मध्यप्रदेश में तेजी से फैलती आबादी और अनियोजित शहरीकरण ने राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। शहरों की सीमाएं अब गांवों तक फैल चुकी हैं। शहरी सुविधाओं की चाहत में कई डेवलपर्स और भू-माफिया गांवों की जमीनों पर कॉलोनियां काटकर बेचने लगे हैं। इन अवैध कॉलोनियों के विस्तार ने न केवल योजनाबद्ध विकास को बाधित किया है बल्कि जनसुविधाओं पर भी गहरा असर डाला है। यही कारण है कि अब सरकार ने इस अनियंत्रित विकास पर लगाम कसने का निर्णय लिया है।

इस दिशा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में हुई कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रदेश में अवैध कॉलोनियों के विकास पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए। सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी नवनिर्मित अवैध कॉलोनियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। सरकार का मकसद साफ है, प्रदेश में निर्माण कार्य केवल विधिसम्मत और योजनाबद्ध तरीके से हो।
अवैध कॉलोनियों के खिलाफ संशोधित कानून
नगरीय विकास विभाग बीते डेढ़ वर्ष से कानून में संशोधन के मसौदे पर काम कर रहा था, जो अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है। बदलते परिदृश्य को देखते हुए कानून के दायरे को पहले से ज्यादा व्यापक बनाने का निर्णय लिया गया है। अब यह कानून उन ग्रामीण क्षेत्रों पर भी लागू होगा जो शहरों की सीमाओं से लगे होते हैं और जहां अवैध निर्माण तेजी से बढ़ रहे हैं।
सरकार इस संशोधित नियम में कठोर दंडात्मक प्रावधान जोड़ रही है। आज तक जहाँ अवैध कॉलोनाइजरों पर अधिकतम दस लाख रुपये तक का जुर्माना होता था, अब यह राशि बढ़ाकर पचास लाख रुपये कर दी जाएगी। इतना ही नहीं, जेल की सजा का दायरा भी कठोर किया जा रहा है। वर्तमान में तीन वर्ष न्यूनतम और दस वर्ष अधिकतम सजा का प्रावधान है, लेकिन अब इसे बढ़ाते हुए न्यूनतम सात वर्ष की सजा का प्रस्ताव रखा गया है।
सिर्फ बिल्डर ही नहीं, जन-प्रतिनिधि भी जिम्मेदार
इस संशोधित कानून में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि इसमें केवल बिल्डर्स या डेवलपर्स ही नहीं, बल्कि चुने हुए जनप्रतिनिधि जैसे पार्षद और सरपंच की भी जिम्मेदारी तय की गई है। यदि किसी क्षेत्र में अवैध कॉलोनी बनाई जा रही है और इसकी जानकारी संबंधित जनप्रतिनिधि को मिलती है, तो उसे तुरंत नगरीय निकाय या प्रशासन को सूचित करना होगा। सूचना मिलने के बाद अफसरों को तय समय सीमा में कार्रवाई करनी होगी। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो उन पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
नोटिस से ध्वस्तीकरण तक की समय सीमा
अवैध कॉलोनियों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया अधिक संगठित और समयबद्ध की जाएगी। निकायों को निर्देश दिया जाएगा कि अवैध निर्माण की जानकारी मिलने के 15 दिनों के भीतर नोटिस जारी करें। यदि कॉलोनाइजर निर्धारित समय में जमीन को मूल स्वरूप में नहीं लौटाता, तो निकाय खुद कार्रवाई करते हुए संरचनाओं को ढहा देगा और क्षेत्र को कब्जे में ले लेगा। इसके बाद वही निकाय उस भूमि पर विकास कार्य भी करेगा, जिसकी लागत भी दोषी कॉलोनाइजर से वसूली जाएगी।
टास्क फोर्स होगी निरीक्षण के लिए
हर जिले में कलेक्टर टास्क फोर्स बनाई जाएगी जो साप्ताहिक निरीक्षण कार्यक्रम के आधार पर रिपोर्ट जमा करेगी। शहरों से लगे ग्रामीण क्षेत्रों में भी नियमित सर्वे किया जाएगा। यह टास्क फोर्स अवैध निर्माण रोकने में प्रमुख भूमिका निभाएगी।
राजस्व विभाग की भूमिका
चूंकि यह कानून ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा, इसलिए राजस्व विभाग को भी इसमें शामिल किया गया है। पटवारी, आरआई, तहसीलदार और एसडीएम जैसे अधिकारी अब अवैध कॉलोनी के मामलों में जवाबदेह होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार पंचायतों की अनुमति लेकर अवैध कॉलोनियां बना दी जाती हैं। नई व्यवस्था में इस पर पूरी तरह रोक लगाने की रणनीति लागू की जाएगी।
क्यों जरूरी था यह कानून
प्रदेश के कई बड़े शहर, खासकर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में मास्टर प्लान बरसों से अटके हुए हैं। शहर की सीमाओं का विस्तार योजनाबद्ध तरीके से नहीं हुआ। ऐसे में आसपास के गांवों में तेजी से निर्माण होने लगा। सड़कें संकरी, पेयजल प्रबंधन अस्त-व्यस्त, सीवेज सिस्टम का अभाव, बिजली वितरण का दबाव, स्कूल-हॉस्पिटल जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की कमी यही सब अव्यवस्थित विकास के दुष्परिणाम हैं।
यदि स्थिति को अभी नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में शहरों पर भारी अवसंरचनात्मक संकट खड़ा हो सकता है। सरकार चाहती है कि विकास हो, लेकिन नियमों का पालन करते हुए हो। यही संशोधन इस दिशा का महत्वपूर्ण कदम है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई का राजनीतिक असर भी देखने को मिलेगा, क्योंकि ऐसे कई क्षेत्र वोट बैंक के रूप में सक्रिय हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि विकास का अधिकार सभी को है पर गैर-कानूनी तरीकों से नहीं। राज्य सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि सभी को आवास मिले लेकिन सुव्यवस्थित तरीके से और नियमानुसार।
यह भी महत्वपूर्ण है कि कई बार गरीब तबका ऐसे प्लॉट खरीद लेता है जो बाद में विवादित निकलते हैं और उनकी जीवन भर की कमाई दांव पर लग जाती है। इस कानून से ऐसी स्थितियों में भी राहत मिलेगी क्योंकि सरकार नियमों के अनुसार वैधता के दायरे का विस्तार कर रही है।
आगे की प्रक्रिया
नगरीय प्रशासन आयुक्त संकेत भोंडवे के अनुसार नियमों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वरिष्ठ सचिव समिति से मंजूरी होने के बाद इसे कैबिनेट में भेजा जाएगा। संभावना है कि अगले वर्ष नए नियम प्रभावी रूप से लागू हो जाएंगे।
