मध्यप्रदेश के वनांचलों में बसी सांस्कृतिक धरोहर अक्सर शहरी चमक के बीच खो जाती है। परंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो न केवल अपने पूर्वजों की परंपराओं को थामे रखते हैं बल्कि मरती कला में नई सांस भरकर उसे फिर से राष्ट्र के सामने खड़ा कर देते हैं। बैतूल जिले के कारीगर बलदेव वाघमारे ऐसे ही एक व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने भरेवा नामक दुर्लभ आदिवासी शिल्प को न केवल बचाया बल्कि उसे राष्ट्रीय हस्तशिल्प अवार्ड की ऊंचाई तक पहुँचा दिया। राष्ट्रपति द्वारा मिला यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का गौरव नहीं, बल्कि उस पूरी परंपरा का पुनर्जन्म है जो कभी समाप्ति की कगार पर थी।

भरेवा कला की जड़ें, परंपरा और संघर्ष
भरेवा कला की उत्पत्ति गोंड समुदाय की उप-जनजाति के बीच हुई बताई जाती है। यह कला मात्र सौंदर्य या सजावट का विषय नहीं, बल्कि जीवन की सांस्कृतिक गरिमा, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक भावनाओं का प्रतीक है। पारंपरिक गोंड परिवारों में यह शिल्प अनुष्ठानों और विवाह संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भरेवा कलाकार देवताओं के प्रतीकात्मक रूप, संरक्षक चिन्ह, पवित्र गहने और अनुष्ठानों में प्रयुक्त विशेष कलाकृतियां बनाते हैं। इनमें खंजर, अंगूठियां, कलाईबंद और बाजूबंद जैसे पारंपरिक आभूषण शामिल हैं, जिन्हें धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अहमियत प्राप्त है।
परंतु समय के साथ यह कला बिखरती चली गई। युवा पीढ़ी ने आधुनिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और भरेवा कला के कारीगरों की संख्या तेजी से घटने लगी। कई परिवारों ने यह देखते हुए कि इस कला से जीवन चल पाना कठिन है, इसे छोड़ दिया। बीते दशकों में भरेवा शिल्प लगभग गुमनामी के अंधकार में समा चुका था।
बलदेव वाघमारे: एक कलाकार, एक संरक्षक, एक पुनरुद्धारक
बैतूल के छोटे से गांव टिगरिया में जन्मे बलदेव वाघमारे का बचपन मिट्टी, लकड़ी और धातु की सुगंध के बीच गुजरा। उनके परिवार में पीढ़ियों से भरेवा कला का अभ्यास किया जाता रहा है। बलदेव ने इस कला को सिर्फ सीखा नहीं, बल्कि इसे अपना जीवनधर्म मान लिया। उनके भीतर बचपन से ही यह भावना थी कि इतनी समृद्ध परंपरा का अंत नहीं होना चाहिए। जब उन्होंने देखा कि कारीगरों की संख्या घट रही है, बाजार कमज़ोर है और कला लुप्त होने की कगार पर खड़ी है, तब उन्होंने इसे बचाने का बीड़ा उठाया।
बलदेव ने भरेवा कला को आधुनिक दृष्टिकोण देते हुए नई आकृतियां और नए प्रयोग शुरू किए। पारंपरिक शैली को बनाए रखते हुए उन्होंने बैलगाड़ी, मोर के आकार के दीपक, पायल, घंटियां और सजावटी शोपीस जैसे नवीन रूप तैयार किए। इन कृतियों ने भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
भरेवा कला का अर्थ और उसकी अनूठी पहचान
स्थानीय बोली में भरेवा का अर्थ होता है भरने वाला। यह नाम इस कला के मूल स्वरूप से जुड़ा है। परंपरागत रूप से भरेवा कलाकार धातु को पिघलाकर उसे विशेष साँचे में भरते हैं और फिर उससे धार्मिक प्रतीक, देवमूर्तियां, पवित्र आभूषण तथा अनुष्ठानिक वस्तुएं बनाते हैं।
गोंड समुदाय में यह कला केवल शिल्प नहीं बल्कि सामाजिक विरासत है। भरेवा कारीगर भगवान शिव और देवी पार्वती की मूर्तियां बड़ी सुंदरता से बनाते हैं, जो गोंड परंपराओं में विशेष स्थान रखती हैं। यही वजह है कि भरेवा कला हमेशा धार्मिक आस्था और लोकजीवन से जुड़ी रही है।
टिगरिया गांव का परिवर्तन: शिल्प गांव की ओर कदम
जब बलदेव वाघमारे ने महसूस किया कि अकेले प्रयास से कला बचाना कठिन है, तब उन्होंने गांव के अन्य कारीगरों को फिर से जोड़ना शुरू किया। उन्होंने युवाओं को प्रशिक्षित किया, महिलाओं को शामिल किया, कला को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास किया। आज टिगरिया गांव धीरे-धीरे शिल्प गांव के रूप में विकसित हुआ है, जहां भरेवा परिवार इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
यह परिवर्तन धीमा जरूर था, पर दृढ़ था। बलदेव के नेतृत्व में भरेवा कला ने बाजार में फिर से अपनी जगह बनानी शुरू की।
जीआई टैग और राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार: गौरव का क्षण
भरेवा कला को कुछ ही समय पहले जीआई टैग प्राप्त हुआ, जिससे इसे आधिकारिक पहचान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण मिला। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार मिलना मानो इस कला के पुनर्जन्म की घोषणा थी।
नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बलदेव वाघमारे को सम्मानित किया, तब वह केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं था। यह उन सभी पूर्वजों की परंपरा का सम्मान था, जिन्होंने दशकों तक इस कला को अपने श्रम और धैर्य से जीवित रखा। यह उन कारीगरों की आशाओं का सम्मान था जो कभी इस कला के भविष्य को लेकर निराश हो चुके थे।
कला का भविष्य: नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
बलदेव वाघमारे की सफलता ने भरेवा कला को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक बना दिया है। युवा कलाकार अब इसे सिर्फ पारंपरिक कला नहीं बल्कि संभावनाओं से भरे पेशे के रूप में देख रहे हैं। सरकारी योजनाएं, प्रदर्शनियां, डिजिटल मार्केटिंग और जीआई टैग जैसे प्रयासों ने इस शिल्प के लिए नए द्वार खोल दिए हैं।
अब भरेवा कला केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं, बल्कि देश-विदेश तक पहुंच चुकी है। बलदेव अपने गांव के बच्चों को यह कला सिखा रहे हैं, ताकि आने वाले वर्षों में भरेवा कला फिर से स्वर्णिम युग देख सके।
एक कलाकार का संदेश, एक समुदाय का संकल्प
बलदेव कहते हैं कि कला तभी जीवित रहती है जब समुदाय उसे दिल से स्वीकार करता है। भरेवा कला को बचाना मात्र आर्थिक पहल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। परंपरा, इतिहास और पहचान को संजोने का यही सबसे सशक्त माध्यम है।
उनका मानना है कि अगर हर कलाकार अपनी जड़ों से जुड़ी कला को आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर काम करे, तो भारत की सांस्कृतिक विरासत कभी खत्म नहीं होगी।
