कोविड-19 की दूसरी लहर का वह भयावह दौर आज भी देश की यादों में गहरे जख्म की तरह बस गया है। कोरोना के साथ-साथ एक और खतरनाक बीमारी ने हजारों परिवारों को दहला दिया था—ब्लैक फंगस (म्यूकोरमायकोसिस)। यह संक्रमण अनेक मरीजों के चेहरे, आंखें और जबड़ा तक निगल गया था। कई लोग वर्षों तक बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए, तो कई अपनी ही पहचान से शर्म में डूब गए।

लेकिन इसी अंधेरे में एक रोशनी बनकर उभरा एम्स भोपाल, जहां डॉक्टरों की एक टीम ने 52 मरीजों के लिए ‘नए चेहरे’ की कहानी लिखी—ठीक फ़िल्मी चमत्कार जैसी, लेकिन पूरी तरह चिकित्सा विज्ञान की ताकत पर आधारित।
महामारी के बाद का दर्द: टूटे चेहरे, टूटा मन
ब्लैक फंगस से जिन लोगों ने अपना जबड़ा खोया, उनकी कहानी सिर्फ एक बीमारी की नहीं है, बल्कि उस मानसिक संघर्ष की भी है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
- चेहरा खराब होने के बाद इतने लोग घरों में ही कैद हो गए
- किसी ने महीनों तक आइना नहीं देखा
- कई परिवारिक कार्यक्रमों में जाना बंद
- बच्चों से दूर रहना पड़ा
- खाना, बोलना और सामान्य बातचीत मुश्किल
एम्स भोपाल की टीम ने अपने अध्ययन में पाया कि अधिकांश मरीजों में गहन अवसाद, चिड़चिड़ापन, सामाजिक दूरी, आत्महीनता और आत्मविश्वास की भारी कमी जैसे लक्षण देखे गए।
कोविड के बाद हुई यह बीमारी सिर्फ शारीरिक जख्म नहीं दे रही थी—यह आत्मा को भी भीतर तक घायल कर चुकी थी।
एम्स भोपाल ने उठाया बीड़ा: ‘हम सिर्फ सर्जरी नहीं, जिंदगी वापस देंगे’
एम्स भोपाल डेंटिस्ट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंशुल राय और उनकी टीम ने इन मरीजों की पीड़ा को सिर्फ एक चिकित्सा केस की तरह नहीं देखा। उनके लिए यह मिशन था—लोगों को नया जीवन देना।
उनका पहला लक्ष्य था—
“मरीजों को फिर से समाज में उसी आत्मविश्वास के साथ खड़ा करना, जैसे बीमारी से पहले थे।”
टीम ने शुरू किया रिसर्च + इमोशनल स्टडी
- मरीजों से विस्तृत बातचीत
- उनकी मानसिक स्थिति का मूल्यांकन
- परिवारों से जानकारी
- सर्जरी की तैयारी
- चेहरों का 3D स्कैन
- हड्डियों की स्थिति का माइक्रो-एनालिसिस
इसके बाद शुरू हुई वह तकनीक, जिसे चिकित्सा विज्ञान में कठिन सर्जरी की श्रेणी में रखा जाता है— जायगोमैटिक इम्प्लांट
क्या है ‘जायगोमैटिक इम्प्लांट’?
जबड़ा न होने के कारण सामान्य इम्प्लांट लगाना संभव नहीं होता। इसलिए डॉक्टरों ने जबड़े के बदले आंख के पास स्थित मजबूत हड्डी—जायगोमैटिक बोन में इम्प्लांट लगाने का तरीका अपनाया।
इसमें है सबसे बड़ा जोखिम:
- आंख के पास बेहद संवेदनशील नसें
- सिर की प्रमुख हड्डियों से संपर्क
- गलती की कोई गुंजाइश नहीं
- इम्प्लांट का कोण और स्थान 0.1 mm भी गलत हुआ तो गंभीर खतरा
लेकिन एम्स ने इसे चुनौती नहीं, ज़िम्मेदारी समझा।
3D प्रिंटिंग तकनीक ने बदली तस्वीर
डॉक्टरों ने हर मरीज की खोपड़ी और चेहरे का 3D प्रिंट मॉडल तैयार किया।
इससे सर्जरी:
- 100% सटीक
- तेज
- सुरक्षित
- और बेहद सफल
इस तकनीक से 77 जायगोमैटिक इम्प्लांट्स लगाए गए—हर सर्जरी एक अलग कहानी, नया संघर्ष और नया समाधान थी।
एक साल से चुप बैठे चेहरे अचानक खिल उठे
सर्जरी के बाद जो तस्वीर सामने आई, वह चिकित्सा इतिहास में दर्ज की जाने लायक है।
मरीज अब:
- सामान्य रूप से खाना खा रहे हैं
- स्पष्ट बोल पा रहे हैं
- बाहर बिना नकाब निकल रहे हैं
- परिवारिक समारोहों में शामिल हो रहे हैं
- नौकरी और कारोबार वापस शुरू
- चेहरे पर वो मुस्कान, जो महामारी छीन ले गई थी
इन 52 मरीजों की कहानियों को दक्षिण कोरिया के प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘Archives of Craniofacial Surgery’ ने भी प्रकाशित किया।
क्या है ब्लैक फंगस? क्यों बढ़ा कोविड के समय?
ब्लैक फंगस या Mucormycosis एक खतरनाक फंगल संक्रमण है, जो कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों को बुरी तरह प्रभावित करता है।
कोविड के दौरान इसके तेज़ी से फैलने के कारण:
- अनियंत्रित शुगर
- स्टेरॉयड का अत्यधिक उपयोग
- कमजोर इम्युनिटी
- पोस्ट-कोविड संक्रमण
यह सीधा हमला करता है:
- नाक
- आंख
- साइनस
- जबड़े
- मस्तिष्क पर भी
समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकता है।
भोपाल ने पूरे भारत को दिया एक संदेश
यह उपलब्धि सिर्फ चिकित्सा सफलता नहीं है—यह संदेश है उन सभी लोगों के लिए जिन्होंने बीमारी के बाद अपने जीवन को ‘ठहर’ जाने दिया। एम्स भोपाल ने साबित कर दिया कि—
“चेहरे बदले जा सकते हैं, मुस्कान लौटाई जा सकती है…
लेकिन उम्मीद कभी नहीं खोनी चाहिए।”
निष्कर्ष — यह सिर्फ चिकित्सा नहीं, एक सामाजिक पुनर्जन्म है
इन 52 मरीजों की जिंदगी यह बताती है कि बीमारी इंसान का रूप छीन सकती है, लेकिन मानवता और वैज्ञानिक प्रगति उसे वापस भी दे सकती है। एम्स भोपाल की टीम ने 3D सर्जिकल प्लानिंग, जायगोमैटिक इम्प्लांट और हाई-रिस्क सर्जरी के जरिए एक बेहद कठिन चुनौती को न केवल स्वीकार किया, बल्कि उसे ऐसे अंजाम तक पहुँचाया, जिसने भारत में चिकित्सा के नए मानक स्थापित कर दिए।
