मुख्य बातें
- NHAI ने हाईकोर्ट में तस्वीरें पेश कर इंदौर-देवास बायपास के गड्ढे भरने और समस्या दूर होने का दावा किया।
- हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से मौके पर जाकर सड़क की मौजूदा स्थिति देखने और अगली सुनवाई में जानकारी देने को कहा।
- वर्ष 2021 में दायर जनहित याचिका में गड्ढों, खराब सर्विस रोड, जलभराव, खुले ड्रेनेज और स्ट्रीट लाइट की समस्याएं उठाई गई हैं।
- मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। सड़क सुधार के दावे की वास्तविक स्थिति अब महत्वपूर्ण होगी।

इंदौर-देवास बायपास की बदहाली को लेकर चल रही जनहित याचिका में अब सड़क की वास्तविक स्थिति की पड़ताल अहम हो गई है। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में तस्वीरें पेश करते हुए दावा किया कि बायपास पर मौजूद गड्ढे भर दिए गए हैं और अब वहां पहले जैसी समस्या नहीं है। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केवल प्रस्तुत तस्वीरों के आधार पर स्थिति को अंतिम रूप से स्वीकार करने के बजाय याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर सड़क देखने और वास्तविक हालात से अवगत कराने को कहा है।
इस निर्देश के बाद मामला केवल सड़क की मरम्मत के दावे तक सीमित नहीं रह गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तस्वीरों में दिखाई गई स्थिति मौके पर भी वैसी ही है या नहीं, और क्या सुधार का असर बायपास से नियमित रूप से गुजरने वाले वाहन चालकों को वास्तव में मिल रहा है। मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को निर्धारित है। उस दिन याचिकाकर्ता की ओर से दी जाने वाली जानकारी और सड़क की मौजूदा हालत पर आगे की कार्यवाही की दिशा निर्भर कर सकती है।
हाईकोर्ट ने मौके की जांच पर दिया जोर
इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ में हुई। NHAI की ओर से तस्वीरें पेश करके बताया गया कि गड्ढों को भरने का काम किया जा चुका है और सड़क की समस्या दूर कर दी गई है। इसके जवाब में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह मौके पर जाकर स्थिति देखे और फिर अदालत को बताए कि सड़क की हालत वास्तव में कैसी है।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़क सुधार के किसी भी दावे का आकलन केवल काम पूरा होने की सूचना से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक परिणामों से भी किया जाना चाहिए। मरम्मत के बाद सड़क कितनी सुरक्षित है, गड्ढे दोबारा तो नहीं उभर रहे और आसपास की सहायक सड़कें तथा जल निकासी व्यवस्था कैसी हैं, ये सभी बातें आम लोगों के अनुभव को प्रभावित करती हैं। हालांकि, अभी यह नहीं कहा जा सकता कि कोर्ट ने NHAI के दावे को खारिज कर दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने याचिकाकर्ता से स्वतंत्र रूप से मौके की स्थिति देखकर रिपोर्ट देने को कहा है।
27 अक्टूबर की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि याचिकाकर्ता को सड़क की स्थिति में कितना सुधार दिखाई दिया और क्या अभी भी ऐसे हिस्से मौजूद हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। फिलहाल, NHAI के दावे और याचिकाकर्ता की पहले बताई गई समस्याओं के बीच वास्तविक स्थिति का सत्यापन इस मामले का प्रमुख पहलू है।
वर्ष 2021 से चल रही जनहित याचिका
इंदौर-देवास बायपास की बदहाली का मामला नया नहीं है। मातृ फाउंडेशन की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने वर्ष 2021 में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें सड़क की खराब स्थिति के साथ उन व्यवस्थागत कमियों को उठाया गया है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुरक्षित और व्यवस्थित आवागमन के लिए जरूरी मानी जाती हैं।
याचिका में बड़े गड्ढों, बदहाल सर्विस रोड, खुले ड्रेनेज, जलभराव और खराब या बंद स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा दुर्घटना संभावित स्थानों और अव्यवस्थित यातायात को लेकर भी चिंता जताई गई है। इन मुद्दों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि बायपास पर सड़क की गुणवत्ता का असर सिर्फ वाहन के आराम पर नहीं पड़ता। सड़क की सतह, दृश्यता, निकासी और यातायात व्यवस्था में कमी वाहन चालकों के नियंत्रण, प्रतिक्रिया के समय और दुर्घटना के जोखिम को प्रभावित कर सकती है।
जनहित याचिका के माध्यम से उठाए गए सवाल किसी एक गड्ढे या एक सड़क खंड तक सीमित नहीं हैं। इसमें व्यापक रूप से यह मुद्दा सामने आता है कि सड़क के निर्माण या मरम्मत के साथ उसके आसपास की सुविधाओं और सुरक्षा प्रबंधों को भी व्यवस्थित रखा जा रहा है या नहीं। किसी मार्ग पर मुख्य सड़क ठीक होने के बावजूद यदि सर्विस रोड खराब हो, जलभराव हो या रात में रोशनी की व्यवस्था कमजोर हो, तो उपयोगकर्ताओं की परेशानी बनी रह सकती है।
गड्ढों से आगे भी हैं सड़क सुरक्षा के सवाल
इंदौर-देवास बायपास को लेकर उठाई गई शिकायतों में गड्ढे सबसे आसानी से दिखाई देने वाली समस्या हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा का दायरा इससे बड़ा है। गड्ढों के कारण वाहन चालक अचानक दिशा बदलने या गति कम करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। यदि उसी समय पीछे से तेज गति में वाहन आ रहा हो, तो टक्कर का खतरा बढ़ सकता है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए असमान सड़क सतह पर संतुलन बनाए रखना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सर्विस रोड की खराब हालत भी अलग तरह की परेशानी पैदा करती है। ऐसी सड़कों का उपयोग स्थानीय आवाजाही, मुख्य मार्ग तक पहुंचने और आसपास के प्रतिष्ठानों या बस्तियों तक आने-जाने के लिए किया जाता है। यदि सर्विस रोड पर गड्ढे हों या उसका उपयोग बाधित हो, तो स्थानीय वाहन मुख्य सड़क पर अधिक निर्भर हो सकते हैं। इससे यातायात का दबाव और वाहनों के बीच टकराव की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इस मामले में ऐसी किसी विशिष्ट दुर्घटना या यातायात परिवर्तन का स्वतंत्र विवरण उपलब्ध नहीं है; ये खराब सड़क व्यवस्था से जुड़े सामान्य सुरक्षा जोखिम हैं।
खुले ड्रेनेज और जलभराव की समस्या भी केवल बारिश के दिनों तक सीमित नहीं रहती। पानी जमा होने पर सड़क की सतह और गड्ढों की गहराई का अंदाजा लगाना कठिन हो सकता है। निकासी व्यवस्था ठीक नहीं होने से मरम्मत किए गए हिस्सों की टिकाऊ क्षमता पर भी सवाल उठ सकते हैं। इसलिए सड़क सुधार का मूल्यांकन करते समय यह देखना आवश्यक है कि गड्ढे भरने के साथ जल निकासी की स्थिति पर भी ध्यान दिया गया या नहीं।
स्ट्रीट लाइट और दृश्यता का महत्व
याचिका में खराब या बंद स्ट्रीट लाइट का मुद्दा भी उठाया गया है। सड़क पर पर्याप्त रोशनी वाहन चालकों को आगे की स्थिति समझने, सड़क किनारे खड़े वाहनों या अवरोधों को पहचानने और संकेतकों को समय पर देखने में मदद करती है। यदि किसी हिस्से में रोशनी अपर्याप्त हो, तो रात में यात्रा करने वालों के लिए जोखिम बढ़ सकता है, खासकर तब जब सड़क की सतह भी असमान हो।
सुरक्षा की दृष्टि से रोशनी की व्यवस्था को गड्ढों और अन्य बाधाओं से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। सड़क की मरम्मत, संकेतकों की दृश्यता, जल निकासी और प्रकाश व्यवस्था मिलकर सुरक्षित आवागमन का आधार बनाते हैं। यदि इनमें से कोई एक व्यवस्था कमजोर हो, तो बाकी सुधारों का लाभ भी सीमित हो सकता है।
इसी कारण इंदौर-देवास बायपास की बदहाली से जुड़े मामले में यह देखना उपयोगी होगा कि मौके की जांच केवल गड्ढों तक सीमित रहती है या याचिका में उठाए गए दूसरे मुद्दों पर भी स्थिति स्पष्ट होती है। अभी कोर्ट के निर्देश का मुख्य उद्देश्य सड़क की वास्तविक स्थिति की जानकारी लेना है। उपलब्ध विवरण में ऐसा कोई आदेश नहीं बताया गया है जिसमें सभी समस्याओं पर अलग-अलग अंतिम निष्कर्ष दे दिया गया हो।
पिछली सुनवाई में क्या पूछा गया था
इससे पहले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने NHAI से पूछा था कि वर्ष 2023 में जारी हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश और सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा संबंधी गाइडलाइन के बाद बायपास की स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इस सवाल से स्पष्ट होता है कि न्यायिक निगरानी के केंद्र में केवल वर्तमान मरम्मत नहीं, बल्कि पहले दिए गए निर्देशों के अनुपालन का मुद्दा भी है।
अदालत के सामने किसी सुधार कार्य का विवरण रखना और उस सुधार का जमीन पर प्रभाव दिखाई देना दो अलग बातें हैं। किसी सड़क पर मरम्मत कराना जरूरी पहला कदम है, लेकिन उसके बाद यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि काम निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ या नहीं, सड़क कितने समय तक ठीक रहती है और अन्य सुरक्षा संबंधी कमियों को दूर करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
याचिका में पहले से समस्याएं उठाए जाने और हालिया सुनवाई में NHAI की ओर से गड्ढे भरने का दावा किए जाने के बीच अब मौके की जांच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। इससे अदालत के सामने संबंधित पक्षों के दावों की तुलना करने के लिए अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध हो सकती है। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष अदालत की आगे की कार्यवाही और रिकॉर्ड पर आने वाली सामग्री पर निर्भर करेगा।
महिला की मौत का दावा भी उठा
पिछली सुनवाई से पहले याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि बायपास पर गड्ढे में गिरने के कारण एक महिला की मौत हुई है। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं होने से दुर्घटनाओं का खतरा बना हुआ है।
यह आरोप सड़क की स्थिति को लेकर उठाए गए सवालों को और गंभीर बनाता है, क्योंकि सड़क संबंधी शिकायतों का संबंध सीधे लोगों की सुरक्षा से हो सकता है। फिर भी, किसी दुर्घटना की परिस्थितियों, कारण और जिम्मेदारी के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित जांच या आधिकारिक रिकॉर्ड की जानकारी आवश्यक होती है। उपलब्ध विवरण में महिला की पहचान, दुर्घटना की तारीख या घटना की स्वतंत्र जांच से संबंधित विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए इस दावे को याचिकाकर्ता के कथन के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि इस मामले में स्थापित न्यायिक निष्कर्ष के रूप में।
सड़क सुरक्षा से जुड़े विवादों में ऐसी घटनाओं का उल्लेख इस बात की जरूरत सामने लाता है कि शिकायतों का समय पर परीक्षण हो और जोखिम वाले हिस्सों की पहचान की जाए। साथ ही, दुर्घटनाओं के कारणों की पुष्टि तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, ताकि मरम्मत, निगरानी और जवाबदेही से जुड़े कदम सही दिशा में उठाए जा सकें।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का व्यापक संदर्भ
जनहित याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क सुरक्षा संबंधी निर्देशों के पालन की मांग भी शामिल है। याचिका के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अवैध पार्किंग, अवैध ढाबों और व्यावसायिक अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। इसके अतिरिक्त दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान, चेतावनी संकेतकों की व्यवस्था, पर्याप्त प्रकाश, यातायात निगरानी और आपातकालीन सेवाओं को बेहतर बनाने जैसे विषयों पर जोर दिया गया है।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल यातायात को सुचारु बनाना नहीं, बल्कि जोखिम को पहले से पहचानकर दुर्घटनाओं की आशंका कम करना भी है। उदाहरण के लिए, यदि किसी हिस्से में बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं या वहां सड़क का डिजाइन, दृश्यता अथवा यातायात का व्यवहार खतरा पैदा करता है, तो संकेतक, गति नियंत्रण और दूसरे सुरक्षा उपाय उपयोगी हो सकते हैं। इसी तरह अवैध पार्किंग या अतिक्रमण सड़क की उपलब्ध चौड़ाई कम कर सकते हैं और वाहनों के आवागमन में बाधा पैदा कर सकते हैं।
हालांकि, किसी विशेष स्थान पर कौन-सा निर्देश किस रूप में लागू होता है और उसके अनुपालन की जिम्मेदारी किस एजेंसी की है, इसका निर्धारण संबंधित आदेशों, नियमों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है। इस मामले में याचिकाकर्ता ने निर्देशों के पालन का सवाल उठाया है। अदालत की आगे की सुनवाई में इस संबंध में अतिरिक्त तथ्य सामने आ सकते हैं।
सड़क सुधार में जवाबदेही क्यों जरूरी
राष्ट्रीय राजमार्गों पर मरम्मत कार्यों की गुणवत्ता और उनकी निगरानी का सीधा संबंध सार्वजनिक सुरक्षा से है। गड्ढे भरने का काम जरूरी है, लेकिन उसके साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होता है कि मरम्मत टिकाऊ हो, पानी जमा होने की समस्या का समाधान हो और सड़क पर संकेतक तथा रोशनी जैसी सुविधाएं काम कर रही हों। इन सभी पहलुओं की स्थिति स्पष्ट होने पर ही यह समझा जा सकता है कि किसी मार्ग पर सुधार कितना प्रभावी रहा।
इंदौर-देवास बायपास के मामले में अदालत द्वारा मौके पर जाकर देखने को कहना इसी व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि सरकारी एजेंसी की ओर से प्रस्तुत जानकारी और सड़क पर मौजूद स्थिति के बीच कितना मेल है। तस्वीरें किसी निश्चित समय और स्थान की स्थिति दिखा सकती हैं, लेकिन पूरे मार्ग की मौजूदा हालत का आकलन करने के लिए यह जानना भी जरूरी हो सकता है कि किन हिस्सों की मरम्मत हुई, अन्य शिकायतों का क्या हुआ और कुछ समय बाद सड़क की स्थिति कैसी रही।
यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध जानकारी में NHAI के दावे के अलावा मरम्मत के काम का विस्तृत तकनीकी ब्यौरा नहीं दिया गया है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सभी गड्ढे पूरी तरह समाप्त हो गए हैं या सभी शिकायतें अब भी जस की तस बनी हुई हैं। इसी अंतर को स्पष्ट करने के लिए मौके की जांच और अगली सुनवाई महत्वपूर्ण हो सकती है।
आम वाहन चालकों के लिए क्या मायने
इंदौर और देवास के बीच आवागमन करने वाले लोगों के लिए सड़क की स्थिति रोजमर्रा की यात्रा, समय और सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। खराब सड़क पर वाहन चलाने से यात्रा में देरी, वाहन के टायर या अन्य हिस्सों को नुकसान और अचानक ब्रेक लगाने जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। सड़क की हालत के साथ रोशनी, निकासी और सर्विस रोड की व्यवस्था भी यात्रियों के अनुभव पर असर डालती है।
हालांकि, इस खबर के आधार पर बायपास के सभी हिस्सों को असुरक्षित घोषित करना सही नहीं होगा। सड़क की वास्तविक स्थिति अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकती है और मरम्मत के बाद उसमें बदलाव भी संभव है। वाहन चालकों के लिए बेहतर होगा कि वे यात्रा के दौरान गति नियंत्रित रखें, सड़क पर मौजूद गड्ढों और अवरोधों से सावधानीपूर्वक बचें तथा खराब दृश्यता या जलभराव वाले हिस्सों में अतिरिक्त सतर्कता बरतें।
लंबे समय के समाधान के लिए नियमित निरीक्षण और शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था जरूरी है। यदि किसी मार्ग पर मरम्मत के बाद भी समस्या दोबारा सामने आती है, तो संबंधित एजेंसी के लिए उसका कारण समझना और आवश्यक सुधार करना महत्वपूर्ण हो जाता है। सड़क उपयोगकर्ताओं की शिकायतें और मौके की स्थिति का दस्तावेजीकरण भी ऐसे मामलों में उपयोगी हो सकता है, बशर्ते जानकारी तथ्यात्मक और सत्यापन योग्य हो।
27 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर
अब इस जनहित याचिका में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 27 अक्टूबर की सुनवाई है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर सड़क की मौजूदा हालत देखने और अदालत को वास्तविक स्थिति से अवगत कराने को कहा है। इससे आगे की कार्यवाही में NHAI के दावे के साथ सड़क पर देखी गई स्थिति की तुलना की जा सकेगी।
अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होना बाकी है कि मौके की जांच में क्या सामने आता है, क्या सड़क के सभी संबंधित हिस्सों में सुधार पाया जाता है और याचिका में उठाई गई दूसरी समस्याओं पर क्या जानकारी दी जाती है। यदि कोई कमी सामने आती है, तो अदालत संबंधित पक्षों से उस पर स्पष्टीकरण या आगे की कार्रवाई के बारे में जानकारी मांग सकती है। यह संभावित प्रक्रिया है; फिलहाल किसी नए आदेश या परिणाम की पुष्टि नहीं हुई है।
इंदौर-देवास बायपास की बदहाली से जुड़ा यह मामला इस व्यापक सवाल को भी रेखांकित करता है कि सड़क सुरक्षा के दावों का मूल्यांकन केवल मरम्मत की घोषणा से नहीं, बल्कि मौके पर दिखने वाले परिणामों से होना चाहिए। NHAI ने गड्ढे भरने की बात कही है, जबकि याचिकाकर्ता पहले भी सड़क की स्थिति पर चिंता जता चुका है। अब अदालत के निर्देश के अनुसार मौके की जांच और 27 अक्टूबर की सुनवाई से इस विवाद में अगला तथ्यात्मक संकेत मिलने की उम्मीद है।
FAQ
इंदौर-देवास बायपास की बदहाली मामले में हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिया?
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से इंदौर-देवास बायपास पर मौके पर जाकर सड़क की वर्तमान स्थिति देखने और अगली सुनवाई में अदालत को वास्तविक स्थिति बताने को कहा है। यह निर्देश NHAI की ओर से गड्ढे भरने और समस्या दूर होने का दावा किए जाने के बाद आया। अदालत ने मौके की जांच के निष्कर्ष पर आगे क्या कार्रवाई होगी, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
NHAI ने इंदौर-देवास बायपास पर सुधार को लेकर क्या दावा किया?
NHAI ने सुनवाई के दौरान तस्वीरें पेश करते हुए कहा कि बायपास के गड्ढे भर दिए गए हैं और अब वहां समस्या नहीं है। इस दावे की वास्तविक स्थिति जानने के लिए याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर निरीक्षण करने को कहा गया है। मरम्मत के सभी काम पूरे हुए हैं या नहीं और दूसरी सुरक्षा संबंधी शिकायतों का समाधान हुआ है या नहीं, यह अभी सत्यापन का विषय है।
इंदौर-देवास बायपास की बदहाली को लेकर याचिका कब दायर हुई थी?
मातृ फाउंडेशन की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने वर्ष 2021 में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें सड़क के गड्ढों, खराब सर्विस रोड, खुले ड्रेनेज, जलभराव, स्ट्रीट लाइट की समस्याओं और दुर्घटना संभावित स्थानों जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान सड़क सुधार और सड़क सुरक्षा से संबंधित निर्देशों के अनुपालन पर भी सवाल सामने आए हैं।
इंदौर-देवास बायपास की सड़क खराब होने से वाहन चालकों को क्या जोखिम हो सकते हैं?
गड्ढों और असमान सड़क सतह से वाहन का संतुलन बिगड़ सकता है, अचानक ब्रेक लगाने की स्थिति बन सकती है और पीछे से आने वाले वाहनों से टक्कर का जोखिम बढ़ सकता है। जलभराव में गड्ढों का अंदाजा लगाना कठिन हो सकता है। खराब रोशनी और अव्यवस्थित यातायात भी परेशानी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, किसी खास दुर्घटना का कारण तय करने के लिए अलग से तथ्यात्मक जांच जरूरी होती है।
याचिकाकर्ता ने महिला की मौत के बारे में क्या कहा?
पिछली सुनवाई से पहले याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि बायपास पर गड्ढे में गिरने से एक महिला की मौत हुई है। उपलब्ध जानकारी में घटना की तारीख, महिला की पहचान और दुर्घटना की जांच से जुड़ा विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए इस बात को याचिकाकर्ता के कथन के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है; इसे अदालत का स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
इंदौर-देवास बायपास मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को निर्धारित है। उससे पहले याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर सड़क की मौजूदा स्थिति देखने और अदालत को जानकारी देने को कहा गया है। सुनवाई में आगे क्या तथ्य सामने आते हैं, उसके आधार पर अदालत सड़क सुधार और पहले दिए गए निर्देशों के पालन के संबंध में आगे की कार्यवाही कर सकती है।
सड़क की मरम्मत के बाद भी किन व्यवस्थाओं की जांच जरूरी है?
गड्ढे भरने के अलावा सर्विस रोड की हालत, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, चेतावनी संकेतक और दुर्घटना संभावित स्थानों पर सुरक्षा उपायों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। सड़क की मरम्मत तभी प्रभावी मानी जा सकती है जब वह उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित आवागमन में मदद करे। इस मामले में इन सभी पहलुओं की वर्तमान स्थिति का विस्तृत आधिकारिक आकलन उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।






