चीन की वैश्विक ताकत आज सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह दुनिया की राजनीति, व्यापार, कूटनीति और युद्ध रणनीतियों के केंद्र में पहुंच चुकी है। बीजिंग में कुछ दिनों के भीतर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने इस बदलती तस्वीर को और साफ कर दिया। दुनिया अब उस दौर में प्रवेश कर रही है जहां किसी एक महाशक्ति का दबदबा नहीं, बल्कि आपसी निर्भरता और रणनीतिक संतुलन की राजनीति तय करेगी कि आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यवस्था कैसी होगी।

बीजिंग के भव्य सरकारी भवनों के बाहर दिखाई देने वाली लाल कालीन कूटनीति सिर्फ औपचारिक स्वागत नहीं थी। यह उस संदेश का हिस्सा थी जिसे चीन दुनिया तक पहुंचाना चाहता है। संदेश साफ था कि वैश्विक तनाव, युद्ध और आर्थिक संकट के इस दौर में हर बड़ी शक्ति को चीन की जरूरत है। चाहे अमेरिका हो या रूस, दोनों अब ऐसी स्थिति में हैं जहां वे चीन से दूरी बनाकर अपनी रणनीति पूरी नहीं कर सकते।
शी जिनपिंग का बदलता प्रभाव
पिछले दशक में शी जिनपिंग ने चीन को केवल आर्थिक महाशक्ति बनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने चीन को ऐसी वैश्विक शक्ति में बदलने की कोशिश की जो सैन्य दबाव के बिना भी दुनिया की दिशा प्रभावित कर सके। यही कारण है कि आज चीन सीधे युद्ध लड़ने की बजाय आर्थिक निर्भरता, व्यापारिक संबंधों और संसाधनों के जरिए वैश्विक संतुलन को प्रभावित कर रहा है।
चीन की वैश्विक ताकत का सबसे बड़ा आधार उसकी विशाल अर्थव्यवस्था और उत्पादन क्षमता है। दुनिया के अधिकांश देशों की आपूर्ति श्रृंखला किसी न किसी रूप में चीन से जुड़ी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर दुर्लभ खनिजों और औद्योगिक मशीनों तक, चीन ने ऐसी पकड़ बना ली है जिसे तोड़ना किसी भी देश के लिए आसान नहीं है। अमेरिका लगातार चीन पर निर्भरता कम करने की बात करता रहा है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर वह अभी भी चीनी उत्पादन और बाजार से पूरी तरह अलग नहीं हो पाया।
पुतिन के लिए क्यों जरूरी चीन
यूक्रेन युद्ध ने रूस की स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा निर्यात को बचाए रखना था। इसी समय चीन रूस के लिए सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरा। रूसी तेल और गैस की खरीद बढ़ाकर चीन ने रूस को आर्थिक राहत दी। इसके बदले रूस ने चीन को सस्ते ऊर्जा संसाधन और सामरिक सहयोग उपलब्ध कराया।
व्लादिमीर पुतिन की बार-बार चीन यात्रा यह दर्शाती है कि रूस अब पहले की तुलना में कहीं अधिक चीन पर निर्भर हो चुका है। यह संबंध बराबरी का नहीं बल्कि आवश्यकता का बनता जा रहा है। चीन जानता है कि पश्चिम से कटे रूस के पास विकल्प सीमित हैं। इसलिए बीजिंग अब हर समझौते में अपनी शर्तों को प्राथमिकता दे रहा है।
हालांकि रूस और चीन के बीच मित्रता गहरी दिखाई देती है, लेकिन इसके भीतर रणनीतिक सावधानी भी छिपी हुई है। चीन नहीं चाहता कि वह पूरी तरह रूस के साथ खड़ा दिखाई दे और यूरोप उससे दूरी बना ले। यही वजह है कि यूक्रेन युद्ध पर चीन खुलकर रूस का समर्थन नहीं करता, बल्कि खुद को तटस्थ बताने की कोशिश करता है।
ट्रंप की मजबूरी बना बीजिंग
डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में चीन के खिलाफ आक्रामक व्यापार नीति के लिए जाने गए थे। उन्होंने चीनी वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए और चीन को आर्थिक चुनौती देने की कोशिश की। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, मध्य पूर्व संकट और अमेरिकी उद्योगों की जरूरतों ने ट्रंप को भी यह समझा दिया है कि चीन को पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है।
चीन की वैश्विक ताकत का असर इस बात से समझा जा सकता है कि अमेरिकी राजनीति में चीन विरोधी बयानबाजी जारी रहने के बावजूद वाशिंगटन को बीजिंग के साथ संवाद बनाए रखना पड़ रहा है। अमेरिका को दुर्लभ खनिजों, विनिर्माण आपूर्ति और वैश्विक बाजार स्थिरता के लिए चीन की आवश्यकता है। यही कारण है कि कूटनीतिक स्तर पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत के रास्ते खुले रखे जाते हैं।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने भी अमेरिका की चिंता बढ़ाई है। ऊर्जा संकट और वैश्विक व्यापार मार्गों पर असर पड़ने की स्थिति में चीन की भूमिका और अहम हो जाती है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है और खाड़ी देशों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं। अमेरिका जानता है कि किसी भी बड़े वैश्विक संकट में चीन को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है।
यूक्रेन युद्ध की नई दिशा
यूक्रेन युद्ध ने सिर्फ रूस और यूरोप को नहीं बदला बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है। युद्ध के शुरुआती दौर में पश्चिमी देशों को उम्मीद थी कि आर्थिक प्रतिबंध रूस को कमजोर कर देंगे, लेकिन चीन के सहयोग ने इस अनुमान को पूरी तरह बदल दिया। रूस ने अपने व्यापारिक रास्ते पूर्व की ओर मोड़ दिए और चीन ने इस बदलाव का फायदा उठाया।
चीन की वैश्विक ताकत यहां एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में दिखाई देती है। बीजिंग ने सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना रूस को आर्थिक जीवनरेखा दी। इससे पश्चिमी देशों में यह चिंता बढ़ी कि चीन धीरे-धीरे ऐसी वैश्विक व्यवस्था तैयार कर रहा है जिसमें अमेरिका का एकाधिकार कमजोर पड़ सकता है।
यूरोप भी इस स्थिति को लेकर असमंजस में है। एक तरफ यूरोपीय देश चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं, दूसरी तरफ वे अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का जोखिम भी नहीं उठा सकते। यही द्वंद्व चीन की रणनीतिक सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
मध्य पूर्व में चीन की भूमिका
बीते कुछ वर्षों में चीन ने मध्य पूर्व में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। पहले जहां यह क्षेत्र पूरी तरह अमेरिकी प्रभाव में माना जाता था, वहीं अब चीन धीरे-धीरे वहां आर्थिक और कूटनीतिक उपस्थिति बढ़ा रहा है। ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंध सुधारने में चीन की भूमिका ने दुनिया को चौंका दिया था।
चीन की वैश्विक ताकत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह खुद को युद्ध भड़काने वाली शक्ति की बजाय स्थिरता और व्यापार की ताकत के रूप में पेश करता है। यही कारण है कि कई विकासशील देश चीन के साथ संबंधों को अवसर के रूप में देखते हैं।
हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि चीन केवल अपने आर्थिक हितों के अनुसार कूटनीति करता है। जहां उसे फायदा दिखता है वहां वह सक्रिय होता है और जहां जोखिम अधिक होता है वहां वह तटस्थता का सहारा लेता है। यूक्रेन युद्ध पर उसका रवैया इसी रणनीति का उदाहरण माना जाता है।
यूरोप की बढ़ती चिंता
यूरोपीय देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे चीन को लेकर स्पष्ट नीति नहीं बना पा रहे हैं। चीन उनके लिए बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है और रणनीतिक चिंता भी। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश चीन के बाजार से दूरी नहीं बना सकते, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि चीन की बढ़ती ताकत भविष्य में यूरोपीय प्रभाव को चुनौती दे सकती है।
बीजिंग में लगातार हो रही उच्च स्तरीय मुलाकातें यह दिखाती हैं कि चीन ने खुद को वैश्विक कूटनीति का केंद्र बना लिया है। यह स्थिति पांच साल पहले की तुलना में बिल्कुल अलग है जब कोरोना महामारी और आक्रामक चीनी कूटनीति के कारण कई पश्चिमी देश उससे दूरी बना रहे थे।
अब चीन ने अपनी भाषा और रणनीति दोनों में बदलाव किया है। वह खुद को साझेदारी और स्थिरता के प्रतीक के रूप में पेश कर रहा है। यही बदलाव उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
क्या सचमुच बदल रही विश्व व्यवस्था
दुनिया लंबे समय तक अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था में चलती रही। लेकिन अब शक्ति संतुलन बहुध्रुवीय होता दिखाई दे रहा है। चीन की वैश्विक ताकत इसी परिवर्तन का केंद्र बन चुकी है। अमेरिका अभी भी सैन्य और तकनीकी रूप से बेहद शक्तिशाली है, लेकिन चीन ने आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर उसे चुनौती देना शुरू कर दिया है।
रूस, चीन और कई अन्य देश अब ऐसी वैश्विक व्यवस्था चाहते हैं जिसमें अमेरिका अकेला निर्णायक न रहे। यही कारण है कि दुनिया के कई हिस्सों में चीन को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि चीन के सामने भी कई चुनौतियां हैं। उसकी अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है, जनसंख्या संकट बढ़ रहा है और कई देश उसके राजनीतिक मॉडल पर भरोसा नहीं करते।
इसके बावजूद यह साफ दिखाई देता है कि आने वाले वर्षों में चीन को नजरअंदाज करना किसी भी बड़ी शक्ति के लिए संभव नहीं होगा। ट्रंप और पुतिन दोनों की बीजिंग यात्रा इस नई वास्तविकता का सबसे बड़ा संकेत है।
चीन की वैश्विक ताकत का भविष्य
चीन की वैश्विक ताकत आने वाले दशक में और बढ़ सकती है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़ेंगे। यदि चीन रूस के बहुत करीब जाता है तो यूरोप उससे दूरी बना सकता है। यदि वह अमेरिका से टकराव बढ़ाता है तो वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है। इसलिए बीजिंग अभी संतुलन की राजनीति खेल रहा है।
शी जिनपिंग की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे चीन को शक्तिशाली भी बनाए रखें और दुनिया में भय का कारण भी न बनने दें। अब तक चीन ने आर्थिक ताकत और कूटनीतिक धैर्य के जरिए यह संतुलन बनाए रखा है। लेकिन वैश्विक तनाव बढ़ने के साथ यह संतुलन बनाए रखना कठिन होता जाएगा।
फिलहाल इतना तय है कि दुनिया उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां अमेरिका, रूस और यूरोप सभी को चीन के साथ अपने संबंधों की नई परिभाषा तय करनी होगी। चीन की वैश्विक ताकत अब केवल एक देश की शक्ति नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन चुकी है।
