मीथेन उत्सर्जन को लेकर लंबे समय से भारत पर दुनिया के बड़े प्रदूषक देशों में शामिल होने का आरोप लगाया जाता रहा है। धान की खेती, पशुपालन, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा क्षेत्र को इसकी सबसे बड़ी वजह बताया जाता रहा। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जक मानती रही हैं। लेकिन अब एक भारतीय वैज्ञानिक अध्ययन ने इस पूरी बहस को नई दिशा दे दी है। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान भोपाल के शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट डेटा, वैज्ञानिक मॉडलिंग और जमीनी आंकड़ों के आधार पर यह साबित किया है कि भारत का वास्तविक मीथेन उत्सर्जन वैश्विक दावों से काफी कम है।

यह अध्ययन केवल आंकड़ों का सुधार नहीं है, बल्कि भारत की जलवायु नीति, अंतरराष्ट्रीय छवि और भविष्य की पर्यावरणीय रणनीतियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित है, तब मीथेन उत्सर्जन के सही आकलन का महत्व और बढ़ जाता है। यही वजह है कि यह शोध सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि नीति निर्माण का मजबूत आधार भी बन सकता है।
मीथेन उत्सर्जन पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के दावे
पिछले कई वर्षों से वैश्विक संस्थाएं यह दावा करती रही हैं कि भारत हर साल लगभग 31 टेराग्राम यानी 31 मिलियन टन मीथेन उत्सर्जित करता है। इसी आधार पर भारत को दुनिया के सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जक देशों में गिना जाता रहा है। यह आंकड़ा अक्सर जलवायु वार्ताओं, अंतरराष्ट्रीय मंचों और पर्यावरणीय रिपोर्टों में उद्धृत किया जाता रहा।
इन दावों का असर केवल छवि तक सीमित नहीं रहता। जब किसी देश को बड़े उत्सर्जक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ता है। उसे अधिक सख्त जलवायु प्रतिबद्धताओं, उत्सर्जन नियंत्रण योजनाओं और वैश्विक जवाबदेही के दायरे में रखा जाता है।
भारत के मामले में भी यही हुआ। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण धान की खेती और पशुपालन को लगातार संदेह की नजर से देखा गया। यह धारणा बनाई गई कि भारत का ग्रामीण ढांचा ही मीथेन उत्सर्जन की सबसे बड़ी वजह है।
लेकिन सवाल हमेशा यह रहा कि क्या ये आंकड़े वास्तव में भारत की स्थिति को सही ढंग से दर्शाते हैं।
मीथेन उत्सर्जन पर IISER भोपाल का नया शोध
अब इसी सवाल का जवाब IISER भोपाल के वैज्ञानिकों ने दिया है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने लंबे समय तक सैटेलाइट आधारित अवलोकन, वायुमंडलीय मॉडलिंग और क्षेत्रीय आंकड़ों का विश्लेषण किया। उनका निष्कर्ष चौंकाने वाला था।
शोध के अनुसार भारत का वार्षिक मीथेन उत्सर्जन 21.9 से 24.9 टेराग्राम के बीच है। यानी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के दावों से काफी कम। यह अंतर छोटा नहीं है। लगभग 6 से 9 टेराग्राम का अंतर वैश्विक जलवायु विमर्श में बहुत बड़ा महत्व रखता है।
इसका अर्थ है कि भारत पर जो अतिरिक्त पर्यावरणीय दबाव बनाया जाता रहा, उसका आधार पूरी तरह सटीक नहीं था। यह अध्ययन भारत के लिए एक वैज्ञानिक जवाब के रूप में सामने आया है।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स में प्रकाशित हुआ है, जो वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में विश्वसनीय मंच माना जाता है। इससे इस अध्ययन की गंभीरता और प्रमाणिकता और मजबूत होती है।
मीथेन उत्सर्जन क्यों है इतना महत्वपूर्ण
जब भी जलवायु परिवर्तन की बात होती है, आमतौर पर कार्बन डाइऑक्साइड का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन मीथेन उत्सर्जन का प्रभाव कई मामलों में उससे भी अधिक गंभीर होता है।
मीथेन एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। यह कम समय में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक गर्मी को वातावरण में रोक सकती है। यही कारण है कि अल्पकालिक ग्लोबल वार्मिंग में इसका प्रभाव बेहद तेज होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि मीथेन उत्सर्जन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जाए, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक तापमान वृद्धि को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। यही वजह है कि आज दुनिया की जलवायु रणनीतियों में मीथेन नियंत्रण को प्राथमिकता दी जा रही है।
इसलिए इसका सही मापन केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि वैश्विक अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।
मीथेन फ्लक्स का सही आकलन क्यों जरूरी
मीथेन उत्सर्जन को समझने के लिए केवल कुल मात्रा जानना पर्याप्त नहीं होता। यह भी जानना जरूरी है कि कौन से क्षेत्र से कितनी गैस निकल रही है। इसी दर को वैज्ञानिक भाषा में मीथेन फ्लक्स कहा जाता है।
यदि मीथेन फ्लक्स का सही अनुमान नहीं होगा, तो नीति निर्माता गलत क्षेत्रों पर संसाधन खर्च कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी क्षेत्र को अत्यधिक उत्सर्जक मान लिया जाए जबकि वास्तविकता अलग हो, तो पूरी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
IISER के शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने केवल कुल उत्सर्जन का नया अनुमान नहीं दिया, बल्कि संभावित हॉटस्पॉट क्षेत्रों की पहचान का रास्ता भी दिखाया।
इससे कृषि, कचरा प्रबंधन, ऊर्जा और शहरी अपशिष्ट नियंत्रण के लिए अधिक लक्षित नीतियां बनाई जा सकती हैं।
मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत कौन हैं
भारत में मीथेन उत्सर्जन के कई स्रोत हैं और इन्हें समझे बिना समाधान संभव नहीं है।
धान की खेती सबसे चर्चित स्रोतों में से एक है। लंबे समय तक पानी भरे खेतों में ऑक्सीजन की कमी होती है, जिससे सूक्ष्मजीव मीथेन उत्पन्न करते हैं।
पशुपालन दूसरा बड़ा कारण माना जाता है। विशेष रूप से गाय और भैंस जैसे जुगाली करने वाले पशु पाचन प्रक्रिया के दौरान मीथेन छोड़ते हैं।
कचरा प्रबंधन और लैंडफिल भी बड़े स्रोत हैं। शहरों में ठोस कचरे के ढेर और अपशिष्ट निपटान की खराब व्यवस्था से मीथेन निकलती है।
तेल और गैस उत्पादन, पाइपलाइन लीकेज और औद्योगिक गतिविधियां भी इसमें योगदान देती हैं।
गीली जमीनें और प्राकृतिक आर्द्र क्षेत्र भी प्राकृतिक स्रोत हैं, जिन्हें अक्सर कम आंका जाता है।
यही कारण है कि मीथेन उत्सर्जन को केवल कृषि से जोड़कर देखना अधूरा दृष्टिकोण है।
भारत की जलवायु नीति पर क्या असर पड़ेगा
यह शोध भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में एक मजबूत आधार बन सकता है। जब उत्सर्जन के आंकड़े सटीक होते हैं, तभी उचित जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि विकासशील देशों पर जलवायु बोझ का आकलन न्यायपूर्ण होना चाहिए। यदि मीथेन उत्सर्जन के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं, तो इससे नीति और वित्तीय दबाव दोनों बढ़ते हैं।
अब यह अध्ययन भारत को तथ्य आधारित तर्क देने की क्षमता देता है। इससे जलवायु समझौतों, कार्बन फाइनेंस, तकनीकी सहयोग और वैश्विक पर्यावरणीय चर्चाओं में भारत की स्थिति मजबूत हो सकती है।
यह शोध यह भी बताता है कि समाधान केवल आरोप लगाने से नहीं, बल्कि सटीक विज्ञान से निकलता है।
मीथेन उत्सर्जन कम करने के लिए क्या किए जा सकते हैं कदम
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत का उत्सर्जन अनुमान से कम जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चिंता समाप्त हो गई। नियंत्रण अभी भी आवश्यक है।
धान की खेती में वैकल्पिक सिंचाई तकनीक अपनाई जा सकती है, जिससे पानी की बचत के साथ मीथेन भी कम होगी।
पशुपालन में बेहतर चारा प्रबंधन और वैज्ञानिक पद्धतियां मददगार हो सकती हैं।
कचरा प्रबंधन में आधुनिक लैंडफिल सिस्टम, बायोगैस प्लांट और जैविक अपशिष्ट प्रसंस्करण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
तेल और गैस क्षेत्र में लीक मॉनिटरिंग और पाइपलाइन निरीक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण है सैटेलाइट निगरानी और रियल टाइम डेटा सिस्टम, ताकि मीथेन उत्सर्जन का लगातार मूल्यांकन हो सके।
वैश्विक तापमान वृद्धि को धीमा करने में मदद
मीथेन नियंत्रण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसका असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई देता है। कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में मीथेन का वायुमंडलीय जीवनकाल कम होता है, इसलिए इसे घटाने पर तापमान वृद्धि की रफ्तार जल्दी धीमी की जा सकती है।
यही कारण है कि दुनिया भर में जलवायु विशेषज्ञ मीथेन को “फास्ट एक्शन क्लाइमेट टारगेट” मानते हैं।
यदि भारत अपने वास्तविक मीथेन उत्सर्जन को और बेहतर तरीके से ट्रैक कर सके, तो वह न केवल अपनी जलवायु जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभा सकेगा, बल्कि वैश्विक समाधान का नेतृत्व भी कर सकता है।
यह शोध क्यों है भारत के लिए बड़ी उपलब्धि
अक्सर वैश्विक रिपोर्टों में विकासशील देशों के बारे में अनुमान आधारित निष्कर्ष सामने आते हैं। लेकिन इस बार भारत ने अपने वैज्ञानिक डेटा से जवाब दिया है।
यह केवल एक शोध पत्र नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का उदाहरण है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत केवल वैश्विक रिपोर्टों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि विश्वसनीय वैज्ञानिक ज्ञान का निर्माता भी है।
IISER भोपाल के इस अध्ययन ने दिखाया है कि स्थानीय शोध संस्थान अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं।
यही वह दिशा है जिसमें भविष्य की जलवायु नीति को आगे बढ़ना होगा।
