दंडकारण्य का नाम आते ही आंखों के सामने घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और लंबे समय से जारी माओवादी संघर्ष की तस्वीर उभर आती है। इसी रहस्यमयी और हिंसक पृष्ठभूमि में एक ऐसा नाम सामने आया, जिसने सुरक्षा एजेंसियों से लेकर स्थानीय ग्रामीणों तक को हैरान कर दिया। यह नाम था ‘डॉ. रफीक’, एक ऐसा डॉक्टर जो बंदूकधारियों के बीच रहकर जंगल में ऑपरेशन करता था, गोलियों से घायल लोगों की जान बचाता था और जिसे कभी औपचारिक अस्पताल की जरूरत नहीं पड़ी।

‘डॉ. रफीक’ नहीं, मंदीप था असली नाम
जंगलों में वर्षों तक ‘डॉ. रफीक’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस व्यक्ति का असली नाम मंदीप बताया जाता है। वह किसी दूरदराज़ आदिवासी इलाके में जन्मा अनपढ़ युवक नहीं, बल्कि पंजाब से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाला प्रशिक्षित डॉक्टर था। मेडिकल कॉलेज की प्रयोगशालाओं और अस्पतालों की सफेद दीवारों से निकलकर वह दंडकारण्य के गहरे जंगलों में कैसे पहुंचा, यह सवाल आज भी कई लोगों को चौंकाता है।
पढ़ा-लिखा डॉक्टर और माओवादी संगठन
बताया जाता है कि मंदीप उच्च शिक्षा प्राप्त उन गिने-चुने लोगों में से था, जिसने माओवादी संगठन की राह चुनी। उसकी चिकित्सकीय योग्यता संगठन के लिए एक अमूल्य संसाधन बन गई। जहां एक ओर जंगलों में दवाइयों और डॉक्टरों की भारी कमी थी, वहीं मंदीप ने अपने ज्ञान से इस खालीपन को भर दिया। उसने जंगल को ही अपना अस्पताल बना लिया।
जंगल में चलता था ‘फील्ड हॉस्पिटल’
दंडकारण्य के भीतर कोई पक्की इमारत नहीं थी, कोई आधुनिक ऑपरेशन थिएटर नहीं था, फिर भी ‘डॉ. रफीक’ वहां इलाज करता था। पेड़ों की छांव में, तिरपाल के नीचे और कभी-कभी गुफाओं में वह घायल माओवादियों का इलाज करता। गोली लगने के जख्म, बारूदी सुरंग से घायल अंग, तेज बुखार और मलेरिया जैसी बीमारियां उसके लिए रोज़मर्रा की चुनौती थीं।
सीमित संसाधन, लेकिन गहरा अनुभव
उसके पास न तो पर्याप्त दवाइयां थीं और न ही आधुनिक मशीनें। फिर भी वह सीमित संसाधनों में सर्जरी करने से पीछे नहीं हटता था। स्थानीय जड़ी-बूटियों और उपलब्ध दवाओं के सहारे उसने कई गंभीर मामलों में जान बचाई। जंगल में उसके काम करने का तरीका सामान्य चिकित्सा पद्धति से बिल्कुल अलग था, लेकिन परिणाम चौंकाने वाले थे।
केवल माओवादियों तक सीमित नहीं था इलाज
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार ‘डॉ. रफीक’ केवल माओवादी लड़ाकों का ही इलाज नहीं करता था। जरूरत पड़ने पर वह आसपास के आदिवासी गांवों के बीमार लोगों की भी मदद करता। प्रसव से जुड़ी जटिलताएं हों या बच्चों की गंभीर बीमारी, उसने कई बार बिना किसी भेदभाव के उपचार किया।
स्थानीय लोगों को दी प्राथमिक चिकित्सा की ट्रेनिंग
उसने जंगल में रहते हुए कुछ युवाओं को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण भी दिया। इसका उद्देश्य यह था कि संघर्ष की स्थिति में तुरंत इलाज मिल सके। इन प्रशिक्षित लोगों ने बाद में कई घायल व्यक्तियों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
सुरक्षा एजेंसियों की नजर में आया नाम
समय के साथ-साथ सुरक्षा एजेंसियों को भी इस ‘सीक्रेट डॉक्टर’ की जानकारी मिलने लगी। खुफिया रिपोर्टों में उसका जिक्र होने लगा। उसके चिकित्सकीय कौशल और संगठन में भूमिका को लेकर एजेंसियां सतर्क हो गईं। लेकिन घने जंगल और स्थानीय नेटवर्क के कारण वह लंबे समय तक पकड़ से बाहर रहा।
पूर्व माओवादियों के खुलासे
आत्मसमर्पण कर चुके कुछ पूर्व माओवादियों ने बाद में ‘डॉ. रफीक’ के बारे में कई अहम जानकारियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि कैसे मंदीप रात-रात भर जागकर गंभीर रूप से घायल लोगों की सर्जरी करता था। कई बार गोलियों की आवाज़ों के बीच इलाज चलता था।
2016 के बाद अचानक गायब
बताया जाता है कि वर्ष 2016 में वह दंडकारण्य क्षेत्र छोड़कर झारखंड की ओर चला गया। इसके बाद से उसका कोई पुख्ता सुराग नहीं मिला। माना जाता है कि वह अब भी भूमिगत है और पहचान बदलकर कहीं और सक्रिय हो सकता है।
आज भी जारी है तलाश
सुरक्षा एजेंसियां आज भी उसके बारे में सूचनाएं जुटा रही हैं। उसकी शिक्षा, मेडिकल पृष्ठभूमि और नेटवर्क को देखते हुए माना जाता है कि वह अब भी किसी न किसी रूप में सक्रिय हो सकता है। उसका मामला इस बात का उदाहरण है कि किस तरह एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति संघर्ष के रास्ते पर चला गया।
नैतिक द्वंद्व और सामाजिक सवाल
‘डॉ. रफीक’ की कहानी कई नैतिक सवाल खड़े करती है। एक ओर वह हिंसक संगठन का हिस्सा था, दूसरी ओर उसने कई जिंदगियां बचाईं। यह द्वंद्व आज भी बहस का विषय है कि क्या उसका चिकित्सकीय कार्य उसके रास्ते को सही ठहराता है या नहीं।
निष्कर्ष: जंगल की खामोशी में दबी एक कहानी
दंडकारण्य के जंगलों में काम करने वाला यह गुमनाम डॉक्टर आज भी रहस्य बना हुआ है। उसकी कहानी यह दिखाती है कि शिक्षा, विचारधारा और परिस्थितियां मिलकर इंसान को किस हद तक अलग रास्ते पर ले जा सकती हैं। ‘डॉ. रफीक’ का नाम भले ही आज भी फाइलों में दर्ज हो, लेकिन उसकी असली पहचान अब भी अंधेरे में छिपी हुई है।
