मुख्य बातें
- प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुजरती है।
- सऊदी अरब, यूएई और ईरान ने वैकल्पिक पाइपलाइनें बनाई हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा विकल्प पूरी तरह होर्मुज़ स्ट्रेट की भरपाई नहीं कर सकते।
- भविष्य में नए ऊर्जा कॉरिडोर विकसित करने की योजनाएं हैं, लेकिन उनके सामने राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।

होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने का मतलब सिर्फ एक समुद्री रास्ता रुकना नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की परीक्षा है
होर्मुज़ स्ट्रेट एक ऐसा समुद्री गलियारा है जिसकी चर्चा केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहती। जब भी इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है, उसका असर कुछ ही घंटों में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, गैस की कीमतों, शिपिंग कंपनियों, बीमा उद्योग और ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों तक दिखाई देने लगता है। हाल में ईरान और अमेरिका के बीच फिर बढ़े तनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि किसी कारणवश यह जलमार्ग पूरी तरह बंद हो जाए तो क्या दुनिया के पास ऐसा कोई विकल्प मौजूद है जो इसकी भरपाई कर सके।
ऊर्जा विशेषज्ञों का आकलन है कि कुछ वैकल्पिक रास्ते जरूर विकसित किए गए हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में उनकी क्षमता इतनी नहीं है कि वे होर्मुज़ स्ट्रेट की जगह पूरी तरह ले सकें। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह समुद्री मार्ग आज भी सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदुओं में शामिल है।
दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की धुरी
खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादकों का केंद्र है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और ईरान जैसे देश बड़ी मात्रा में ऊर्जा निर्यात करते हैं। इन देशों से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल समुद्री टैंकरों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है और इस पूरी व्यवस्था का सबसे अहम मार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी रास्ते से गुजरते हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा संभालता है। इसके अलावा दुनिया के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात का भी बड़ा हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि यहां लंबे समय तक व्यवधान पैदा होता है तो केवल तेल उत्पादक देशों की आय प्रभावित नहीं होगी, बल्कि ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में महंगाई, ईंधन संकट और औद्योगिक लागत भी तेजी से बढ़ सकती है।
एशिया सबसे अधिक प्रभावित क्यों होगा
दुनिया के कई बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश एशिया में स्थित हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की बड़ी मात्रा में तेल और गैस की जरूरत खाड़ी क्षेत्र से पूरी होती है।
अनुमान है कि होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने वाले लगभग 80 प्रतिशत तेल का अंतिम गंतव्य एशियाई बाजार होते हैं। इसलिए यदि यह मार्ग बाधित होता है तो सबसे पहले एशिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है।
भारत जैसे देशों के लिए इसका मतलब केवल आयात लागत बढ़ना नहीं होगा, बल्कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों, उर्वरक उद्योग, विमानन क्षेत्र और विनिर्माण लागत पर भी दबाव बढ़ सकता है।
एलएनजी के लिए जोखिम और भी बड़ा
तेल की तुलना में प्राकृतिक गैस के मामले में विकल्प और भी सीमित हैं। विशेष रूप से कतर, जो दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल है, अपने अधिकांश निर्यात के लिए इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है।
गैस को पाइपलाइन या टैंकर के माध्यम से स्थानांतरित करने की व्यवस्था तेल की तुलना में अधिक जटिल और महंगी होती है। इसलिए यदि होर्मुज़ स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है तो गैस बाजार में अस्थिरता कहीं अधिक तेज हो सकती है।
यूरोप और एशिया के कई देशों ने पिछले कुछ वर्षों में एलएनजी आयात बढ़ाया है। ऐसे में किसी भी रुकावट का प्रभाव वैश्विक गैस कीमतों पर तेजी से दिखाई दे सकता है।
पाइपलाइनें क्यों बनीं
खाड़ी क्षेत्र के देशों ने पिछले कई दशकों में यह समझ लिया था कि केवल एक समुद्री रास्ते पर निर्भर रहना रणनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा है। इसी सोच के तहत कई देशों ने ऐसी पाइपलाइन परियोजनाओं में निवेश किया जो तेल को सीधे दूसरे समुद्री बंदरगाहों तक पहुंचा सकें।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल व्यापार को आसान बनाना नहीं था, बल्कि किसी सैन्य संघर्ष या समुद्री अवरोध की स्थिति में ऊर्जा निर्यात जारी रखना भी था।
हालांकि पाइपलाइनें तकनीकी समाधान जरूर देती हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। एक पाइपलाइन की क्षमता तय होती है, जबकि समुद्री टैंकर अपेक्षाकृत अधिक लचीले होते हैं और आवश्यकता के अनुसार बड़ी मात्रा में तेल ले जा सकते हैं।
सऊदी अरब का सबसे बड़ा विकल्प
सबसे महत्वपूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन मानी जाती है, जिसे पेट्रोलाइन भी कहा जाता है। लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के यनबू बंदरगाह से जोड़ती है।
इस परियोजना का विकास ईरान-इराक युद्ध के दौर में हुआ था, जब खाड़ी क्षेत्र में समुद्री जहाजों पर हमलों ने तेल व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। बाद के वर्षों में इसकी क्षमता भी बढ़ाई गई और आपात स्थिति में यह प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल भेजने में सक्षम बनाई गई।
रणनीतिक दृष्टि से यह पाइपलाइन सऊदी अरब को कुछ राहत जरूर देती है, क्योंकि इसके माध्यम से तेल सीधे लाल सागर तक पहुंच सकता है और उसे होर्मुज़ स्ट्रेट से नहीं गुजरना पड़ता।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अकेले यह परियोजना वैश्विक मांग की तुलना में पर्याप्त नहीं है। यदि पूरे क्षेत्र की आपूर्ति बाधित होती है तो केवल सऊदी अरब की पाइपलाइन से बाजार को स्थिर रखना संभव नहीं होगा।
यूएई ने भी तैयार किया अपना बैकअप मार्ग
संयुक्त अरब अमीरात ने भी अपने ऊर्जा निर्यात के लिए वैकल्पिक व्यवस्था विकसित की है। अबू धाबी के तेल क्षेत्रों को फुजैरह बंदरगाह से जोड़ने वाली लगभग 406 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के जरिए तेल सीधे ओमान की खाड़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि निर्यात करने वाले जहाजों को होर्मुज़ स्ट्रेट पार नहीं करना पड़ता।
इसी रणनीति के तहत फुजैरह क्षेत्र को एक बड़े ऊर्जा लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करने की योजनाओं पर भी काम चल रहा है। नए बंदरगाह और अतिरिक्त टर्मिनलों के विकास से भविष्य में निर्यात क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि क्षमता और सुरक्षा दोनों ही इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
क्या मौजूदा वैकल्पिक रास्ते पर्याप्त हैं?
ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि वैकल्पिक पाइपलाइनें संकट की स्थिति में कुछ राहत जरूर देती हैं, लेकिन इनकी वास्तविक क्षमता का आकलन करना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में मौजूद प्रमुख वैकल्पिक मार्गों से प्रतिदिन लगभग 35 लाख से 55 लाख बैरल तेल ही भेजा जा सकता है।
इसके मुकाबले सामान्य परिस्थितियों में होर्मुज़ स्ट्रेट से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। यानी यदि यह समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद हो जाए, तो वर्तमान वैकल्पिक ढांचा कुल आपूर्ति के केवल एक हिस्से की ही भरपाई कर सकेगा।
यही कारण है कि ऊर्जा बाजार में किसी भी तनाव की खबर आते ही तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। बाजार केवल वास्तविक आपूर्ति पर नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों पर भी प्रतिक्रिया देता है।
ईरान ने भी तैयार किया अपना मार्ग
केवल अरब देशों ने ही नहीं, बल्कि ईरान ने भी वर्षों पहले यह समझ लिया था कि यदि किसी कारण से होर्मुज़ स्ट्रेट में आवाजाही प्रभावित होती है तो उसके निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी सोच के तहत ईरान ने गोरेह तेल क्षेत्र से ओमान की खाड़ी के जास्क टर्मिनल तक लगभग एक हजार किलोमीटर लंबी पाइपलाइन विकसित की।
इस मार्ग की अनुमानित क्षमता प्रतिदिन करीब 10 लाख बैरल तेल भेजने की बताई जाती है। इसका उद्देश्य यह है कि ईरानी तेल बिना होर्मुज़ से गुजरे सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सके।
हालांकि व्यवहारिक स्तर पर यह परियोजना अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो सकी है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, सीमित निवेश और जास्क टर्मिनल के अधूरे बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों ने इसके उपयोग को प्रभावित किया है। इसलिए कागज पर मौजूद क्षमता और वास्तविक निर्यात के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।
वैकल्पिक मार्ग भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं
केवल नई पाइपलाइन बना लेना ही पर्याप्त नहीं होता। उन्हें सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं जिनसे स्पष्ट हुआ कि वैकल्पिक ऊर्जा ढांचे भी हमलों से अछूते नहीं हैं।
यूएई के फुजैरह क्षेत्र में ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाए जाने के आरोप लग चुके हैं। इसी तरह सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से जुड़े पंपिंग स्टेशन भी हमलों का सामना कर चुके हैं। ऐसे मामलों में कुछ समय के लिए आपूर्ति प्रभावित हुई, हालांकि बाद में संचालन बहाल कर दिया गया।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष व्यापक रूप लेता है तो केवल होर्मुज़ स्ट्रेट ही नहीं, बल्कि वैकल्पिक पाइपलाइन नेटवर्क भी जोखिम में आ सकते हैं।
इराक नए निर्यात मार्ग तलाश रहा
इराक का अधिकांश तेल निर्यात दक्षिणी बंदरगाह बसरा से होता है, जहां से जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचते हैं। इस निर्भरता को कम करने के लिए इराक लंबे समय से वैकल्पिक कॉरिडोर विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण किरकुक-जेहान पाइपलाइन है, जो उत्तरी इराक को तुर्की के भूमध्यसागरीय बंदरगाह जेहान से जोड़ती है। लंबे समय तक बंद रहने के बाद इस मार्ग से फिर तेल निर्यात शुरू हुआ। हालांकि इसकी मौजूदा क्षमता अभी भी इराक के कुल निर्यात की तुलना में काफी कम है।
इराक प्रतिदिन लगभग 34 लाख बैरल कच्चा तेल निर्यात करता है, जिसमें लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अब भी दक्षिणी मार्ग से होकर जाता है। ऐसे में उत्तरी पाइपलाइन फिलहाल केवल सहायक विकल्प की भूमिका निभा रही है।
पुरानी परियोजनाओं में फिर जान फूंकने की कोशिश
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच कुछ ऐसी परियोजनाओं पर भी दोबारा चर्चा शुरू हुई है जो वर्षों से बंद पड़ी हैं।
इनमें किरकुक-बानियास पाइपलाइन प्रमुख है, जो इराक के तेल को सीरिया के भूमध्यसागरीय तट तक पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई गई थी। 1950 के दशक में तैयार हुई यह परियोजना ईरान-इराक युद्ध के दौरान बंद हो गई थी।
हाल के वर्षों में इस मार्ग को फिर से विकसित करने की संभावनाओं पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा हुई है। यदि भविष्य में यह परियोजना आगे बढ़ती है तो इराक को एक अतिरिक्त निर्यात विकल्प मिल सकता है, जिससे होर्मुज़ पर उसकी निर्भरता कुछ हद तक कम होगी।
फोर सीज़ प्रोजेक्ट कितना महत्वपूर्ण
ऊर्जा विशेषज्ञों के बीच जिस प्रस्ताव की सबसे अधिक चर्चा होती है, वह तथाकथित ‘फोर सीज़ प्रोजेक्ट’ है। इसका उद्देश्य अरब की खाड़ी, भूमध्यसागर, काला सागर और कैस्पियन सागर को ऊर्जा एवं परिवहन नेटवर्क के माध्यम से जोड़ना है।
यदि यह योजना कभी पूरी होती है तो पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच ऊर्जा आपूर्ति का स्वरूप काफी बदल सकता है। इससे कई देशों को एक से अधिक निर्यात विकल्प उपलब्ध होंगे और किसी एक समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम हो सकती है।
हालांकि यह परियोजना अभी भी दीर्घकालिक रणनीतिक प्रस्ताव के रूप में देखी जाती है। राजनीतिक सहमति, निवेश, क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा जैसी अनेक चुनौतियां इसके सामने मौजूद हैं।
बसरा-अकाबा परियोजना पर भी नजर
इराक से जॉर्डन के लाल सागर स्थित अकाबा बंदरगाह तक पाइपलाइन बिछाने की योजना भी कई दशकों से चर्चा में है। इसका उद्देश्य इराकी तेल को सीधे लाल सागर तक पहुंचाना है ताकि खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम हो सके।
हालांकि वित्तीय संसाधनों, क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण यह परियोजना अब तक आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह पाइपलाइन भविष्य में बनती है तो इराक को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विकल्प मिल सकता है।
क्या नए कॉरिडोर नई समस्याएं पैदा करेंगे?
हर नया ऊर्जा मार्ग केवल अवसर ही नहीं लाता, बल्कि नई भू-राजनीतिक चुनौतियां भी साथ लाता है।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऊर्जा आपूर्ति तुर्की, सीरिया या अन्य ट्रांजिट देशों के रास्ते अधिक होने लगती है तो इन देशों का रणनीतिक महत्व भी बढ़ जाएगा। इससे ऊर्जा व्यापार पर उनका प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक हो सकता है।
यानी एक प्रकार की निर्भरता कम होगी तो दूसरी तरह की निर्भरता पैदा होने का खतरा भी रहेगा। इसलिए केवल नए मार्ग बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका राजनीतिक और सुरक्षा संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
लाल सागर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं
यदि होर्मुज़ स्ट्रेट में व्यवधान आता है तो कई बार ध्यान लाल सागर और स्वेज़ कॉरिडोर की ओर जाता है। लेकिन हाल के वर्षों की घटनाओं ने यह भी दिखाया है कि यह क्षेत्र भी जोखिमों से मुक्त नहीं है।
मिस्र की सुमेद पाइपलाइन लाल सागर को भूमध्यसागर से जोड़ती है। यह स्वेज़ नहर का एक महत्वपूर्ण विकल्प मानी जाती है और इसके जरिए प्रतिदिन लगभग 25 से 28 लाख बैरल तेल भेजा जा सकता है। जब समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ता है तो इस पाइपलाइन का उपयोग बढ़ जाता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी क्षमता भी सीमित है। यदि खाड़ी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर तेल आपूर्ति बाधित हो जाए तो अकेले सुमेद पाइपलाइन वैश्विक मांग को संतुलित नहीं रख सकती। इसका मतलब यह है कि वैकल्पिक मार्ग मौजूद होने के बावजूद उनकी सामूहिक क्षमता अभी भी होर्मुज़ स्ट्रेट के बराबर नहीं पहुंचती।
बाब-अल-मंदेब भी बना चिंता का कारण
लाल सागर तक पहुंचने वाले जहाजों को बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से भी गुजरना पड़ता है। पिछले महीनों में इस क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों ने समुद्री परिवहन की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
यदि होर्मुज़ स्ट्रेट और लाल सागर दोनों क्षेत्रों में एक साथ अस्थिरता बनी रहती है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव कई गुना बढ़ सकता है। इससे केवल तेल ही नहीं, बल्कि कंटेनर शिपिंग, बीमा लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित होगा।
यही वजह है कि ऊर्जा कंपनियां अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सुरक्षित परिवहन नेटवर्क विकसित करने पर भी बराबर ध्यान दे रही हैं।
भारत सहित आयातक देशों के लिए क्या मायने हैं
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और पश्चिम एशिया उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इसलिए होर्मुज़ स्ट्रेट में लंबे समय तक तनाव रहने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
यदि तेल की वैश्विक कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और विमानन ईंधन की लागत बढ़ सकती है। इससे परिवहन, कृषि, उद्योग और महंगाई पर दबाव आ सकता है। सरकारें आमतौर पर ऐसे समय में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, वैकल्पिक आयात स्रोतों और दीर्घकालिक खरीद समझौतों का सहारा लेती हैं ताकि घरेलू बाजार पर असर सीमित रखा जा सके।
इसी प्रकार चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातक देश भी आपूर्ति के विविधीकरण की नीति पर तेजी से काम कर रहे हैं।
भविष्य की रणनीति क्या होगी
पश्चिम एशिया के कई देश अब यह मान चुके हैं कि केवल एक समुद्री मार्ग पर निर्भर रहना दीर्घकालिक रणनीति नहीं हो सकती। इसलिए आने वाले वर्षों में नई पाइपलाइनें, अतिरिक्त निर्यात टर्मिनल, भंडारण सुविधाएं और बहु-मार्गीय ऊर्जा नेटवर्क विकसित करने पर निवेश बढ़ने की संभावना है।
इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग और ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा भी भविष्य की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगी। ऊर्जा सुरक्षा अब केवल उत्पादन का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह भू-राजनीति, रक्षा और वैश्विक व्यापार से भी सीधे जुड़ चुकी है।
क्या होर्मुज़ स्ट्रेट का महत्व कम हो जाएगा
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ वैकल्पिक परियोजनाओं के विस्तार से होर्मुज़ स्ट्रेट पर निर्भरता धीरे-धीरे घट सकती है। लेकिन अधिकांश विश्लेषकों की राय इससे अलग है।
उनके अनुसार, नई पाइपलाइनें और वैकल्पिक कॉरिडोर जोखिम को कम जरूर करेंगे, लेकिन निकट भविष्य में कोई भी व्यवस्था इतनी व्यापक नहीं है कि प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी के परिवहन की पूरी जिम्मेदारी संभाल सके।
यानी आने वाले वर्षों में दुनिया के पास पहले से अधिक विकल्प जरूर होंगे, लेकिन होर्मुज़ स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व पूरी तरह समाप्त होने की संभावना फिलहाल नहीं दिखाई देती।
विशेषज्ञों की राय क्या कहती है
पश्चिम एशिया और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का व्यापक आकलन है कि भविष्य में देशों की प्राथमिकता ऊर्जा निर्यात के लिए एक से अधिक मार्ग विकसित करना होगी। इससे किसी एक क्षेत्र में सैन्य तनाव या राजनीतिक संकट आने पर वैश्विक आपूर्ति पूरी तरह बाधित नहीं होगी।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि नई पाइपलाइनें और कॉरिडोर अपने साथ नए सुरक्षा जोखिम और राजनीतिक निर्भरता भी ला सकते हैं। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा की वास्तविक चुनौती केवल नए रास्ते बनाना नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित और स्थिर बनाए रखना होगी।
निष्कर्ष
होर्मुज़ स्ट्रेट केवल एक समुद्री जलडमरूमध्य नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और इराक जैसे देशों ने वैकल्पिक पाइपलाइनें विकसित कर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जबकि भविष्य में नए ऊर्जा कॉरिडोर भी विकसित करने की योजनाएं सामने हैं।
फिर भी मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि इन सभी विकल्पों की संयुक्त क्षमता अभी भी उस विशाल ऊर्जा प्रवाह की बराबरी नहीं कर सकती जो प्रतिदिन होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुजरता है। इसके अलावा वैकल्पिक मार्ग भी क्षेत्रीय संघर्ष, आतंकवादी हमलों, राजनीतिक अस्थिरता और समुद्री सुरक्षा जैसी चुनौतियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं।
यही कारण है कि यदि कभी होर्मुज़ स्ट्रेट लंबे समय के लिए बंद होता है, तो दुनिया के पास कुछ वैकल्पिक रास्ते जरूर होंगे, लेकिन वे वैश्विक ऊर्जा बाजार को पूरी तरह सामान्य बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं माने जाते। निकट भविष्य में इस समुद्री मार्ग का रणनीतिक महत्व बना रहने की संभावना सबसे अधिक है।
FAQ
1. होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने पर सबसे पहले किन देशों पर असर पड़ेगा?
सबसे अधिक असर उन देशों पर पड़ेगा जो पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलएनजी आयात करते हैं। इनमें भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया प्रमुख हैं। यूरोप भी गैस बाजार के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकता है। तेल की कीमतों में तेजी का असर लगभग सभी आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
2. क्या सऊदी अरब की पाइपलाइन होर्मुज़ स्ट्रेट की जगह ले सकती है?
नहीं। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट (पेट्रोलाइन) पाइपलाइन एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग है, लेकिन इसकी क्षमता सीमित है। यह आपात स्थिति में लाखों बैरल तेल भेज सकती है, फिर भी होर्मुज़ स्ट्रेट से सामान्य दिनों में गुजरने वाले लगभग दो करोड़ बैरल प्रतिदिन के प्रवाह की पूरी भरपाई नहीं कर सकती।
3. कतर के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
कतर दुनिया के प्रमुख एलएनजी निर्यातकों में शामिल है और उसका अधिकांश गैस निर्यात होर्मुज़ स्ट्रेट के जरिए होता है। फिलहाल उसके पास बड़े पैमाने पर एलएनजी निर्यात के लिए समान क्षमता वाला कोई वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस जलमार्ग में व्यवधान गैस बाजार पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
4. क्या भविष्य में नए ऊर्जा कॉरिडोर होर्मुज़ पर निर्भरता कम कर देंगे?
कुछ हद तक हां। इराक, सऊदी अरब, यूएई और अन्य देशों की नई पाइपलाइन परियोजनाएं जोखिम कम कर सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में कोई भी एक या संयुक्त परियोजना होर्मुज़ स्ट्रेट की पूरी भूमिका नहीं निभा पाएगी।
5. होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने से भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है?
यदि लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होती है और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो भारत में ईंधन की लागत पर दबाव आ सकता है। अंतिम कीमतें सरकार की कर नीति, तेल कंपनियों के मूल्य निर्धारण और वैश्विक बाजार की स्थिति पर भी निर्भर करेंगी।
6. क्या केवल पाइपलाइनें ही समाधान हैं?
नहीं। ऊर्जा सुरक्षा के लिए पाइपलाइनें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, विविध आयात स्रोत, समुद्री सुरक्षा, नए बंदरगाह और बहु-देशीय ऊर्जा समझौते भी समान रूप से आवश्यक हैं। अधिकांश देश अब इन सभी उपायों पर एक साथ काम कर रहे हैं।
7. क्या होर्मुज़ स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व भविष्य में खत्म हो जाएगा?
मौजूदा परिस्थितियों में इसकी संभावना कम है। वैकल्पिक मार्ग बढ़ने से निर्भरता घट सकती है, लेकिन वैश्विक तेल और गैस व्यापार के मौजूदा पैमाने को देखते हुए होर्मुज़ स्ट्रेट आने वाले वर्षों तक दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में बना रहेगा।







