डोनाल्ड ट्रंप का नाम आते ही दुनिया की राजनीति में एक असहज चुप्पी छा जाती है। कभी वेनेजुएला, कभी ईरान, कभी गाजा, तो कभी NATO और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच—ट्रंप की बयानबाज़ी और फैसले अब किसी पूर्वानुमान में नहीं समाते। वे आज किसी देश को खुली धमकी देते हैं और अगले ही दिन उसी मुद्दे पर यू-टर्न लेते दिखाई देते हैं। इसी अस्थिर, आक्रामक और अनिश्चित व्यवहार को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विशेषज्ञ ‘मैडमैन थ्योरी’ या ‘पागलों वाला सिद्धांत’ कहते हैं।

बीते एक साल में ट्रंप की विदेश नीति ने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं, राजनयिकों और सैन्य विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है। अमेरिका का यह राष्ट्रपति कभी अपने सहयोगियों पर भी उसी अंदाज़ में बरसता है, जैसे अपने विरोधियों पर। यही कारण है कि अब यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या ट्रंप जानबूझकर खुद को अनप्रिडिक्टेबल दिखा रहे हैं, या फिर वे सचमुच एक खतरनाक कूटनीतिक प्रयोग कर रहे हैं।
मैडमैन थ्योरी का मूल विचार यह है कि सामने वाले को यह विश्वास दिला दिया जाए कि नेता किसी भी हद तक जा सकता है, यहां तक कि परमाणु युद्ध जैसी विनाशकारी कार्रवाई भी कर सकता है। इस भय के कारण विरोधी देश समझौते के लिए मजबूर हो जाए। ट्रंप के हालिया व्यवहार को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के संकेत देने के बाद अचानक ग्रीनलैंड और यूरोप को टैरिफ की धमकी देना, फिर उसी मुद्दे पर नरमी दिखाना, दावोस जैसे मंच से ईरान पर हमले से इनकार करना और बाद में अमेरिकी नौसेना को अलर्ट मोड में डाल देना—ये सभी घटनाएं इस सिद्धांत की ओर इशारा करती हैं।
ट्रंप की खासियत यह है कि वे अपने ‘पागलपन’ को छुपाते नहीं, बल्कि खुलेआम प्रदर्शित करते हैं। सोशल मीडिया, प्रेस कॉन्फ्रेंस और चुनावी रैलियों में वे ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, जो पारंपरिक कूटनीति के सभी नियमों को तोड़ती है। यही बात दुनिया को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
मैडमैन थ्योरी कोई नई अवधारणा नहीं है। इसकी जड़ें शीत युद्ध के दौर में मिलती हैं, जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु तनाव चरम पर था। 1969 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने वियतनाम युद्ध के दौरान इस सिद्धांत का प्रयोग किया था। उनका उद्देश्य था उत्तर वियतनाम और सोवियत नेतृत्व को यह विश्वास दिलाना कि अमेरिका किसी भी समय परमाणु हमला कर सकता है।
हालांकि निक्सन और ट्रंप के बीच एक बड़ा अंतर है। निक्सन पर्दे के पीछे यह खेल खेलते थे, जबकि ट्रंप इसे खुले मंच पर खेल रहे हैं। यही वजह है कि आज की दुनिया ट्रंप को गंभीरता से लेने में हिचकिचा रही है।
इतिहास गवाह है कि इस तरह की रणनीति कुछ समय के लिए डर और दबाव पैदा कर सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम खतरनाक होते हैं। उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन, इराक के सद्दाम हुसैन और लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी जैसे नेता भी इसी तरह की नीतियों पर चले। शुरुआत में वे ताकतवर लगे, लेकिन अंत में उनका अंजाम दुनिया ने देखा।
ट्रंप की नीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी भी अब उस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। NATO देशों में असहजता है, यूरोप अमेरिका की मंशा पर सवाल उठा रहा है और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका कमजोर होती दिख रही है।
ईरान के मामले में स्थिति और भी जटिल हो गई है। अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती, लगातार बदलते बयान और प्रतिबंधों की धमकी ने पश्चिम एशिया को फिर से अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो किसी भी छोटी चिंगारी से बड़ा संघर्ष भड़क सकता है।
मैडमैन थ्योरी का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि जब कोई नेता बार-बार धमकी देता है और फिर पीछे हटता है, तो उसकी विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। इसके बाद कोई भी उसकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेता। यही स्थिति आज ट्रंप के साथ बनती दिख रही है।
दुनिया इस समय एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहां नेतृत्व की स्थिरता और भरोसा सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन ट्रंप की राजनीति इसके ठीक उलट दिशा में जाती नजर आ रही है। यही कारण है कि वैश्विक मंच पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या ‘पागलपन’ वाकई कूटनीति का रास्ता हो सकता है, या फिर यह दुनिया को एक नई अराजकता की ओर ले जाएगा।
