देशभर में स्वच्छता के लिए पहचान बना चुके इंदौर शहर पर इन दिनों एक गंभीर और दर्दनाक संकट का साया है। भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल की आपूर्ति से फैली बीमारी और मौतों ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। अब तक इस त्रासदी में 18 लोगों की जान जा चुकी है और 3200 से अधिक नागरिक बीमार हो चुके हैं। इस मामले पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मंगलवार को इस मामले से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने कहा कि इंदौर में उत्पन्न यह स्वास्थ्य संकट केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सरकार की असंवेदनशीलता को भी उजागर करता है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि स्वच्छ पानी हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। ऐसी स्थिति में सरकार का ढुलमुल रवैया स्वीकार्य नहीं है।
दुनिया भर में इंदौर की छवि को नुकसान
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि जिस इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है, वही शहर आज दूषित पानी के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। अदालत ने कहा कि यह स्थिति न केवल दुखद है, बल्कि शर्मनाक भी है। स्वच्छता की मिसाल बने शहर में अगर लोग पानी पीकर मर रहे हैं, तो यह प्रशासन और सरकार दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।
पूरे शहर में दूषित पानी की आशंका
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह और भी अधिक चिंताजनक है कि दूषित पानी की समस्या केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकती। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पूरे शहर में इसका असर फैल सकता है। अदालत ने निर्देश दिए कि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त और दीर्घकालिक उपाय किए जाएं।
मुख्य सचिव से जवाब तलब
खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा 2 जनवरी को पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट पर असंतोष जताया और इसे अपर्याप्त बताया। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह एक नई और विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे, जिसमें अब तक की गई कार्रवाई और भविष्य की योजना स्पष्ट रूप से बताई जाए। इसके साथ ही मुख्य सचिव को 15 जनवरी को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के आदेश दिए गए हैं।
आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी, तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेंगे। अदालत ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि राज्य स्तर पर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि भविष्य में किसी अन्य शहर या क्षेत्र में इस तरह का संकट पैदा न हो।
वर्षों से अनसुनी शिकायतें
याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत को बताया कि भागीरथपुरा की स्थिति एक दिन में नहीं बिगड़ी। वर्षों से वहां दूषित पानी की शिकायतें की जा रही थीं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी गंभीरता नहीं दिखाई। यहां तक कि दो साल पहले स्थानीय पार्षद ने भी इस समस्या को उठाया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अदालत में यह भी कहा गया कि नगर निगम और प्रशासन के बीच समन्वय की भारी कमी है।
प्रशासन पर गंभीर आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि हर बार सरकार इंदौर में नए आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति कर देती है, जो शहर को अस्थायी चारागाह की तरह देखते हैं। वे कुछ समय के लिए आते हैं, अपनी प्राथमिकताएं तय करते हैं और फिर स्थानांतरित हो जाते हैं। इस दौरान जनता की समस्याएं फाइलों में ही दबकर रह जाती हैं। महीनों तक फाइलें अधिकारियों के दफ्तरों में अटकी रहती हैं और जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं होता।
18वीं मौत ने बढ़ाई चिंता
मंगलवार को इस संकट ने और भयावह रूप ले लिया, जब 80 वर्षीय हरकुंवर ग्रैरईया की मौत हो गई। वह कुछ दिनों के लिए भागीरथपुरा में अपने बेटे के घर आई थीं। दूषित पानी पीने से उनकी तबीयत बिगड़ी और इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। इसके साथ ही इस कांड में मरने वालों की संख्या 18 हो गई। मंगलवार को ही 20 से अधिक नए मरीज सामने आए, जबकि 99 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। इनमें से 16 की हालत गंभीर बनी हुई है और वे आईसीयू में इलाजरत हैं।
स्वास्थ्य तंत्र पर भारी दबाव
अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की संख्या ने स्वास्थ्य तंत्र पर भी भारी दबाव डाल दिया है। डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को दिन-रात काम करना पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन ने अस्थायी चिकित्सा शिविर लगाए हैं, लेकिन स्थिति अब भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं है।
प्रदेश में पहली बार ऐसा संकट
भोपाल से इंदौर पहुंची स्टेट इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम की टीम के प्रमुख डॉक्टर भागवत भार्गव ने बताया कि भागीरथपुरा जैसा स्वास्थ्य संकट मध्यप्रदेश में पहली बार सामने आया है। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में, इतने सीमित क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में मरीजों का सामने आना और महामारी जैसी स्थिति बन जाना बेहद असाधारण और चिंताजनक है।
महामारी जैसी स्थिति
डॉक्टरों के अनुसार, दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियों ने तेजी से लोगों को अपनी चपेट में लिया है। यह स्थिति लगभग एपिडेमिक जैसी बन गई है, जिसे नियंत्रित करने के लिए त्वरित और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल आपूर्ति प्रणाली की तुरंत जांच और सुधार नहीं किया गया, तो स्थिति और बिगड़ सकती है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज
इस गंभीर मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को भागीरथपुरा का दौरा किया। इस दल में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और इंदौर प्रभारी उषा नायडू शामिल थे। उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और हालात का जायजा लिया।
इस्तीफे की मांग
कांग्रेस नेताओं ने इस दौरान कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इस्तीफे की मांग भी की। उनका कहना था कि यह संकट प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता का नतीजा है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराती रहेंगी।
जनता में आक्रोश और डर
भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों में गहरा आक्रोश और डर का माहौल है। लोग अब भी आशंकित हैं कि कहीं उनके घरों तक पहुंच रहा पानी सुरक्षित है या नहीं। कई परिवारों ने पानी उबालकर पीना शुरू कर दिया है, तो कुछ लोग बोतलबंद पानी पर निर्भर हो गए हैं।
स्वच्छता मॉडल पर सवाल
इंदौर को वर्षों से स्वच्छता मॉडल के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन इस जल संकट ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल साफ सड़कों और कचरा प्रबंधन से शहर स्वस्थ बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छता के साथ-साथ सुरक्षित पेयजल व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
हाईकोर्ट की भूमिका और उम्मीद
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का सख्त रुख इस पूरे मामले में एक उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि यदि सरकार और प्रशासन ने जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो न्यायिक हस्तक्षेप और भी कठोर हो सकता है।
निष्कर्ष
इंदौर का दूषित जल संकट केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि शहरी प्रशासन, स्वास्थ्य व्यवस्था और शासन की संवेदनशीलता की बड़ी परीक्षा है। 18 मौतें और हजारों बीमार लोग इस बात की गवाही हैं कि लापरवाही कितनी घातक हो सकती है। हाईकोर्ट की सख्ती ने सरकार को चेतावनी दी है कि अब और देर की गुंजाइश नहीं है। यदि समय रहते ठोस कदम उठाए गए, तो शायद भविष्य में किसी और शहर को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।
