ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल तेज हो गई है। इस्लामाबाद ने खुले तौर पर अपनी इच्छा जताई है कि उसे इस प्रभावशाली वैश्विक समूह का पूर्ण सदस्य बनाया जाए। पाकिस्तान का दावा है कि अधिकांश सदस्य देश उसके पक्ष में हैं और केवल भारत ही उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल आर्थिक मंच की सदस्यता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति और रणनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गया है।

ब्रिक्स में पाकिस्तान की यह बेचैनी ऐसे समय सामने आई है जब वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिमी देशों के प्रभाव को चुनौती देने वाले मंचों में शामिल होने की होड़ बढ़ रही है। पाकिस्तान जानता है कि यदि उसे ब्रिक्स जैसे समूह में जगह मिलती है, तो उसकी आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति को नया सहारा मिल सकता है। यही वजह है कि उसने रूस के सामने अपने पक्ष को मजबूती से रखा है।
रूस में दिया बड़ा संदेश
रूस में पाकिस्तान के राजदूत फैसल नियाज तिरमिजी ने हालिया बातचीत में स्पष्ट संकेत दिया कि उनका देश ब्रिक्स के लिए एक स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने कहा कि संगठन के लगभग सभी सदस्य देश पाकिस्तान की सदस्यता के पक्ष में हैं और केवल भारत इसका विरोध कर रहा है। यह बयान केवल औपचारिक इच्छा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।
राजदूत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान पहले से शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य है, जहां भारत भी मौजूद है। उनके अनुसार यदि दोनों देश एक ही मंच पर वहां काम कर सकते हैं, तो ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता पर अलग दृष्टिकोण क्यों होना चाहिए। इस तर्क के जरिए पाकिस्तान ने भारत की आपत्ति को कमजोर दिखाने की कोशिश की है।
ब्रिक्स में पाकिस्तान क्यों चाहता है प्रवेश
ब्रिक्स में पाकिस्तान की रुचि केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। यह समूह दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में बड़ी हिस्सेदारी रखता है। ऐसे मंच का हिस्सा बनने का अर्थ है निवेश, व्यापार और कूटनीतिक पहुंच के नए अवसर।
पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक दबाव, विदेशी ऋण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर निर्भरता से जूझ रहा है। ऐसे में ब्रिक्स में पाकिस्तान के प्रवेश से उसे वैकल्पिक आर्थिक सहयोग, विकास बैंक की संभावनाएं और वैश्विक मंचों पर नई आवाज मिल सकती है। इसीलिए इस्लामाबाद इसे केवल सदस्यता नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के रूप में देख रहा है।
भारत सबसे बड़ी बाधा
ब्रिक्स में पाकिस्तान के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती भारत है। भारत न केवल इस समूह का संस्थापक सदस्य है, बल्कि 2026 में इसकी अध्यक्षता भी संभाल रहा है। ऐसे में नई सदस्यता पर उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से अधिक माना जाता है।
भारत की आपत्ति केवल राजनीतिक नहीं है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से सीमा तनाव, आतंकवाद के आरोप, कूटनीतिक अविश्वास और सुरक्षा संबंधी गंभीर मुद्दे रहे हैं। नई दिल्ली की दृष्टि में किसी बहुपक्षीय मंच पर पाकिस्तान की भूमिका को केवल आर्थिक नजर से नहीं देखा जा सकता। यही कारण है कि ब्रिक्स में पाकिस्तान का मामला भारत के लिए संवेदनशील बना हुआ है।
समर्थन का दावा कितना मजबूत
पाकिस्तान ने दावा किया है कि रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील उसके पक्ष में हैं। चीन का समर्थन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच गहरे रणनीतिक संबंध हैं। रूस भी हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ा है।
हालांकि किसी भी नए सदस्य की प्रक्रिया केवल समर्थन के बयान से पूरी नहीं होती। ब्रिक्स का विस्तार एक संवेदनशील राजनीतिक निर्णय होता है, जहां सभी देशों के हितों का संतुलन जरूरी है। इसलिए यह कहना कि केवल भारत विरोध कर रहा है, वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। कई देशों की प्राथमिकताएं सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आतीं।
ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में हुई थी, जब ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर एक वैकल्पिक आर्थिक समूह की नींव रखी। बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हुआ। समय के साथ यह मंच केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक बन गया।
अब इसमें नए सदस्य देशों का विस्तार भी हो चुका है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देशों की मौजूदगी ने इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ा दी है। ऐसे में ब्रिक्स में पाकिस्तान की मांग केवल एक और सदस्यता नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की नई शक्ति राजनीति का संकेत है।
भारत पाकिस्तान संवाद की पेशकश
ब्रिक्स में पाकिस्तान की चर्चा के साथ एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई—भारत के साथ बातचीत की इच्छा। पाकिस्तानी राजदूत ने कहा कि उनका देश हमेशा संवाद के लिए तैयार रहा है और दोनों देश एक-दूसरे को अनदेखा नहीं कर सकते।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध आज जितने खराब हैं, वैसी स्थिति उन्होंने पहले नहीं देखी। यह बयान केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एक नरम छवि पेश करने की कोशिश भी है। पाकिस्तान यह संदेश देना चाहता है कि वह टकराव नहीं, संवाद चाहता है।
क्या भारत बदलेगा रुख
यह सबसे बड़ा सवाल है। क्या भारत ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता पर अपना रुख बदलेगा? फिलहाल इसके संकेत बहुत कम दिखाई देते हैं। भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और पाकिस्तान के साथ विश्वास की कमी अभी भी गहरी है।
नई दिल्ली के लिए यह केवल आर्थिक मंच का मामला नहीं, बल्कि रणनीतिक जोखिम का विषय है। जब तक सीमा पार आतंकवाद, द्विपक्षीय तनाव और विश्वास बहाली जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक ब्रिक्स में पाकिस्तान की राह आसान नहीं दिखती।
रूस और चीन की भूमिका
रूस और चीन इस पूरे मामले में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। रूस भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है। वह ब्रिक्स को व्यापक बनाकर इसकी वैश्विक उपयोगिता बढ़ाना चाहता है, लेकिन भारत की चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकता।
चीन की स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट है। वह पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक सहयोगी है और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में उसे मजबूत देखना चाहता है। यदि चीन सक्रिय रूप से पाकिस्तान की सदस्यता के लिए दबाव बढ़ाता है, तो ब्रिक्स के भीतर नई कूटनीतिक बहस और तेज हो सकती है।
दक्षिण एशिया पर असर
ब्रिक्स में पाकिस्तान की संभावित एंट्री दक्षिण एशिया की राजनीति को नया मोड़ दे सकती है। यदि पाकिस्तान सदस्य बनता है, तो भारत और पाकिस्तान एक और बड़े वैश्विक मंच पर आमने-सामने होंगे। इससे सहयोग के अवसर भी बढ़ सकते हैं और टकराव की आशंका भी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बहुपक्षीय मंच कभी-कभी संवाद के दरवाजे खोलते हैं, लेकिन यदि मूल विवाद बने रहें तो वही मंच तनाव का नया केंद्र भी बन सकते हैं। इसलिए ब्रिक्स में पाकिस्तान का सवाल केवल सदस्यता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का भी प्रश्न है।
आगे क्या हो सकता है
आने वाले महीनों में भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स का एजेंडा और स्पष्ट होगा। पाकिस्तान अपनी कोशिशें जारी रखेगा, खासकर रूस और चीन के जरिए समर्थन मजबूत करने का प्रयास करेगा। दूसरी ओर भारत अपनी सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को प्राथमिकता देगा।
ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता फिलहाल आसान नहीं दिखती, लेकिन यह मुद्दा जल्द खत्म भी नहीं होगा। वैश्विक राजनीति में मंच बदलते रहते हैं, लेकिन हित स्थायी रहते हैं। पाकिस्तान इसे अवसर के रूप में देख रहा है और भारत इसे सावधानी से परख रहा है।
अंततः ब्रिक्स में पाकिस्तान का प्रश्न केवल सदस्यता की औपचारिकता नहीं, बल्कि भरोसे, शक्ति संतुलन और भविष्य की कूटनीति का परीक्षण है। आने वाला समय बताएगा कि यह बेचैनी सदस्यता में बदलती है या केवल एक और कूटनीतिक बयान बनकर रह जाती है।
