छत्तीसगढ़ के शांत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध ज़िले कांकेर के ग्राम मुड़पार (दखनी) में हाल ही में एक भावनात्मक घटना घटी जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान खींच लिया। यहाँ नवल राम नेताम और उनके पुत्र ने लगभग 10 वर्ष बाद अपने मूल धर्म में वापसी की।

धर्म परिवर्तन की उनकी यात्रा, सामाजिक अलगाव, और अंततः अपने मूल धर्म की गोद में लौट आने की कहानी—यह सिर्फ़ दो व्यक्तियों की नहीं, बल्कि पूरे समाज के संवेदनात्मक संघर्ष का प्रतीक बन गई है।
10 साल पहले लिया था धर्म परिवर्तन का निर्णय
करीब एक दशक पहले नवल राम नेताम ने अपने पुत्र के साथ मिलकर ईसाई धर्म अपना लिया था। तब उन्हें लगा था कि शायद यह परिवर्तन उनके जीवन में नई दिशा और सुविधाएँ लाएगा। उस समय गांव में कुछ बाहरी प्रचारकों के माध्यम से उन्हें ईसाई मत के प्रति आकर्षण हुआ।
नवल राम का कहना था,
“हमने सोचा था कि नया धर्म हमें बेहतर जीवन देगा, लेकिन समाज से दूरी और अपनापन खो जाने का जो दर्द मिला, वह असहनीय था।”
धर्म परिवर्तन के बाद बढ़ा सामाजिक बहिष्कार
गांव के लोगों ने नवल राम और उनके परिवार से धीरे-धीरे दूरी बना ली। पारंपरिक रीति-रिवाजों में उनकी भागीदारी बंद कर दी गई। शादी, जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उन्हें आमंत्रित नहीं किया जाने लगा।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, समाज ने स्पष्ट कर दिया था कि मतांतरित व्यक्ति अब “हमारे सामाजिक ढांचे का हिस्सा नहीं” रहेंगे। यहां तक कि यह भी कहा गया कि यदि परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो उसे गांव की भूमि में दफनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
यह स्थिति परिवार के लिए अत्यंत पीड़ादायक थी। सामाजिक तिरस्कार के कारण नवल राम के पुत्र को भी रोज़मर्रा की गतिविधियों में बहिष्कार झेलना पड़ा।
धर्म वापसी का निर्णय: आत्मसम्मान की पुनर्प्राप्ति
लगातार बढ़ते अलगाव, सामाजिक उपेक्षा और आंतरिक पीड़ा के बाद पिता-पुत्र ने अंततः मूल धर्म में लौटने का निर्णय लिया। उन्होंने ग्राम पंचायत में एक आवेदन देकर समाज में पुनः शामिल करने की मांग की।
ग्राम पंचायत ने सामूहिक सहमति से उनकी प्रार्थना स्वीकार की और शीतला मंदिर परिसर में वैदिक विधि-विधान से पुनः स्वागत किया गया।
समाज के बुजुर्गों ने पूजा-अर्चना के बाद दोनों को गुलाब के फूल भेंट किए, और यह संदेश दिया कि “जो लौटकर आए हैं, वे हमारे अपने हैं।”
बाइबिल का प्रतीकात्मक विसर्जन: नई शुरुआत का प्रतीक
पूजा के बाद पिता-पुत्र ने बाइबिल को प्रतीकात्मक रूप से नदी में विसर्जित किया। इस घटना को उन्होंने अपनी “नवीन शुरुआत” का प्रतीक बताया।
“हमने किसी धर्म का अपमान नहीं किया, बल्कि उस धर्म में लौट आए जहाँ हमारे पूर्वजों की आस्था थी।” — नवल राम नेताम
इस विसर्जन में दर्जनों ग्रामीण उपस्थित थे। ग्रामीणों ने इसे “आत्मिक शुद्धि” और “सामाजिक एकता की पुनर्स्थापना” का क्षण बताया।
सामाजिक जागरूकता और आर्थिक नाकेबंदी का असर
गांव के सरपंच गंगाराम शोरी ने बताया कि हाल के वर्षों में धर्म परिवर्तन को लेकर समाज में आर्थिक नाकेबंदी और जागरूकता अभियान चलाए गए हैं।
“हम किसी धर्म के विरोध में नहीं हैं,” उन्होंने कहा, “लेकिन अपने समाज के सदस्यों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अपनी जड़ों से जुड़ा रहना ही स्थिरता देता है।”
इस अभियान का असर अब दिखने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में कई परिवारों ने अपने मूल धर्म में वापसी की है।
सामाजिक एकता की मिसाल
इस अवसर पर ग्राम पंचायत अध्यक्ष, उपसरपंच, समिति अध्यक्ष और सैकड़ों ग्रामीण मौजूद थे। सबने इस घटना को “सामाजिक पुनर्मिलन” का प्रतीक बताया।
ग्राम पटेल अमर सिंह कुमेटी ने कहा —
“हमारा समाज तब ही मजबूत होगा जब हम एक साथ रहेंगे। किसी बाहरी प्रभाव में आकर अपनी पहचान खोना गलत है।”
धर्म परिवर्तन और समाज: एक गहराता प्रश्न
कांकेर जैसे जनजातीय बहुल इलाकों में धर्म परिवर्तन का मुद्दा दशकों से संवेदनशील रहा है। कई बार सामाजिक और आर्थिक कारणों से लोग नए धर्म अपनाते हैं, परंतु बाद में जब उन्हें सामाजिक अलगाव झेलना पड़ता है तो वापसी की राह चुनते हैं।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि “धर्म परिवर्तन सिर्फ आस्था का नहीं, सामाजिक पहचान का भी प्रश्न होता है।” जब व्यक्ति अपने परिवेश, भाषा, त्योहार और परंपरा से कट जाता है, तो मानसिक असंतुलन और एकाकीपन का अनुभव करता है।
सरकार की दृष्टि से मामला
छत्तीसगढ़ सरकार धर्म परिवर्तन से संबंधित मामलों पर पहले से ही संवेदनशील रुख रखती है। धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत किसी भी प्रकार का जबरन धर्म परिवर्तन अपराध माना जाता है।
स्थानीय प्रशासन ने भी इस मामले को “शांतिपूर्ण धर्म वापसी” बताया है और कहा है कि इसमें कोई विवाद या विरोध नहीं हुआ।
धर्म वापसी: सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
धर्म वापसी केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति के सामाजिक पुनर्जन्म की तरह होती है। जब समाज किसी व्यक्ति को फिर से स्वीकार करता है, तो उसकी आत्मसम्मान की भावना लौट आती है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, “धर्म परिवर्तन के बाद सामाजिक बहिष्कार व्यक्ति के आत्मविश्वास को तोड़ देता है। लेकिन जब वही समाज उसे वापस अपनाता है, तो वह आत्मबल फिर से जागृत होता है।”
निष्कर्ष
कांकेर की यह घटना सिर्फ दो लोगों की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक स्वीकृति की कहानी है। यह बताती है कि किसी भी धर्म या मत का सम्मान करते हुए अपनी जड़ों से जुड़ा रहना क्यों ज़रूरी है। पिता-पुत्र का यह साहसिक निर्णय समाज को एक संदेश देता है —
“धर्म से बड़ी चीज़ है अपनी आत्मा की शांति और समाज का अपनापन।”
