अरावली पहाड़ियों का संरक्षण और माइनिंग का विवाद पिछले कई सालों से राजस्थान में राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है। इस विवाद के बीच राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने अब खुलकर अपने विचार और पक्ष रखा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मौजूदा सरकार पर उठाए जा रहे सवालों पर विस्तार से अपनी प्रतिक्रिया दी।

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों पर पहले दिए गए आदेश पर रोक लगाई थी, और अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 के लिए निर्धारित की गई है। इस बीच अशोक गहलोत ने कहा कि यह जनता की जीत है क्योंकि पूरे देश में अरावली संरक्षण को लेकर जन आंदोलन शुरू हो चुका था। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि कांग्रेस ने कभी भी अरावली को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया।
सोशल मीडिया और जन आंदोलन की भूमिका
अशोक गहलोत ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जनता के जन आंदोलन का अहम योगदान था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की ओर से सोशल मीडिया पर केवल यह आग्रह किया गया था कि लोग अपने पेज का डिस्प्ले पिक्चर बदलकर अरावली संरक्षण में समर्थन दिखाएं। इस छोटे से कदम ने पूरे राज्य और देश में जन जागरूकता फैलाने का काम किया। उन्होंने इसे पूरी तरह गैर-राजनीतिक और जनता की आवाज़ बताया।
गहलोत ने कहा कि छात्रों, युवाओं, आम नागरिकों और विशेषज्ञों की राय ने ऐसा माहौल बनाया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। उनका मानना है कि जन आंदोलन और जनता का दबाव ही वह शक्ति थी जिसने सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया।
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आरोपों पर प्रतिक्रिया
भूपेंद्र यादव द्वारा कांग्रेस और गहलोत पर लगाए गए आरोपों पर पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि ये आरोप आधारहीन हैं। उन्होंने कहा कि नए खनन केवल 0.19% क्षेत्र में ही किए जा सकते हैं, जो कि काफी बड़ा क्षेत्र है। गहलोत ने बताया कि इस क्षेत्र में 27,000 से ज्यादा कानूनी खदानें हो सकती हैं और अवैध खनन भी इसके पीछे हो सकता है।
गहलोत ने कहा कि अगर वर्तमान सरकार का इस फैसले में कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है, तो फिर वे ऐसे कदम क्यों उठा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री जनता को गुमराह कर रहे हैं। गहलोत ने यह भी बताया कि पांच दिन पहले जारी आदेश केवल सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के आदेश का पालन था, इसमें कोई नई पहल नहीं की गई थी।
परिवार को माइनिंग लीज़ देने पर कबूलनामा
अशोक गहलोत ने स्वीकार किया कि उनके कार्यकाल में केवल एक हेक्टेयर जमीन को परिवार के सदस्य के नाम माइनिंग लीज़ दी गई थी। इसे गलतफहमी के कारण दिया गया था और जैसे ही यह सामने आया, इसे बंद कर दिया गया। गहलोत ने यह भी कहा कि भैरों सिंह शेखावत के कार्यकाल में भी खदानें अलॉट हुई थीं, और हर सरकार के समय खनन लीज़ दी जाती रही।
उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार का नाम उठाकर गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने अपने बयान में बताया कि 2010 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी दिया गया था, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस पूरे मामले में BJP बेनकाब हुई है।
अरावली संरक्षण और सरिस्का टाइगर रिज़र्व
अशोक गहलोत ने मौजूदा सरकार के सरिस्का टाइगर रिज़र्व में खनन शुरू करने की योजना पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का प्रयास केवल जनहित और पर्यावरण हित में किया गया था। राजस्थान सरकार ने सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट की सीमाओं को बदलने का प्रस्ताव तैयार किया था, जिसे राज्य वन्यजीव बोर्ड ने मंज़ूरी दी और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने भी इसे मंज़ूर किया।
गहलोत ने जोर देकर कहा कि अरावली कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार और मंत्री को जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि अगर पर्सनल स्वार्थ नहीं है, तो फिर ऐसे फैसले क्यों लिए जा रहे हैं।
कांग्रेस के भीतर अभियान और पार्टी की एकजुटता
अरावली मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर प्रताप सिंह खाचरियावास और सचिन पायलट जैसे नेताओं के अलग-अलग अभियान को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। गहलोत ने इसे गैर-राजनीतिक और जन आंदोलन का हिस्सा बताया। उनका कहना था कि अगर 50 लोग अलग-अलग अभियान चलाते, तब भी जन आंदोलन की शक्ति कम नहीं होती। उन्होंने इसे पार्टी के लिए खतरा नहीं, बल्कि जनता के लिए दबाव बनाने का तरीका बताया।
गहलोत ने स्पष्ट किया कि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल अरावली की सुरक्षा और जनता की आवाज़ को मजबूती देना था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इसे हमेशा गैर-राजनीतिक रखा।
पर्यावरण मंत्रालय और विशेषज्ञ कमेटी पर सवाल
गहलोत ने मौजूदा पर्यावरण मंत्रालय की आलोचना करते हुए कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट के पास एक स्वतंत्र और विश्वसनीय सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी थी, जो केवल कोर्ट को रिपोर्ट करती थी। मौजूदा मंत्रालय ने इसे समाप्त कर दिया और अब जो कमेटी है, वह सीधे मंत्रालय को रिपोर्ट करती है। गहलोत ने पूछा कि अब जनता इसका भरोसा क्यों करे, जबकि यह केवल औपचारिकता बन गई है। उन्होंने मांग की कि कमेटी को फिर से बनाया जाए।
