भारत ने अपने ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़ा और महत्वाकांक्षी कदम उठाया है। संसद के दोनों सदनों ने हाल ही में ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ़ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI या शांति) विधेयक, 2025’ पास किया। इस विधेयक का उद्देश्य भारत को 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता तक पहुँचाना और देश में स्वदेशी एवं विदेशी सहयोग के माध्यम से परमाणु ऊर्जा के विकास को बढ़ावा देना है।

परमाणु ऊर्जा, जिसे न्यूक्लियर एनर्जी भी कहते हैं, परमाणु के न्यूक्लियस से निकलने वाली ऊर्जा का रूप है। यह ऊर्जा मुख्यतः दो प्रक्रियाओं के माध्यम से प्राप्त होती है: फिशन और फ्यूजन। फिशन या विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें परमाणु का न्यूक्लियस दो या अधिक छोटे न्यूक्लियस में टूटता है और इस दौरान ऊष्मा और विकिरण के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। फ्यूजन या संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें न्यूक्लियस आपस में जुड़ते हैं और ऊर्जा रिलीज़ होती है, लेकिन यह तकनीक अभी शोध के चरण में है। वर्तमान में दुनियाभर में बिजली उत्पादन के लिए फिशन प्रक्रिया का ही उपयोग किया जाता है।
न्यूक्लियर फिशन का एक क्लासिक उदाहरण यूरेनियम-235 का न्यूक्लियस है। जब किसी न्यूट्रॉन से टकराता है, तो यह दो छोटे न्यूक्लियस में विभाजित हो जाता है, जैसे बेरियम और क्रिप्टॉन, और अतिरिक्त न्यूट्रॉन उत्पन्न करता है। ये न्यूट्रॉन आसपास के अन्य यूरेनियम परमाणुओं से टकराते हैं, जिससे एक चेन रिएक्शन शुरू होता है। इस प्रक्रिया में उत्पन्न ऊष्मा को बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में रिएक्टर और संबंधित उपकरण इस चेन रिएक्शन को नियंत्रित करते हैं। रिएक्टर के अंदर गर्म पानी या कूलिंग एजेंट भाप में परिवर्तित होता है और यह भाप टर्बाइन चलाकर बिजली उत्पादन करती है।
भारत में वर्तमान में परमाणु ऊर्जा उत्पादन का स्तर अपेक्षाकृत कम है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल बिजली उत्पादन का केवल 3.1% हिस्सा परमाणु ऊर्जा से आता है। वर्तमान क्षमता 8,780 मेगावॉट है और 2024-25 में 56,681 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ। भारत के ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के अनुसार, देश में अधिकांश ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है, जिनमें तेल और गैस का उच्च आयात शामिल है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, प्रदूषण कम करना और घरेलू ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए परमाणु ऊर्जा और सौर ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण विकल्प हैं।
शांति विधेयक का उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि निजी क्षेत्र को भी इस क्षेत्र में निवेश और भागीदारी का अवसर प्रदान करना है। इससे विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे। वर्तमान में कई विकसित देशों, जैसे अमेरिका, फ्रांस और रूस, अपने निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के माध्यम से परमाणु ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी हैं। इस विधेयक के आने के साथ ही भारत का यह प्रयास निजी और विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
विधेयक को लेकर विपक्ष ने कई सवाल उठाए। सांसद मनीष तिवारी ने निजी क्षेत्र की भागीदारी को लेकर सुरक्षा, पर्यावरण और आपदा दायित्व पर चिंता जताई। उन्होंने पूछा कि यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है, तो क्या विदेशी सप्लायर्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा और क्या नागरिक या राज्य सरकारें सीधे शिकायत दर्ज कर सकती हैं। इसके अलावा, तिवारी ने विधेयक में निर्धारित दुर्घटना दायित्व सीमा 41 करोड़ डॉलर पर सवाल उठाया और इसे बढ़ाकर 10 हज़ार करोड़ रुपए करने की मांग की।
सांसद शशि थरूर ने इसे ‘निजीकृत परमाणु विस्तार की दिशा में खतरनाक छलांग’ बताया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक पूरे परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को, खनन से लेकर कचरा प्रबंधन तक, अनिश्चित योग्यता वाले निजी खिलाड़ियों के लिए खोल देता है। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्घटना दायित्व की राशि बेहद अपर्याप्त है, विशेषकर फ़ुकुशिमा और चेर्नोबिल जैसी आपदाओं के आर्थिक प्रभाव को देखते हुए।
सुरक्षा और पर्यावरण के मुद्दों पर विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का मानना है कि भारत के परमाणु संयंत्रों में किसी प्रकार की गंभीर दुर्घटना नहीं हुई है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियां आईएईए के तहत सभी रिएक्टरों की निगरानी करती हैं। भारत में परमाणु सबमरीन निर्माण जैसी स्वदेशी तकनीकें भी हैं, जो उच्च सुरक्षा और तकनीकी क्षमता का उदाहरण हैं।
दुनिया के संदर्भ में देखा जाए तो कुल 416 परमाणु रिएक्टर 31 देशों में संचालित हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 376 गीगावॉट है। अमेरिका 94 रिएक्टरों के साथ सबसे बड़ा उत्पादक है, उसके बाद फ्रांस, चीन, रूस और दक्षिण कोरिया का स्थान आता है। चीन में परमाणु ऊर्जा के विकास की दर दुनिया में सबसे तेज़ है और कई रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। रूस इस क्षेत्र में विश्व का प्रमुख विक्रेता है।
भारत का उद्देश्य है कि 2047 तक 100 गीगावॉट ऊर्जा उत्पादन की क्षमता हासिल की जाए। इसके लिए एनपीसीआईएल स्वदेशी प्रेशराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर और हल्के वॉटर रिएक्टर पर आधारित नए संयंत्र स्थापित करेगी। यह मिशन ऊर्जा आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में अहम भूमिका निभाएगा।
शांति विधेयक पारित होने के बाद निजी और विदेशी निवेशकों के लिए कई अवसर खुलेंगे। यह विधेयक भारत के ऊर्जा क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती प्रदान करेगा और देश को स्वच्छ और स्थायी ऊर्जा के लक्ष्य की दिशा में ले जाएगा।
