जापान ने भारतीय आम आयात रोका तो इसका असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस फैसले ने भारत के आम किसानों, निर्यातकों और कृषि कारोबार से जुड़े हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा दी। भारतीय आम केवल एक फल नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान, किसानों की मेहनत और वैश्विक बाजार में भारत की कृषि प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में जापान जैसे अनुशासित और उच्च गुणवत्ता मानकों वाले बाजार का अचानक दरवाजा बंद करना भारत के लिए एक गंभीर संकेत माना जा रहा है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत में आम का निर्यात सीजन अपने चरम पर होता है। अप्रैल से जून के बीच देश से दुनिया के कई हिस्सों में अल्फांसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी लोकप्रिय किस्में भेजी जाती हैं। जापानी बाजार में इन भारतीय आमों की खास मांग रही है। लेकिन अब फ्यूमिगेशन और पौधों की सुरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं में कमियां सामने आने के बाद यह व्यापार अचानक रुक गया है। इससे न केवल निर्यातकों की योजनाएं प्रभावित हुई हैं बल्कि किसानों को भी भविष्य की कमाई को लेकर चिंता सताने लगी है।
जापान का फैसला क्यों महत्वपूर्ण
जापान दुनिया के उन देशों में गिना जाता है जहां खाद्य गुणवत्ता और जैव सुरक्षा को लेकर बेहद सख्त नियम लागू होते हैं। वहां किसी भी कृषि उत्पाद के आयात से पहले कई स्तरों पर जांच की जाती है। यदि कहीं भी मानकों में कमी पाई जाती है तो संबंधित देश के उत्पादों पर तुरंत रोक लगा दी जाती है।
भारत के लिए जापान भले सबसे बड़ा आम खरीदार न हो, लेकिन यह एक प्रतिष्ठित बाजार माना जाता है। जापानी उपभोक्ता गुणवत्ता को लेकर बेहद जागरूक हैं और वहां भारतीय आमों की खास पहचान बन चुकी थी। यही वजह है कि जापान ने भारतीय आम आयात रोका तो इसका संदेश दूसरे देशों तक भी गया। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो अन्य बाजार भी अतिरिक्त सख्ती अपना सकते हैं।
इस फैसले ने भारत के कृषि निर्यात तंत्र की तैयारियों और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। आखिर ऐसी क्या खामियां थीं जिनकी वजह से जापान जैसे देश को इतना कठोर कदम उठाना पड़ा।
फ्यूमिगेशन में मिली कमियां
पूरे विवाद की जड़ फ्यूमिगेशन प्रक्रिया को माना जा रहा है। फ्यूमिगेशन वह प्रक्रिया होती है जिसमें जहरीली गैसों का उपयोग करके फलों और कृषि उत्पादों में मौजूद कीटों को खत्म किया जाता है। यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय निर्यात के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है क्योंकि कई देशों को डर रहता है कि आयातित फलों के साथ हानिकारक कीट उनके कृषि तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
जापानी निरीक्षण अधिकारियों ने मार्च में भारत के कुछ ट्रीटमेंट सेंटरों का दौरा किया था। इसी दौरान उन्होंने कई तकनीकी कमियां पाई। बताया जा रहा है कि कुछ केंद्रों पर परिचालन मानकों का पालन पूरी तरह नहीं किया जा रहा था। इसके बाद जापानी अधिकारियों ने 25 मार्च के बाद जारी भारतीय निरीक्षण प्रमाणपत्रों वाली खेप स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इस फैसले ने अचानक भारतीय निर्यातकों को मुश्किल में डाल दिया। जिन आमों की खेप तैयार हो चुकी थी, वे अब जापान नहीं भेजी जा सकीं। कई कारोबारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
किसानों की बढ़ी बेचैनी
भारत में आम सिर्फ एक मौसमी फल नहीं बल्कि लाखों किसानों की आजीविका का आधार है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में किसान आम की खेती पर निर्भर हैं। जापान जैसे बाजारों में निर्यात होने वाले आमों की गुणवत्ता अलग स्तर की होती है और इनकी कीमत भी घरेलू बाजार से अधिक मिलती है।
जब जापान ने भारतीय आम आयात रोका तो किसानों के बीच यह डर बढ़ गया कि कहीं इसका असर आने वाले वर्षों में भी न पड़े। कई किसानों ने निर्यातकों की मांग के अनुसार अपने बागानों में विशेष देखभाल की थी। महंगे पैकेजिंग मानकों और गुणवत्ता सुधार पर अतिरिक्त खर्च किया गया था। अब यदि निर्यात बाधित होता है तो इन निवेशों का लाभ नहीं मिल पाएगा।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाना वर्षों की मेहनत से संभव होता है, लेकिन एक छोटी चूक पूरी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।
माल ढुलाई बनी नई मुसीबत
भारतीय आम निर्यातकों की परेशानी केवल जापान तक सीमित नहीं है। हवाई माल-ढुलाई की तेजी से बढ़ती लागत ने भी कारोबार को मुश्किल में डाल दिया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक ईंधन कीमतों में उछाल के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की लागत काफी बढ़ गई है।
निर्यातकों का कहना है कि पिछले साल जहां एक किलोग्राम आम को विदेश भेजने की लागत लगभग ढाई सौ से साढ़े तीन सौ रुपये तक थी, वहीं अब यह लगभग छह सौ रुपये के करीब पहुंच चुकी है। इससे लाभ का मार्जिन तेजी से घट गया है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई बार एयरलाइंस जल्दी खराब होने वाले फलों की बजाय दवाओं और महंगे औद्योगिक सामानों को प्राथमिकता दे रही हैं। इससे आम की खेप समय पर नहीं पहुंच पाती और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
भारतीय आमों की वैश्विक पहचान
भारतीय आम दुनिया भर में अपने स्वाद, खुशबू और विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। अल्फांसो को आमों का राजा कहा जाता है, जबकि केसर अपनी मिठास के कारण विदेशी बाजारों में लोकप्रिय है। लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी किस्मों की भी अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बढ़ रही थी।
भारत लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े आम उत्पादक देशों में शामिल रहा है। अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, नीदरलैंड और सऊदी अरब जैसे बाजार भारतीय आमों के बड़े खरीदार हैं। ऐसे में जापान का फैसला भले सीधे कुल निर्यात को बहुत बड़ा झटका न दे, लेकिन इसकी प्रतीकात्मक अहमियत काफी बड़ी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करता है तो भविष्य में निर्यात और बढ़ सकता है। लेकिन इसके लिए सरकारी एजेंसियों, किसानों और निर्यातकों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
सरकारी एजेंसियों पर सवाल
इस पूरे मामले के बाद सरकारी एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। फाइटोसैनिटरी प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्थाओं और निर्यात प्रबंधन एजेंसियों से जवाब मांगा जा रहा है कि आखिर निरीक्षण के दौरान ऐसी कमियां कैसे रह गईं।
कृषि क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर नहीं बल्कि गुणवत्ता प्रबंधन पर भी समान ध्यान देना होगा। वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और विकसित देश गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते।
यदि भारतीय निर्यात प्रणाली समय रहते आधुनिक तकनीकों और कठोर निगरानी को नहीं अपनाती तो भविष्य में और भी बाजार जोखिम में पड़ सकते हैं।
निर्यातकों की उम्मीदें कायम
हालांकि स्थिति चुनौतीपूर्ण है, लेकिन निर्यातकों को उम्मीद है कि भारत और जापान के बीच बातचीत से समाधान निकल सकता है। बताया जा रहा है कि भारतीय अधिकारी जापानी समकक्षों के साथ संपर्क में हैं और तकनीकी खामियों को दूर करने की कोशिश की जा रही है।
निर्यातकों का मानना है कि यदि निरीक्षण प्रक्रियाओं को पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाए तो जापानी बाजार दोबारा खुल सकता है। लेकिन इसके लिए तेजी से कार्रवाई करनी होगी क्योंकि आम का मौसम सीमित समय के लिए होता है।
कई कारोबारी यह भी मानते हैं कि यह संकट भारतीय कृषि निर्यात व्यवस्था को सुधारने का अवसर बन सकता है। यदि गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होता है तो भविष्य में भारत को और अधिक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में देखा जाएगा।
भविष्य की राह कठिन लेकिन संभव
जापान ने भारतीय आम आयात रोका तो इससे स्पष्ट संदेश मिला कि वैश्विक बाजार में सिर्फ उत्पादन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि गुणवत्ता, सुरक्षा और भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। भारत जैसे विशाल कृषि देश के लिए यह चुनौती भी है और सीख भी।
आने वाले समय में भारत को आधुनिक कृषि प्रसंस्करण केंद्र, बेहतर निरीक्षण व्यवस्था और वैज्ञानिक मानकों पर आधारित निर्यात तंत्र विकसित करना होगा। किसानों को भी अंतरराष्ट्रीय नियमों और गुणवत्ता मानकों की जानकारी देना जरूरी होगा।
यदि भारत इस संकट से सीख लेकर अपने कृषि निर्यात तंत्र को मजबूत करता है तो भविष्य में भारतीय आम फिर दुनिया के सबसे भरोसेमंद और पसंदीदा फलों में शामिल रहेंगे। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत समय रहते जापान का भरोसा दोबारा जीत पाएगा या यह झटका लंबे समय तक भारतीय आम कारोबार को प्रभावित करेगा।
