रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही मध्यप्रदेश के कई जिलों में खाद की मांग बढ़ गई है। लेकिन इसी मांग के साथ कुछ व्यापारी किसानों से मनमाने दाम वसूलने में जुट गए हैं। खाद की कालाबाजारी और ऊंचे दामों पर बिक्री की लगातार शिकायतों के बाद राज्य सरकार ने अब इस पर सख्त रुख अपना लिया है। प्रदेश के कृषि मंत्री कमल जैन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि “खाद वितरण में किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि कोई व्यापारी या अधिकारी किसानों से निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली करता पाया गया, तो उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होगी।”

किसानों की बढ़ती परेशानी
बैतूल, होशंगाबाद, नर्मदापुरम और हरदा जैसे जिलों में किसान रबी फसलों — विशेषकर गेहूं, चना और सरसों — के लिए खाद की तलाश में भटक रहे हैं। कई जगह किसान खाद के लिए लाइनें लगा रहे हैं, तो कहीं उर्वरक की अनुपलब्धता ने उनके खेतों की बुवाई रोक दी है।किसानों का कहना है कि खाद की कीमतें खुले बाजार में तय दर से 100-150 रुपये प्रति बोरी अधिक वसूली जा रही हैं।
ग्राम खेड़ी के किसान रामकिशन पवार बताते हैं —
“हमारे इलाके में खाद लेने गए तो कहा गया कि सरकारी रेट पर स्टॉक खत्म है, लेकिन अगर 150 रुपये ज्यादा दो तो मिल जाएगी। हम मजबूर हैं क्योंकि बिना खाद फसल नहीं होती।”
मंत्री जैन की सख्त चेतावनी
खाद वितरण प्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच कृषि मंत्री कमल जैन ने बैतूल जिले का निरीक्षण किया। उन्होंने जिला कृषि अधिकारी और सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों की बैठक ली। उन्होंने कहा —
“खाद का वितरण पारदर्शी और निष्पक्ष होना चाहिए। किसानों से लूट करने वालों को किसी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। जो अधिकारी इस पर आंख मूंदेंगे, उन पर भी कार्रवाई तय है।”
मंत्री ने निर्देश दिए कि सभी जिला अधिकारियों को तत्काल फर्टिलाइजर प्राइस चेकिंग अभियान चलाना चाहिए। इसके तहत समितियों, प्राइवेट डीलरों और सहकारी संस्थाओं के स्टॉक व बिल बुक की जांच की जाएगी।
प्रशासनिक कार्रवाई शुरू
बैतूल में पहले ही दो निजी खाद विक्रेताओं के खिलाफ कालाबाजारी और ओवरप्राइसिंग के मामले दर्ज किए गए हैं। जिला प्रशासन ने इन दुकानों के लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं और उनके स्टॉक को जब्त कर लिया गया है। उसी के साथ एक विशेष दल गठित किया गया है जो रोजाना रिपोर्ट तैयार कर मंत्रालय को भेजेगा।
जिला कलेक्टर नीलम शर्मा ने बताया —
“हमने किसानों से शिकायतें ली हैं और जांच में पाया कि कई डीलर किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे थे। सभी को नोटिस जारी कर दिए गए हैं और कुछ मामलों में एफआईआर भी की गई है।”
खाद के दाम और सरकारी नीति
भारत सरकार द्वारा निर्धारित कीमत के अनुसार, यूरिया की अधिकतम खुदरा कीमत ₹266.50 प्रति बोरी (45 किलो) तय है, जबकि डीएपी की कीमत ₹1350 प्रति बोरी (50 किलो) निर्धारित है। लेकिन कई जिलों में यह खाद ₹300 से ₹400 तक महंगी बिक रही थी। सरकार की सब्सिडी योजना का उद्देश्य किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराना है, लेकिन बीच की परतें — डीलर, परिवहनकर्ता और निजी एजेंसियां — इस लाभ को रोक रही हैं।
कालाबाजारी का तंत्र
खाद की कालाबाजारी कोई नई समस्या नहीं है। हर सीजन में यह मुद्दा उठता है। लेकिन इस बार स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई क्योंकि कई जिलों में ऑनलाइन स्टॉक मैनेजमेंट सिस्टम लागू होने के बावजूद भी डीलरों ने स्टॉक को छिपाया। कृषि विभाग की प्राथमिक रिपोर्ट बताती है कि कुछ डीलरों ने जानबूझकर सरकारी स्टॉक को “प्राइवेट सप्लाई” दिखाकर ज्यादा कीमत पर बेचा। किसानों को कहा गया कि “सरकारी सप्लाई अभी नहीं आई”, जबकि वही खाद बाद में बाजार में ऊंचे दाम पर बेची गई।
किसानों की आवाज़
किसान संघों और किसान नेताओं ने सरकार से इस मुद्दे पर तत्काल सख्ती की मांग की है।
भारतीय किसान संघ के प्रवक्ता महेश पटेल ने कहा —
“सरकार किसानों से कहती है कि आत्मनिर्भर बनो, लेकिन जब बुवाई का समय आता है, तो सबसे जरूरी चीज — खाद — ही उपलब्ध नहीं होती। अगर सरकार सख्ती नहीं करेगी तो किसान आंदोलित होंगे।”
सरकार की नई पहल
मंत्री जैन ने कहा कि राज्य में खाद वितरण की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए “फर्टिलाइजर ट्रैकिंग सिस्टम” लॉन्च किया जाएगा।
यह सिस्टम हर बोरी खाद का QR कोड से ट्रैक करेगा, जिससे यह पता चलेगा कि वह बोरी किस किसान को और किस दाम पर दी गई।
इसके अलावा, सरकार “किसान हेल्पलाइन 155223” को सक्रिय कर रही है ताकि किसान सीधे शिकायत दर्ज करा सकें। शिकायतों पर 48 घंटे में कार्रवाई की जाएगी।
किसानों की उम्मीद
कई किसानों का कहना है कि सरकार की यह सख्ती सही समय पर आई है। “अगर मंत्री जैन जी ने खुद संज्ञान नहीं लिया होता, तो हालात और बिगड़ जाते।” खेती के मौसम में खाद की कमी का मतलब है फसल का नुकसान, और छोटे किसानों के लिए यह उनके पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर देता है।
बैतूल का कृषि परिदृश्य
बैतूल जिला मध्यप्रदेश का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र है। यहां की लगभग 70% आबादी खेती पर निर्भर है। रबी सीजन में जिले में औसतन 2.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई होती है। इस वर्ष किसान गेहूं, चना, मसूर और अलसी जैसी फसलों की तैयारी में जुटे हैं। ऐसे में खाद की कमी और ऊंचे दाम किसानों के लिए संकट की तरह हैं।
विशेषज्ञों की राय
कृषि विशेषज्ञ डॉ. शिव प्रसाद मिश्रा कहते हैं —
“खाद वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता तभी आ सकती है जब डिजिटल मॉनिटरिंग और फील्ड विजिट दोनों एक साथ हों। सिर्फ आदेश से समस्या खत्म नहीं होगी। ग्रामीण इलाकों में अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी।”
दोषियों पर शिकंजा
राज्य सरकार ने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि वे ‘खाद मॉनिटरिंग कमेटी’ बनाएं, जिसमें जिला प्रशासन, सहकारी विभाग और पुलिस के अधिकारी शामिल हों। यदि कोई व्यापारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ Essential Commodities Act 1955 के तहत कार्रवाई की जाएगी, जिसमें 7 साल तक की सजा और लाइसेंस निरस्तीकरण का प्रावधान है।
किसानों को भरोसा
सरकार के इस रुख से किसानों में भरोसा लौटा है। बैतूल के किसान लखन साहू कहते हैं —
“अब उम्मीद है कि कोई हमें ठगेगा नहीं। सरकार अगर वाकई सख्त है, तो यह किसानों की जीत होगी।”
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश सरकार का यह कदम केवल खाद की कालाबाजारी रोकने का प्रयास नहीं, बल्कि किसानों के हितों की रक्षा का प्रतीक है।
कृषि मंत्री जैन का यह संदेश साफ है —
“खेती करने वाले हाथों को लूटने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।”
जब तक प्रशासनिक स्तर पर ईमानदारी और निगरानी बनी रहेगी, तब तक किसानों को राहत मिलती रहेगी। इस कार्रवाई से उम्मीद जगी है कि भविष्य में खेती, नीति और नीयत — तीनों साथ चलेंगी।
