वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बदलते परिदृश्य में भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ नया मुक्त व्यापार समझौता न केवल दोनों पक्षों के लिए बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित यह समझौता आकार, प्रभाव और संभावनाओं के लिहाज से भारत के इतिहास का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट बताया जा रहा है।

यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं व्यापारिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन के दबाव से जूझ रही हैं। भारत और यूरोपीय संघ का यह कदम इस बात का संकेत है कि दोनों पक्ष मिलकर न केवल आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहते हैं, बल्कि लोकतंत्र, नियम आधारित व्यवस्था और वैश्विक स्थिरता के साझा मूल्यों को भी मजबूत करना चाहते हैं।
27 देशों के साथ 27 तारीख को ऐतिहासिक संयोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को लेकर कहा कि यह एक सुखद संयोग है कि 27 तारीख को यूरोपीय संघ के 27 देशों के साथ यह ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट संपन्न हुआ। उन्होंने इसे भारत के अब तक के सबसे बड़े व्यापारिक समझौतों में से एक बताया और कहा कि यह दो विशाल अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का बेहतरीन उदाहरण है।
प्रधानमंत्री के अनुसार, यह समझौता वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 25 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के करीब एक तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सीधा अर्थ है कि इस समझौते का असर केवल भारत और यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
उच्चस्तरीय मौजूदगी और कूटनीतिक संदेश
इस ऐतिहासिक मौके पर यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मौजूदगी ने इस समझौते के महत्व को और बढ़ा दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने दा कोस्टा को स्नेहपूर्वक ‘लिस्बन का गांधी’ कहकर संबोधित किया, जो भारत-यूरोप के बीच बढ़ती वैचारिक और कूटनीतिक निकटता का प्रतीक माना गया।
उर्सुला वॉन डेर लेयेन पहले ही भारत के गणतंत्र दिवस समारोह की मुख्य अतिथि रह चुकी थीं, जिससे यह स्पष्ट हो गया था कि भारत-यूरोप रिश्तों में एक नई ऊर्जा और दिशा आने वाली है।
लोकतंत्र, कानून और साझा मूल्यों की साझेदारी
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह डील लोकतंत्र, कानून के शासन और साझा वैश्विक जिम्मेदारियों के प्रति भारत और यूरोप की प्रतिबद्धता को भी मजबूत करती है।
उनके अनुसार, इस समझौते से न केवल व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन को भी मजबूती मिलेगी, जो हाल के वर्षों में कई संकटों से प्रभावित रही है।
किन क्षेत्रों को होगा सबसे अधिक फायदा
सरकार के मुताबिक, इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से टेक्सटाइल, परिधान, जेम्स एंड ज्वैलरी, लेदर, जूते, मशीनरी, रसायन और दवाइयों जैसे क्षेत्रों को सीधा लाभ मिलेगा। भारत के लिए यह समझौता मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और सर्विस सेक्टर के विस्तार का एक बड़ा अवसर माना जा रहा है।
विशेष रूप से टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग को इससे नई उड़ान मिलने की उम्मीद है। यूरोपीय संघ के 263.5 अरब डॉलर के विशाल टेक्सटाइल बाजार तक भारत की सीधी पहुंच खुल जाएगी, जिससे कारीगरों, बुनकरों, महिलाओं और एमएसएमई क्लस्टरों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
यूरोपीय कारों पर टैरिफ में बड़ी कटौती
इस समझौते का सबसे चर्चित पहलू यूरोपीय कारों पर लगने वाले टैरिफ में भारी कटौती है। वर्तमान में भारत में यूरोपीय कारों पर 110 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता है, जिसे चरणबद्ध तरीके से घटाकर 10 प्रतिशत तक लाने पर सहमति बनी है।
इसके अलावा कार के पुर्जों पर लगने वाला शुल्क भी अगले पांच से दस वर्षों में पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। इससे भारतीय बाजार में यूरोपीय कारें और ऑटोमोबाइल तकनीक अधिक सुलभ और किफायती हो जाएंगी।
मशीनरी, रसायन और दवाइयों को राहत
यूरोपीय संघ के अनुसार, मशीनरी पर 44 प्रतिशत तक, रसायनों पर 22 प्रतिशत तक और दवाइयों पर 11 प्रतिशत तक लगने वाले टैरिफ को भी बड़े पैमाने पर समाप्त किया जाएगा। इससे भारतीय उद्योगों को उन्नत तकनीक और कच्चे माल तक सस्ती पहुंच मिलेगी, वहीं यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे विशाल बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी।
व्यापार के आंकड़े और आर्थिक प्रभाव
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच वस्तुओं का व्यापार करीब 11.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि सेवाओं का व्यापार 7.2 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर है। इस नए समझौते के बाद इन आंकड़ों में तेज वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने जानकारी दी है कि इस सौदे के तहत भारत से निर्यात होने वाली 9425 टैरिफ लाइनों को समाप्त कर दिया गया है। इसका मतलब है कि इन उत्पादों पर अब कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा। लगभग 99 प्रतिशत भारतीय निर्यात मूल्य अब जीरो ड्यूटी के दायरे में आएगा।
भारतीय कामगारों और छात्रों को भी लाभ
यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव संसाधन और शिक्षा के क्षेत्र में भी नए अवसर खोलता है। इसके तहत यूरोप के आईटी, शिक्षा, वित्त और अन्य 144 उप-सेक्टर्स में भारत को पहुंच दी जाएगी।
यूरोप में पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद नौ महीने का पोस्ट-स्टडी वीजा फ्रेमवर्क भी तय किया गया है। इसके अलावा यूरोप में भारतीय पारंपरिक दवाओं के चिकित्सकों को भी काम करने की अनुमति मिलने का रास्ता साफ हुआ है।
बदलता वैश्विक परिदृश्य और रणनीतिक कारण
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस समझौते के पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक हालात की भी बड़ी भूमिका है। इस समय भारत और यूरोप दोनों ही अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव का सामना कर रहे हैं।
अमेरिका द्वारा यूरोप के खिलाफ संभावित ट्रेड वॉर की धमकी और भारत पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ ने दोनों पक्षों को एक-दूसरे के करीब आने के लिए प्रेरित किया है। ऐसे में यह फ्री ट्रेड एग्रीमेंट एक रणनीतिक कदम भी माना जा रहा है।
यूरोपीय संघ के लिए भारत क्यों अहम
यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ करीबी व्यापारिक संबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अनुमान है कि भारत जल्द ही 4 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी को पार कर जापान को पीछे छोड़ सकता है।
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से भी यह बात कही जा चुकी है कि भारत और यूरोप मिलकर दो अरब लोगों का एक विशाल मुक्त बाजार बना सकते हैं, जो वैश्विक जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा होगा।
भारत के लिए यूरोप का महत्व
भारत के लिए यूरोपीय संघ पहले से ही उसका सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है। इस समझौते के साथ यूरोपीय संघ भारत का 22वां फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साझेदार बन गया है।
ब्रिटेन के साथ पहले से हुए समझौते और अब यूरोपीय संघ के साथ इस डील के बाद भारतीय कारोबारियों के लिए लगभग पूरा यूरोपीय बाजार खुल गया है, जो निर्यात और निवेश के नए अवसर लेकर आएगा।
भविष्य की ओर बढ़ता भारत-यूरोप संबंध
उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बताते हुए कहा कि यह तो सिर्फ शुरुआत है। भारत और यूरोप के रिश्ते आने वाले समय में और भी मजबूत होंगे।
यह समझौता केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक गठबंधन की नींव भी है, जो वैश्विक स्थिरता, शांति और विकास में अहम भूमिका निभा सकता है।
