मुख्य बातें
- प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में भारत को लेकर अमेरिकी नागरिकों की राय कई प्रमुख सहयोगी देशों से कम सकारात्मक दिखाई गई।
- सर्वे में भारत के लिए 9 प्रतिशत लोगों ने बहुत गर्मजोशी वाला और 19 प्रतिशत ने कुछ सकारात्मक रुख दर्ज कराया।
- चीन को औसतन 37 और रूस को 27 अंक मिले, जबकि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की रेटिंग अपेक्षाकृत बेहतर रही।
- सर्वे के नतीजे किसी देश के प्रति पूरे अमेरिकी समाज की एक जैसी सोच साबित नहीं करते; वे लोगों की धारणाओं का एक समय-विशेष का आकलन हैं।

अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि को लेकर सामने आया नया सर्वे भारत-अमेरिका संबंधों पर एक अहम सवाल खड़ा करता है। प्यू रिसर्च सेंटर की ओर से प्रकाशित सर्वेक्षण में भारत को लेकर अमेरिकी लोगों की भावनाएं कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के मुकाबले कम सकारात्मक दर्ज की गईं। रिपोर्ट में चीन और रूस के प्रति अमेरिकी नजरिया भी काफी ठंडा दिखाई देता है, लेकिन भारत का स्थान उन देशों के समूह में है जिन्हें सर्वे में अपेक्षाकृत कम अनुकूल प्रतिक्रिया मिली। ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब अमेरिका दिसंबर में मियामी में जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंध व्यापार, तकनीक, रक्षा तथा वैश्विक राजनीति जैसे कई क्षेत्रों में अहम बने हुए हैं।
सर्वे के मुताबिक, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान और इटली को औसतन 60 से 65 के बीच रेटिंग मिली। इसके विपरीत चीन का औसत स्कोर 37 और रूस का 27 रहा। भारत के बारे में दिए गए जवाबों में 9 प्रतिशत अमेरिकी लोगों ने बहुत सकारात्मक या गर्मजोशी वाला नजरिया दर्ज किया, जबकि 19 प्रतिशत ने कुछ सकारात्मक रुख दिखाया। दूसरी ओर, 20 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति बहुत ठंडा नजरिया जताया। इन नतीजों को सीधे तौर पर यह कहने का आधार नहीं माना जा सकता कि सभी अमेरिकी भारत से नफरत करते हैं। सर्वे नागरिकों की राय और भावनाओं को मापता है, न कि किसी देश की पूरी आबादी के व्यवहार या दोनों सरकारों के रिश्तों का अंतिम फैसला सुनाता है।
अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि क्यों चर्चा में
किसी देश के प्रति दूसरे देश के नागरिकों का नजरिया केवल राजनयिक बैठकों या नेताओं के बयानों से तय नहीं होता। आम लोगों की धारणा पर समाचारों, राजनीतिक बहसों, आर्थिक हितों, सुरक्षा संबंधी चिंताओं, प्रवासी समुदायों, सांस्कृतिक संपर्क और सोशल मीडिया की चर्चाओं का भी प्रभाव पड़ सकता है। प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में भारत को अपेक्षाकृत कम सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलना इसी व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है।
भारत और अमेरिका के बीच पिछले वर्षों में रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, शिक्षा, अंतरिक्ष, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे विषयों पर संपर्क बढ़ा है। दोनों देशों के बीच भारतीय मूल के लोगों का बड़ा समुदाय भी मौजूद है, जो कारोबार, विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और राजनीति में सक्रिय है। इसके बावजूद किसी देश की सरकार के साथ रणनीतिक साझेदारी होने का अर्थ यह नहीं कि उस देश की जनता के बीच उसकी छवि अपने आप सबसे बेहतर हो जाएगी। सरकारी रिश्ते और जनमत एक-दूसरे से जुड़े जरूर हैं, लेकिन दोनों हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते।
इस सर्वे का महत्व इसलिए भी है कि यह केवल भारत को लेकर राय नहीं बताता, बल्कि कई देशों के प्रति अमेरिकी नागरिकों की भावनाओं की तुलना भी करता है। जब एक ही सर्वे में सहयोगी देशों को अपेक्षाकृत ऊंची और कुछ अन्य देशों को कम रेटिंग मिलती है, तो इससे पता चलता है कि लोगों के मन में देशों की अलग-अलग छवियां बनी हुई हैं। हालांकि, इस अंतर के पीछे कौन-सा कारण कितना जिम्मेदार है, इसका निष्कर्ष निकालने के लिए केवल रेटिंग के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं।
प्यू सर्वे में भारत को कितने अंक मिले
रिपोर्ट में भारत के प्रति अमेरिकी लोगों की भावनाओं को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 9 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने भारत के लिए बहुत गर्मजोशी वाला नजरिया जताया, जबकि 19 प्रतिशत ने कुछ गर्मजोशी दिखाई। 34 प्रतिशत जवाबदाता बीच की श्रेणी में रहे। वहीं, 15 प्रतिशत ने भारत को लेकर कुछ ठंडा नजरिया दर्ज कराया और 20 प्रतिशत ने बहुत ठंडा रुख दिखाया।
इन आंकड़ों को पढ़ते समय एक जरूरी बात ध्यान में रखनी चाहिए। बहुत सकारात्मक नजरिया रखने वालों का प्रतिशत कम होना और बहुत नकारात्मक नजरिया रखने वालों का हिस्सा अधिक होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। बीच की श्रेणी में आने वाले 34 प्रतिशत लोगों की मौजूदगी बताती है कि भारत को लेकर कई उत्तरदाताओं की राय न तो स्पष्ट रूप से बहुत अनुकूल थी और न ही बहुत प्रतिकूल। इसलिए केवल सबसे सकारात्मक और सबसे नकारात्मक श्रेणियों को उठाकर पूरे सर्वे का निष्कर्ष निकालना तस्वीर को अधूरा बना सकता है।
भारत के लिए बहुत गर्मजोशी जताने वाले लोगों का अनुपात कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की तुलना में कम रहा। कनाडा के लिए 48 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया के लिए 42 प्रतिशत और जापान के लिए 40 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बहुत गर्मजोशी वाला नजरिया जताया। इन देशों को कुछ सकारात्मक नजरिया रखने वालों का हिस्सा भी अपेक्षाकृत बड़ा रहा। इससे उनकी समग्र छवि सर्वे में अधिक अनुकूल दिखाई देती है।
भारत के आंकड़ों का सही अर्थ समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि सर्वे किस समय किया गया, उसमें किन लोगों को शामिल किया गया और प्रश्न किस तरह पूछे गए। उपलब्ध सामग्री में सर्वे के नमूने का आकार, प्रश्नावली की पूरी भाषा और सभी पद्धतिगत विवरण शामिल नहीं हैं। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर भारत की छवि में गिरावट का कोई निश्चित कारण बताना जल्दबाजी होगी।
रूस और चीन के प्रति अमेरिकी नजरिया
प्यू के सर्वे में रूस और चीन को लेकर अमेरिकी नागरिकों का रुख भारत की तुलना में कुछ अलग संदर्भ में दिखाई देता है। चीन को औसतन 37 अंक मिले, जबकि रूस को 27 अंक के साथ सबसे नीचे रखा गया। रिपोर्ट में बताया गया कि 51 प्रतिशत अमेरिकी उत्तरदाताओं ने रूस के प्रति बहुत ठंडा नजरिया जताया। चीन के प्रति बहुत ठंडी राय रखने वालों का हिस्सा लगभग एक तिहाई था।
रूस के प्रति नकारात्मक धारणा का संबंध लंबे समय से जारी सुरक्षा और भू-राजनीतिक तनावों से हो सकता है। अमेरिका और रूस के संबंधों पर यूक्रेन युद्ध, प्रतिबंध, सैन्य प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मतभेदों की छाया रही है। हालांकि, सर्वे के इन आंकड़ों से यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक उत्तरदाता ने अपनी राय किसी एक ही मुद्दे के कारण बनाई। किसी देश के बारे में जनमत कई घटनाओं और लंबे समय से बन रही धारणाओं का परिणाम हो सकता है।
चीन के मामले में तस्वीर कुछ अधिक जटिल है। अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक संबंध व्यापक हैं, लेकिन व्यापार, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ताइवान, सैन्य गतिविधियों और वैश्विक प्रभाव को लेकर दोनों देशों में मतभेद भी हैं। सर्वे में चीन का औसत स्कोर 2021 के 28 अंकों से बढ़कर 37 बताया गया। यह बदलाव दर्शाता है कि उस अवधि में चीन के प्रति अमेरिकी लोगों की औसत राय में कुछ सुधार दर्ज किया गया। फिर भी 37 का स्कोर यह नहीं बताता कि चीन को व्यापक रूप से पसंदीदा देश माना जा रहा है; यह तुलनात्मक माप है, जिसकी व्याख्या दूसरे आंकड़ों और सर्वे की पद्धति के साथ की जानी चाहिए।
भारत के लिए यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत को कई बार अमेरिका की एशिया संबंधी रणनीति में एक अहम साझेदार के रूप में देखा जाता है। लेकिन किसी देश का रणनीतिक महत्व और वहां के नागरिकों के बीच उसकी लोकप्रियता अलग-अलग माप हैं। चीन और रूस की कम रेटिंग से भारत की रेटिंग अपने आप बेहतर नहीं हो जाती। इसी तरह भारत को अपेक्षाकृत कम सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने का अर्थ यह नहीं कि अमेरिकी सरकार भारत को रूस या चीन के समान प्रतिद्वंद्वी मानती है।
कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान आगे क्यों
सर्वे में कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान को अपेक्षाकृत अनुकूल रेटिंग मिली। कनाडा के लिए बहुत गर्मजोशी जताने वाले उत्तरदाताओं का हिस्सा 48 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया के लिए 42 प्रतिशत और जापान के लिए 40 प्रतिशत था। इटली को भी बेहतर रेटिंग वाले देशों में शामिल किया गया। इन नतीजों से पता चलता है कि अमेरिकी लोगों की नजर में देशों की छवि एक जैसी नहीं है, भले ही उनमें से कई अमेरिका के साझेदार हों।
इन देशों के साथ अमेरिका के लंबे समय से सुरक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। कनाडा भौगोलिक रूप से अमेरिका का पड़ोसी है और दोनों देशों के बीच लोगों, वस्तुओं तथा सेवाओं का व्यापक आवागमन होता है। ऑस्ट्रेलिया और जापान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी के अहम हिस्से हैं। इन देशों के साथ गठबंधन, साझा संस्थागत संबंध और नियमित संपर्क उनकी छवि को प्रभावित कर सकते हैं। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि सर्वे में बेहतर रेटिंग का कारण केवल यही कारक हैं, क्योंकि उपलब्ध आंकड़े लोगों की राय के पीछे के कारणों को अलग-अलग करके नहीं बताते।
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ब्राजील जैसे देशों को भी सर्वे में तुलनात्मक रूप से अधिक सकारात्मक औसत प्रतिक्रिया मिली। इन देशों के प्रति अमेरिकी जनमत को केवल उनकी सरकारों के साथ मौजूदा रिश्तों के आधार पर समझना कठिन है। ऐतिहासिक संबंध, लोकप्रिय संस्कृति, पर्यटन, व्यापार, प्रवासी समुदाय और मीडिया में उनकी मौजूदगी भी किसी देश की सार्वजनिक छवि में भूमिका निभा सकती है।
भारत की स्थिति को समझते समय यह तुलना उपयोगी है, लेकिन इसका अर्थ किसी देश को दूसरे से बेहतर या बदतर ठहराना नहीं है। सर्वे में दर्ज भावनाएं उत्तरदाताओं की व्यक्तिगत धारणाओं का औसत हैं। अलग-अलग उम्र, शिक्षा, राजनीतिक झुकाव, क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में रुचि रखने वाले लोगों की राय एक-दूसरे से काफी अलग हो सकती है। विस्तृत उपसमूह आंकड़ों के बिना इन अंतरों के बारे में निश्चित दावा करना ठीक नहीं होगा।
भारत-अमेरिका संबंधों से इसका क्या अर्थ
अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि का सवाल इसलिए अहम है क्योंकि दोनों देशों के संबंध केवल सरकारों तक सीमित नहीं हैं। व्यापारिक साझेदारियां, उच्च शिक्षा, शोध, तकनीकी क्षेत्र में निवेश, पर्यटन और भारतीय मूल के लोगों की सामाजिक भूमिका इन संबंधों को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ती हैं। अगर किसी समय भारत को लेकर अमेरिकी जनता में नकारात्मक धारणाएं बढ़ती हैं, तो इसका असर अपने आप किसी खास नीति पर पड़ेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। फिर भी जनमत लंबे समय में राजनीतिक बहस और सार्वजनिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है।
लोकतांत्रिक देशों में विदेश नीति के बड़े फैसले आम तौर पर सरकारें और संबंधित संस्थान लेते हैं, लेकिन मतदाताओं की सोच भी राजनीतिक माहौल का हिस्सा होती है। किसी देश के बारे में लगातार नकारात्मक खबरें, विवाद या राजनीतिक बयान सार्वजनिक धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। दूसरी तरफ, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और कारोबारी सहयोग से लोगों के बीच संपर्क बढ़ने पर समझ भी मजबूत हो सकती है। इसीलिए देशों के बीच मजबूत राजनयिक संबंधों के साथ-साथ जनता के स्तर पर संवाद भी महत्वपूर्ण है।
भारत और अमेरिका के बीच सहयोग के कई क्षेत्र हैं, लेकिन मतभेद भी मौजूद रहे हैं। व्यापार से जुड़े विवाद, आयात-निर्यात नीतियां, शुल्क, मानवाधिकारों पर बहस और रूस के साथ भारत के संबंध जैसे मुद्दे समय-समय पर अमेरिकी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनते हैं। इन विषयों पर सार्वजनिक बहस किसी व्यक्ति की भारत संबंधी धारणा को प्रभावित कर सकती है, लेकिन मौजूदा सर्वे यह स्थापित नहीं करता कि भारत की रेटिंग इन्हीं कारणों से कम रही। किसी विशेष कारण को जिम्मेदार ठहराने के लिए अलग शोध और उत्तरदाताओं के विचारों पर अधिक विस्तृत जानकारी चाहिए।
क्या सर्वे भारत से नफरत साबित करता है
इस सर्वे के आधार पर यह कहना कि अमेरिकी नागरिक भारत से नफरत करते हैं, आंकड़ों की जरूरत से ज्यादा व्यापक व्याख्या होगी। नफरत एक तीव्र भावनात्मक शब्द है, जबकि सर्वे में देशों के प्रति गर्मजोशी या ठंडेपन जैसे नजरियों को मापा गया है। किसी देश के प्रति बहुत ठंडी राय रखने वाला हर व्यक्ति जरूरी नहीं कि वहां के लोगों, संस्कृति या समाज के प्रति भी नफरत रखता हो। वह सरकार की किसी नीति, किसी विवाद या अंतरराष्ट्रीय भूमिका से असहमत हो सकता है; सर्वे के सामान्य स्कोर से इन कारणों को अलग-अलग पहचानना संभव नहीं है।
भारत के मामले में 34 प्रतिशत उत्तरदाता बीच की श्रेणी में थे। इसके अतिरिक्त 9 प्रतिशत ने बहुत सकारात्मक और 19 प्रतिशत ने कुछ सकारात्मक नजरिया जताया। इन आंकड़ों का अर्थ है कि लोगों की राय अलग-अलग स्तरों पर बंटी हुई है। 20 प्रतिशत लोगों का बहुत ठंडा रुख ध्यान देने योग्य है, लेकिन उसे पूरी अमेरिकी आबादी की राय मान लेना सही नहीं होगा। इसी तरह सकारात्मक राय रखने वाले लोगों को नजरअंदाज करना भी अधूरा निष्कर्ष होगा।
समाचारों की सुर्खियों में अक्सर सबसे तीखे आंकड़े अधिक ध्यान खींचते हैं। लेकिन सार्वजनिक नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गंभीर चर्चा के लिए पूरी तस्वीर देखना जरूरी है। सर्वे का उद्देश्य किसी देश को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह समझने में मदद करना है कि दूसरे देशों के बारे में अमेरिकी लोगों की धारणाएं किस दिशा में हैं। इसलिए भारत के लिए उपयोगी सवाल यह है कि इन आंकड़ों से क्या सीखा जा सकता है और किन अतिरिक्त जानकारियों की जरूरत है।
जनमत और सरकारी नीति में अंतर
किसी देश के प्रति आम नागरिकों की राय और सरकार की विदेश नीति हमेशा एक जैसी नहीं होती। सरकारें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक हित, रणनीतिक साझेदारी और दीर्घकालीन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर निर्णय लेती हैं। आम नागरिकों की राय में व्यक्तिगत अनुभव, मीडिया कवरेज, घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की भूमिका हो सकती है। इस कारण सर्वे में किसी देश को कम रेटिंग मिलना यह साबित नहीं करता कि सरकार उस देश के साथ अपने संबंध कमजोर करने जा रही है।
भारत-अमेरिका संबंधों में इस अंतर को समझना विशेष रूप से जरूरी है। दोनों देशों के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी हो सकती है, जबकि कुछ राजनीतिक या आर्थिक मुद्दों पर मतभेद बने रह सकते हैं। इसी तरह किसी अमेरिकी नागरिक का भारत के बारे में ठंडा नजरिया होना यह जरूरी नहीं बनाता कि वह भारतीय छात्रों, पेशेवरों या भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के प्रति भी वैसा ही व्यवहार करता हो। देश, सरकार और व्यक्ति के बारे में राय को एक ही श्रेणी में रखना गलत निष्कर्ष पैदा कर सकता है।
इसलिए इस सर्वे को द्विपक्षीय रिश्तों का अंतिम मूल्यांकन समझने के बजाय जनमत का एक संकेतक मानना बेहतर होगा। यह बताता है कि सार्वजनिक धारणा पर ध्यान देना जरूरी है, लेकिन यह अपने आप में न तो किसी कूटनीतिक संकट का प्रमाण है और न ही भविष्य में संबंध बिगड़ने की निश्चित भविष्यवाणी।
भारत अपनी वैश्विक छवि कैसे मजबूत कर सकता है
किसी देश की वैश्विक छवि लंबे समय में बनती है। इसमें सरकारी संवाद, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा, कारोबार, पर्यटन और नागरिकों के अनुभवों की भूमिका होती है। भारत के लिए अमेरिका में अपनी छवि मजबूत करने का अर्थ केवल सकारात्मक प्रचार करना नहीं, बल्कि लोगों के बीच वास्तविक संपर्क और समझ को बढ़ाना भी है।
विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान, छात्र विनिमय, उद्यमिता, कला और सांस्कृतिक कार्यक्रम आम नागरिकों को एक-दूसरे के समाज के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी देते हैं। जब लोगों को किसी देश के बारे में केवल राजनीतिक बहसों या समाचारों से नहीं, बल्कि वहां के लोगों के अनुभवों से भी जानकारी मिलती है, तो उनकी राय अधिक व्यापक हो सकती है। कारोबारी और तकनीकी सहयोग भी देशों के बीच साझा हितों को स्पष्ट कर सकता है।
हालांकि, किसी एक सर्वे के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भारत को तत्काल कोई खास अभियान शुरू करना चाहिए या उसकी विदेश नीति में बदलाव की जरूरत है। पहले यह समझना होगा कि भारत की छवि किन समूहों में कैसी है, अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाले लोगों की राय में कितना अंतर है और कौन-से मुद्दे उनकी धारणाओं से जुड़े हैं। उपलब्ध रिपोर्ट में उद्धृत आंकड़े इस तरह के सभी सवालों का जवाब नहीं देते।
साथ ही, सार्वजनिक छवि के बारे में चिंता करते समय वास्तविक नीति और संवाद की गुणवत्ता को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसी देश के बारे में सकारात्मक राय केवल प्रचार से लंबे समय तक कायम नहीं रहती। विश्वसनीय सहयोग, पारदर्शी संवाद और नागरिकों के बीच संपर्क इसके अधिक टिकाऊ आधार हो सकते हैं।
आगे किन आंकड़ों पर नजर रहेगी
इस सर्वे के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत के प्रति अमेरिकी नजरिया समय के साथ किस दिशा में जाता है। एक सर्वेक्षण एक विशेष अवधि में लोगों की राय दिखाता है। उससे दीर्घकालीन बदलाव की पुष्टि करने के लिए पिछले सर्वेक्षणों से तुलना, प्रश्नों की समानता और सर्वे की पद्धति को समझना आवश्यक है। भारत की रेटिंग पहले के वर्षों में कितनी थी और उसमें कितना बदलाव आया, इसकी स्पष्ट जानकारी के बिना यह दावा करना जल्दबाजी होगा कि भारत की छवि तेजी से गिर रही है।
दूसरा पहलू यह है कि क्या अलग-अलग समूहों में भारत को लेकर अलग राय है। उम्र, राजनीतिक रुझान, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय समाचारों में रुचि और भारत से व्यक्तिगत संपर्क जैसे कारक संभावित रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन इन्हें प्रभावी कारण मानने के लिए सर्वे के विस्तृत परिणामों की जरूरत होगी। केवल कुल प्रतिशत से यह पता नहीं चलता कि किस समूह ने किस वजह से कोई राय बनाई।
तीसरा सवाल यह है कि भविष्य में भारत और अमेरिका के बीच प्रमुख मुद्दे किस तरह आगे बढ़ते हैं। व्यापार, तकनीक, रक्षा, शिक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा में सहयोग सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह दोनों देशों के बीच किसी विवाद का समाचार कवरेज भी लोगों की धारणाओं पर असर डाल सकता है। फिर भी किसी एक घटनाक्रम को भविष्य में रेटिंग बदलने का निश्चित कारण नहीं कहा जा सकता।
प्यू सर्वे का मुख्य संदेश यही है कि भारत की वैश्विक छवि को केवल उच्चस्तरीय राजनयिक संबंधों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। अमेरिकी नागरिकों की राय एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है—कुछ लोग भारत के प्रति सकारात्मक हैं, कुछ बीच की श्रेणी में हैं और एक उल्लेखनीय हिस्सा ठंडा नजरिया रखता है। इसे पूरे देश की भावनाओं का एक जैसा फैसला मानने के बजाय आगे की पड़ताल के संकेत के रूप में देखना अधिक उपयोगी है।
निष्कर्ष
अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि पर प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे ने ध्यान खींचा है, क्योंकि भारत को कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के मुकाबले कम सकारात्मक रेटिंग मिली। चीन और रूस के प्रति अमेरिकी नजरिया भी नकारात्मक रहा, खासकर रूस के मामले में बहुत ठंडी राय रखने वालों का हिस्सा काफी बड़ा बताया गया। लेकिन सर्वे यह साबित नहीं करता कि अमेरिकी नागरिक सामूहिक रूप से भारत से नफरत करते हैं। आंकड़े लोगों की विविध धारणाओं को सामने रखते हैं और उनकी सही व्याख्या के लिए पद्धति, समय तथा व्यापक संदर्भ को समझना जरूरी है। भारत-अमेरिका संबंधों के भविष्य को परखते समय जनमत को एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाना चाहिए, न कि दोनों देशों के रिश्तों का अकेला पैमाना।
FAQ
1. अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि को लेकर प्यू सर्वे का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
प्यू रिसर्च सेंटर के उपलब्ध आंकड़ों में भारत के प्रति अमेरिकी नागरिकों का नजरिया कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की तुलना में कम सकारात्मक दिखाई देता है। भारत के लिए 9 प्रतिशत लोगों ने बहुत गर्मजोशी और 19 प्रतिशत ने कुछ गर्मजोशी वाला रुख जताया। हालांकि, सर्वे यह साबित नहीं करता कि सभी अमेरिकी भारत के प्रति नकारात्मक हैं।
2. क्या प्यू सर्वे साबित करता है कि अमेरिकी नागरिक भारत से नफरत करते हैं?
नहीं। सर्वे में देशों के प्रति गर्मजोशी और ठंडेपन जैसे नजरियों को मापा गया है। किसी देश के प्रति ठंडी राय को सीधे नफरत कहना सही नहीं होगा। लोगों की राय सरकार की नीतियों, समाचारों, व्यक्तिगत अनुभवों और राजनीतिक विचारों से प्रभावित हो सकती है। इसलिए अमेरिकी नागरिकों में भारत की छवि को समझने के लिए पूरी रिपोर्ट और उसकी पद्धति देखना जरूरी है।
3. प्यू सर्वे में भारत, चीन और रूस को कितनी रेटिंग मिली?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, चीन का औसत स्कोर 100 में 37 और रूस का 27 था। भारत के लिए दी गई तालिका में लोगों की राय को सकारात्मक, बीच की और नकारात्मक श्रेणियों में दिखाया गया है। इन श्रेणियों को चीन और रूस के औसत स्कोर से सीधे तुलना करते समय सावधानी जरूरी है, क्योंकि मापने के तरीके और आंकड़ों का संदर्भ समान होना चाहिए।
4. अमेरिकी नागरिकों ने भारत के प्रति कितना सकारात्मक नजरिया जताया?
सर्वे की उपलब्ध तालिका में 9 प्रतिशत अमेरिकी उत्तरदाताओं ने भारत के लिए बहुत गर्मजोशी वाला नजरिया और 19 प्रतिशत ने कुछ गर्मजोशी वाला रुख दर्ज किया। 34 प्रतिशत बीच की श्रेणी में रहे, जबकि 15 प्रतिशत ने कुछ ठंडा और 20 प्रतिशत ने बहुत ठंडा नजरिया जताया। ये आंकड़े सर्वे में शामिल उत्तरदाताओं की राय दिखाते हैं, हर अमेरिकी नागरिक की सोच नहीं।
5. कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान को भारत से बेहतर रेटिंग क्यों मिली?
सर्वे में इन देशों के प्रति बहुत गर्मजोशी जताने वाले उत्तरदाताओं का अनुपात अधिक था। अमेरिका के साथ इनके पुराने सुरक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंध इस तुलना के संदर्भ को समझने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह साबित नहीं करते कि बेहतर रेटिंग का कारण कोई एक खास मुद्दा था। इसके लिए सर्वे में लोगों की राय के पीछे के कारणों का विस्तृत विश्लेषण जरूरी होगा।
6. क्या अमेरिकी जनमत भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकता है?
जनमत किसी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक बहस और सार्वजनिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है, लेकिन वह अपने आप विदेश नीति तय नहीं करता। भारत-अमेरिका संबंधों में रक्षा, व्यापार, तकनीक, शिक्षा और सुरक्षा जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए किसी सर्वे में कम रेटिंग मिलने का अर्थ यह नहीं कि दोनों सरकारों के रिश्ते तुरंत कमजोर होने वाले हैं।
7. भारत के प्रति अमेरिकी नजरिया बदल रहा है या नहीं, यह कैसे पता चलेगा?
इसके लिए अलग-अलग वर्षों के प्यू सर्वे और अन्य विश्वसनीय जनमत अध्ययनों की तुलना करनी होगी। प्रश्नों की भाषा, सर्वे में शामिल लोगों की संख्या, सर्वे की तारीख और आंकड़े जुटाने की पद्धति भी देखनी चाहिए। एक सर्वेक्षण किसी विशेष समय की तस्वीर देता है; लगातार कई सर्वेक्षण ही यह समझने में मदद कर सकते हैं कि भारत की छवि में दीर्घकालीन बदलाव हो रहा है या नहीं।





