भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक करार भर नहीं है, बल्कि यह तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति और व्यापारिक तनावों के बीच एक बड़े रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे समय में, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ़ नीति ने दुनिया भर में अनिश्चितता पैदा कर दी है, भारत और यूरोप का एक-दूसरे के करीब आना अंतरराष्ट्रीय मंच पर नए समीकरण गढ़ता दिख रहा है।

यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन का भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं है। इसके पीछे एक स्पष्ट संदेश छिपा है कि भारत और यूरोप अब अपने रिश्तों को केवल राजनीतिक या सांस्कृतिक दायरे तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाई पर ले जाने के इच्छुक हैं।
इन औपचारिक कार्यक्रमों और स्टेट डिनर के बीच सबसे अहम मुद्दा भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को आगे बढ़ाने का है। यह वही समझौता है जिस पर बीते करीब दो दशकों से बातचीत चल रही है, लेकिन अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि यह अपने अंतिम चरण में पहुंच सकता है।
ट्रंप की टैरिफ़ नीति और यूरोप की बढ़ती चिंता
यूरोप इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के वर्षों में जिस तरह से टैरिफ़ और व्यापारिक दबाव की नीति अपनाई है, उसने पारंपरिक सहयोगियों को भी असहज कर दिया है। ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण के मुद्दे को लेकर जब यूरोपीय देशों ने विरोध दर्ज कराया, तब ट्रंप ने उनके खिलाफ ट्रेड वॉर तेज़ करने की धमकी दी थी। भले ही बाद में इस रुख़ में कुछ नरमी आई हो, लेकिन इससे यूरोप को यह एहसास हो गया कि अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जोखिम भरी साबित हो सकती है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत का महत्व यूरोप के लिए तेजी से बढ़ा है। भारत न केवल एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार है, बल्कि वह उन देशों में से है, जिनकी अर्थव्यवस्था स्थिरता और तेज़ विकास दोनों का संकेत देती है। यही कारण है कि यूरोपीय संघ अब भारत के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को नई गति देना चाहता है।
भारत की कूटनीतिक सोच और बहुपक्षीय रणनीति
भारत द्वारा गणतंत्र दिवस के लिए यूरोपीय नेतृत्व को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना उसकी बदलती कूटनीतिक सोच को भी दर्शाता है। भारत अब किसी एक वैश्विक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपने रिश्तों को विविध बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिका, यूरोप, एशिया और खाड़ी देशों के साथ समानांतर रूप से संबंध मजबूत करना इसी सोच का हिस्सा है।
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत तक के टैरिफ़ को लेकर बनी अनिश्चितता भी लंबे समय से बनी हुई है। नए साल की शुरुआत के बावजूद इस मुद्दे पर कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने निर्यातकों और उद्योगों को वैकल्पिक बाज़ारों तक बेहतर पहुंच दिलाए।
लंदन स्थित थिंक टैंक से जुड़े विशेषज्ञ क्षितिज बाजपेई के अनुसार, यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि भारत की विदेश नीति बहुआयामी है और वह किसी एक प्रशासन की इच्छाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहता। भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र फैसले लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
समझौते की घोषणा की बढ़ती उम्मीद
कई रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि 27 जनवरी को होने वाले एक उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और यूरोपीय संघ इस बहुप्रतीक्षित समझौते की औपचारिक घोषणा कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह बीते दो दशकों की लंबी और जटिल बातचीत का परिणाम होगा।
उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दोनों ही इस समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कह चुके हैं। यह शब्दावली इस बात को दर्शाती है कि दोनों पक्ष इस करार को कितनी अहमियत दे रहे हैं और इससे उन्हें कितनी बड़ी उम्मीदें हैं।
भारत का बढ़ता एफटीए नेटवर्क
पिछले चार वर्षों में भारत ने व्यापारिक समझौतों के मोर्चे पर अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई है। यह प्रस्तावित समझौता भारत का नौवां फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होगा। इससे पहले भारत ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और कई अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते कर चुका है। यह रुझान बताता है कि भारत अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी संरक्षणवादी सोच से बाहर निकल रहा है और वैश्विक व्यापार में अधिक खुलापन दिखा रहा है।
यूरोपीय संघ के लिए भी यह समझौता रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। हाल ही में मर्कोसुर व्यापार समूह के साथ हुए करार के बाद भारत के साथ यह अगला बड़ा कदम होगा। इससे पहले यूरोपीय संघ जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते कर चुका है।
भू-राजनीति और भरोसेमंद साझेदारी की तलाश
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनावों ने व्यापार के माहौल को अस्थिर बना दिया है। सप्लाई चेन में रुकावट, अचानक लगने वाले टैरिफ़ और निर्यात नियंत्रण ने कंपनियों को वैकल्पिक और भरोसेमंद साझेदारों की तलाश में लगा दिया है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही इस समय ऐसे साझेदार चाहते हैं, जिन पर लंबी अवधि में भरोसा किया जा सके। भारत अमेरिका के टैरिफ़ दबाव से राहत चाहता है, जबकि यूरोपीय संघ चीन पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम करने की कोशिश में है, जिसे वह अब पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानता।
यह समझौता भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उसके आर्थिक उदारीकरण की दिशा में एक और ठोस कदम होगा। लंबे समय तक संरक्षणवादी नीतियों पर निर्भर रहने के बाद भारत अब वैश्विक बाज़ार के साथ गहराई से जुड़ने की कोशिश कर रहा है।
भारत की आर्थिक ताक़त और यूरोप की दिलचस्पी
यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ करीबी व्यापारिक रिश्ते इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि भारत की आर्थिक ताक़त लगातार बढ़ रही है। भारत इस समय दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अनुमान है कि इस साल भारत की जीडीपी चार ट्रिलियन डॉलर को पार कर सकती है, जिससे वह जापान को पीछे छोड़ देगा।
वॉन डेर लेयेन ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के मंच से कहा था कि अगर यूरोपीय संघ और भारत साथ आते हैं, तो करीब दो अरब लोगों का एक विशाल मुक्त बाज़ार बनेगा, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग एक चौथाई हिस्सा होगा। यह बयान इस समझौते की संभावित ताक़त को दर्शाता है।
भारत को इस समझौते से होने वाले फायदे
यूरोपीय संघ पहले से ही भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है। इस प्रस्तावित समझौते के तहत जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज यानी जीएसपी की बहाली की उम्मीद भी जताई जा रही है। इसके तहत विकासशील देशों से यूरोपीय बाज़ार में आने वाले कई उत्पादों पर आयात शुल्क नहीं लगता।
भारत ने यूरोपीय संघ को लगभग 76 अरब डॉलर का निर्यात किया है और वहां से करीब 61 अरब डॉलर का आयात किया है, जिससे भारत को व्यापार सरप्लस मिला है। हालांकि 2023 में यूरोपीय संघ द्वारा जीएसपी लाभ हटाए जाने से कई भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हुई थी।
मुक्त व्यापार समझौता इस खोई हुई बाज़ार पहुंच को फिर से बहाल कर सकता है। इससे कपड़ा, दवाएं, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद और मशीनरी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में टैरिफ़ कम होंगे। साथ ही अमेरिकी टैरिफ़ बढ़ने से पैदा हुए झटकों को झेलने में भारतीय कंपनियों को मदद मिलेगी।
संवेदनशील क्षेत्र और भारत की सावधानी
हालांकि भारत इस समझौते में पूरी तरह खुलापन नहीं दिखाना चाहता। कृषि और डेयरी जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को इससे बाहर रखने की कोशिश की जा रही है। वहीं कार, वाइन और स्पिरिट जैसे क्षेत्रों में शुल्क धीरे-धीरे घटाने का प्रस्ताव हो सकता है। यह वही चरणबद्ध तरीका है, जिसे भारत ने ब्रिटेन जैसे देशों के साथ अपने पिछले समझौतों में अपनाया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत आमतौर पर व्यापार वार्ताओं में पहले कम संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाता है और जटिल मामलों को बाद के दौर के लिए छोड़ देता है। यही वजह है कि इस समझौते का भू-राजनीतिक संदेश उसकी आर्थिक शर्तों जितना ही अहम माना जा रहा है।
बचे हुए मतभेद और बड़ी चुनौतियां
प्रगति के बावजूद कुछ गहरे मतभेद अब भी बने हुए हैं। यूरोपीय संघ के लिए बौद्धिक संपदा संरक्षण एक बड़ा मुद्दा है। वह बेहतर डेटा सुरक्षा और सख़्त पेटेंट नियम चाहता है, जबकि भारत अपने घरेलू उद्योगों और जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर सतर्क है।
इसके अलावा यूरोपीय संघ द्वारा लागू किया गया नया कार्बन टैक्स, जिसे सीबीएएम कहा जाता है, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। यह टैक्स भले ही पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से लाया गया हो, लेकिन व्यवहार में यह भारतीय निर्यात पर एक नए सीमा शुल्क की तरह काम कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर माइक्रो, छोटे और मझोले उद्योगों पर पड़ेगा, जिन्हें उच्च अनुपालन लागत, जटिल रिपोर्टिंग और कड़े उत्सर्जन मानकों का सामना करना पड़ सकता है।
भविष्य की दिशा और वैश्विक असर
यह समझौता विकास को बढ़ावा देने वाली साझेदारी बनेगा या रणनीतिक रूप से असंतुलित सौदा, यह इन अंतिम मुद्दों के समाधान पर निर्भर करेगा। हालांकि अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि लंबी अवधि में यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित होगा।
इससे अमेरिका या चीन जैसे अनिश्चित साझेदारों पर निर्भरता कम हो सकती है और बार-बार बदलने वाले टैरिफ़, निर्यात नियंत्रण और सप्लाई चेन के राजनीतिक इस्तेमाल से पैदा होने वाले जोखिम घट सकते हैं।
हालांकि यूरोप में भारत के उच्च कार्बन उत्सर्जन और मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर कुछ विरोध भी देखा गया है। इसके बावजूद, नवंबर 2025 से रूस के कच्चे तेल की खरीद में भारत द्वारा की गई कटौती ने यूरोपीय संसद में इस समझौते के लिए माहौल को कुछ हद तक अनुकूल बना दिया है।
अब इस समझौते के लागू होने के लिए यूरोपीय संसद की मंज़ूरी जरूरी होगी। अमेरिका के साथ बढ़ते राजनीतिक तनावों के बीच यह संभावना भी बढ़ गई है कि यूरोपीय नेता इस व्यापार समझौते को पहले से अधिक सकारात्मक नजरिए से देखें।
कुल मिलाकर, भारत और यूरोपीय संघ की यह ट्रेड डील केवल आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में दोनों की साझा रणनीति और भविष्य की दिशा का संकेत है।
