पक्ष में वोट करें।
भारत की कूटनीतिक बढ़त
UNSC की अस्थायी सदस्यता के चुनाव में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विस्तृत कूटनीतिक नेटवर्क माना जा रहा है। पिछले एक दशक में भारत ने केवल बड़ी शक्तियों के साथ ही नहीं, बल्कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, प्रशांत द्वीप देशों, कैरेबियाई देशों और खाड़ी क्षेत्र के साथ भी अपने संबंधों को नई ऊंचाई दी है।
कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन सहायता, प्राकृतिक आपदाओं में मानवीय मदद, विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अनुभव साझा करना और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों ने भारत की सकारात्मक छवि को मजबूत किया। कई विकासशील देश भारत को ऐसे साझेदार के रूप में देखते हैं जो बिना राजनीतिक दबाव के सहयोग उपलब्ध कराता है।
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यही विश्वास संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान में भारत के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
जयशंकर की सक्रिय रणनीति
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले कुछ वर्षों में बहुपक्षीय कूटनीति को विशेष प्राथमिकता दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा से लेकर G20, ब्रिक्स, क्वाड और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार सक्रिय रहा है।
हाल के महीनों में खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते संवाद को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कतर, ओमान, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ ऊर्जा, निवेश, रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस क्षेत्र के प्रभावशाली देशों का भरोसा बनाए रखने में सफल रहता है, तो OIC के भीतर भी कुछ देशों का समर्थन उसे मिल सकता है। यह चुनावी गणित को पूरी तरह बदल सकता है।
ताजिकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत
ताजिकिस्तान पहली बार UNSC की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ रहा है। अनुभव भले कम हो, लेकिन उसके पास कुछ ऐसे राजनीतिक और क्षेत्रीय कारक हैं जो उसे मजबूत दावेदार बनाते हैं।
मध्य एशिया की भौगोलिक स्थिति, अफगानिस्तान से लगी सीमा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ताजिकिस्तान की भूमिका को कई देश महत्वपूर्ण मानते हैं।
यदि OIC के सदस्य बड़ी संख्या में उसका समर्थन करते हैं, तो उसे शुरुआती दौर में पर्याप्त वोट मिल सकते हैं। इसके अलावा कुछ छोटे देशों में यह भावना भी हो सकती है कि जिन देशों को पहले अवसर नहीं मिला है, उन्हें प्रतिनिधित्व का मौका दिया जाना चाहिए।
हालांकि यह केवल संभावित चुनावी कारक हैं। अंतिम परिणाम सदस्य देशों के स्वतंत्र मतदान पर निर्भर करेगा।
क्या OIC का समर्थन निर्णायक होगा
बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि OIC का सामूहिक समर्थन ताजिकिस्तान के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे अंतिम परिणाम मान लेना जल्दबाजी होगी।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का मतदान गोपनीय होता है। कई बार किसी संगठन द्वारा घोषित समर्थन वास्तविक मतदान में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।
इसके अतिरिक्त OIC के सदस्य देशों के भारत के साथ भी मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, निवेश, व्यापार, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के कारण कई देशों के लिए भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार बन चुका है।
इसी कारण कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सार्वजनिक बयान और वास्तविक मतदान में अंतर हो सकता है।
पाकिस्तान की भूमिका
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग-अलग रहे हैं।
ऐसी स्थिति में यदि पाकिस्तान ताजिकिस्तान के समर्थन के लिए सक्रिय अभियान चलाता है तो यह आश्चर्यजनक नहीं माना जाएगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा में केवल किसी एक देश का अभियान पर्याप्त नहीं होता।
हर सदस्य देश अपने राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय संतुलन, आर्थिक संबंध और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर मतदान करता है। इसलिए पाकिस्तान की भूमिका चर्चा का विषय तो हो सकती है, लेकिन परिणाम केवल उसी पर निर्भर नहीं रहेगा।
भारत को किन क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा
विश्लेषकों के अनुसार भारत को इस चुनाव में तीन क्षेत्रों पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा।
पहला, अफ्रीका। अफ्रीकी देशों की संख्या संयुक्त राष्ट्र महासभा में काफी अधिक है और सामूहिक रूप से उनका समर्थन किसी भी उम्मीदवार के लिए निर्णायक बन सकता है।
दूसरा, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देश। इन देशों के साथ भारत ने हाल के वर्षों में व्यापार, कृषि, ऊर्जा और फार्मा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है।
तीसरा, छोटे द्वीपीय विकासशील देश। जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के मुद्दों पर भारत की सक्रिय भूमिका इन देशों के बीच उसकी स्वीकार्यता बढ़ा सकती है।
यदि भारत इन तीन क्षेत्रों में मजबूत समर्थन बनाए रखता है तो आवश्यक दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचने की संभावना काफी मजबूत हो सकती है।
भारत की वैश्विक छवि
आज भारत केवल दक्षिण एशिया की शक्ति भर नहीं माना जाता। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष कार्यक्रम, स्वास्थ्य, हरित ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है।
G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया था। इसी कारण अनेक विकासशील देशों के बीच उसकी विश्वसनीयता मजबूत हुई है।
संयुक्त राष्ट्र में भी भारत लगातार आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख, समुद्री सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और बहुपक्षीय सुधारों की वकालत करता रहा है। यही कारण है कि UNSC की अस्थायी सदस्यता के चुनाव में उसकी दावेदारी केवल राजनीतिक नहीं बल्कि व्यापक वैश्विक भूमिका से भी जुड़ी मानी जा रही है।
FAQ
भारत की UNSC दावेदारी में नया अपडेट क्या है?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के 2028-29 कार्यकाल के लिए अपनी अस्थायी सदस्यता की दावेदारी आधिकारिक रूप से शुरू कर दी है। एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से है। भारत को कई प्रमुख देशों का समर्थन प्राप्त है, जबकि ताजिकिस्तान को इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का समर्थन मिला है।
UNSC चुनाव में भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला क्यों अहम है?
UNSC चुनाव में यह मुकाबला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि एशिया-पैसिफिक सीट पर जीत के लिए दोनों देशों को संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से दो-तिहाई समर्थन हासिल करना होगा। भारत का अनुभव और वैश्विक प्रभाव उसकी ताकत है, जबकि ताजिकिस्तान को क्षेत्रीय समर्थन का लाभ मिल रहा है।
भारत को UNSC की अस्थायी सदस्यता कितनी बार मिल चुकी है?
भारत इससे पहले आठ बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत के कार्यकाल 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और 2021-22 रहे हैं। इस अनुभव के कारण भारत को वैश्विक कूटनीति में मजबूत स्थिति हासिल है।
ताजिकिस्तान को UNSC चुनाव में किस तरह का समर्थन मिला है?
ताजिकिस्तान को 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का समर्थन प्राप्त है। यह समर्थन उसे शुरुआती बढ़त देता है क्योंकि कई देशों का सामूहिक समर्थन चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान से होगा।
UNSC की अस्थायी सदस्यता जीतने के लिए कितने वोट चाहिए?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट हासिल करने के लिए उम्मीदवार देश को संयुक्त राष्ट्र महासभा में कुल 193 सदस्य देशों में से कम से कम दो-तिहाई वोट हासिल करने होते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार लगभग 129 वोटों की जरूरत पड़ती है।
भारत की UNSC दावेदारी को किन देशों का समर्थन मिला है?
भारत की दावेदारी को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, फिजी सहित कई देशों का समर्थन मिला है। इसके अलावा भारत को यूरोप, अफ्रीका, खाड़ी देशों और छोटे द्वीपीय देशों से समर्थन मिलने की उम्मीद है। भारत सक्रिय कूटनीतिक अभियान के जरिए अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
UNSC में भारत की जीत का वैश्विक असर क्या होगा?
भारत की जीत से वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है। सुरक्षा, आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों पर भारत अपनी स्थिति प्रभावी तरीके से रख सकेगा। इससे वैश्विक दक्षिण की आवाज को भी मजबूती मिलने की संभावना है।







