नेकलेस ऑफ डायमंड्स अब केवल एक सामरिक शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का प्रतीक बन चुका है। बीते कुछ वर्षों में चीन ने जिस तेजी से समुद्री विस्तार की नीति अपनाई, उसने एशिया की भू-राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लेकर श्रीलंका के हम्बनटोटा और म्यांमार के क्याउकप्यू तक चीन की मौजूदगी ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को गहरा किया। ऐसे समय में भारत ने भी जवाबी रणनीति तैयार की और उसका नाम सामने आया — नेकलेस ऑफ डायमंड्स।

यह रणनीति केवल बंदरगाहों का जाल नहीं है, बल्कि समुद्री सुरक्षा, आर्थिक साझेदारी, सैन्य सहयोग और क्षेत्रीय विश्वास का ऐसा मॉडल है, जो भारत को हिंद महासागर का सबसे प्रभावशाली शक्ति केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। चीन जहां ऋण और बुनियादी ढांचे के जरिए देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में ला रहा था, वहीं भारत ने साझेदारी और साझा विकास के आधार पर अपनी नई कूटनीतिक राह बनाई।
चीन की घेराबंदी से बढ़ी चिंता
चीन लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। उसकी तथाकथित ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्गों पर प्रभाव कायम करना और भारत को सामरिक रूप से दबाव में रखना माना जाता है। इस रणनीति के तहत चीन ने कई देशों में बंदरगाह, लॉजिस्टिक सुविधाएं और समुद्री निगरानी तंत्र विकसित किए।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह रही कि चीन की ये गतिविधियां केवल व्यापार तक सीमित नहीं दिखीं। चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की लगातार मौजूदगी ने संकेत दिया कि बीजिंग हिंद महासागर में स्थायी सैन्य प्रभाव चाहता है। यही कारण है कि नई दिल्ली ने इसे केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा।
नेकलेस ऑफ डायमंड्स की असली ताकत
नेकलेस ऑफ डायमंड्स रणनीति का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत ने इसमें केवल सैन्य दृष्टिकोण नहीं अपनाया। भारत ने अपने मित्र देशों के साथ भरोसे और साझा हितों पर आधारित सहयोग मॉडल तैयार किया। ईरान का चाबहार बंदरगाह, ओमान का दुक्म पोर्ट, इंडोनेशिया का सबांग पोर्ट और अफ्रीकी तटों तक भारत की बढ़ती मौजूदगी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
भारत ने इन ठिकानों के जरिए न केवल समुद्री मार्गों पर अपनी पकड़ मजबूत की, बल्कि व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को भी नया आधार दिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रणनीति चीन की आक्रामक शैली से अलग है क्योंकि भारत किसी देश पर आर्थिक दबाव बनाने के बजाय साझेदारी को प्राथमिकता देता है।
हिंद महासागर बना नई प्रतिस्पर्धा
आज हिंद महासागर दुनिया की सबसे अहम सामरिक धुरी बन चुका है। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरता है। तेल आपूर्ति, कंटेनर व्यापार और ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा के कारण यह इलाका विश्व शक्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत की भौगोलिक स्थिति उसे स्वाभाविक बढ़त देती है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से लेकर पश्चिमी तट तक भारत का समुद्री विस्तार चीन की तुलना में अधिक रणनीतिक माना जाता है। यही कारण है कि भारत अब अपनी समुद्री क्षमता को केवल रक्षा तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि उसे कूटनीति और आर्थिक प्रभाव से भी जोड़ रहा है।
भारत की नई समुद्री सोच
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्षों पहले प्रस्तुत ‘सागर’ अवधारणा ने भारत की समुद्री नीति को नई दिशा दी। इसका उद्देश्य क्षेत्र में सभी देशों की सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना था। बाद में यही सोच और विस्तृत होकर महासागर पहल में बदली, जिसने भारत की भूमिका को और व्यापक बनाया।
भारत ने महामारी के दौरान मालदीव, मॉरीशस, मेडागास्कर और सेशेल्स जैसे देशों को दवाइयां और राहत सामग्री पहुंचाकर यह संदेश दिया कि वह केवल सामरिक शक्ति नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदार भी है। इस मानवीय सहयोग ने भारत की छवि को काफी मजबूत किया।
चाबहार से बढ़ी भारत की ताकत
ईरान का चाबहार बंदरगाह नेकलेस ऑफ डायमंड्स का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देता है। पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत के लिए यह रणनीतिक अवसर बन गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार चाबहार केवल व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के मुकाबले भारत का बड़ा जवाब है। इसके जरिए भारत न केवल क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाना चाहता है, बल्कि अपनी सामरिक उपस्थिति भी मजबूत कर रहा है।
सबांग और दुक्म की अहमियत
इंडोनेशिया का सबांग पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया का विशाल व्यापार गुजरता है। भारत की यहां बढ़ती मौजूदगी चीन के लिए चिंता का कारण मानी जा रही है।
दूसरी ओर ओमान का दुक्म पोर्ट पश्चिमी हिंद महासागर में भारत की पहुंच को मजबूत करता है। भारतीय नौसेना को यहां लॉजिस्टिक सहायता मिलने से उसकी परिचालन क्षमता काफी बढ़ी है। यह बंदरगाह अरब सागर में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत बनाता है।
क्वाड से मिला रणनीतिक सहारा
भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड समूह को भी नई ऊर्जा दी है। हालांकि भारत हमेशा यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और वह किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहता, लेकिन समुद्री सुरक्षा के मुद्दे पर इन देशों के साथ सहयोग लगातार बढ़ा है।
संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, तकनीकी साझेदारी और समुद्री निगरानी तंत्र ने भारत की क्षमताओं को और मजबूत किया है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता पर नजर रखना आसान हुआ है।
फिलीपींस को ब्रह्मोस संदेश
भारत द्वारा फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति को भी नेकलेस ऑफ डायमंड्स रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह केवल हथियार निर्यात नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग का संकेत है।
दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियों से परेशान कई देश अब भारत को भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में देखने लगे हैं। इससे भारत की रक्षा कूटनीति को नई पहचान मिली है।
चीन क्यों हो रहा बेचैन
चीन की चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रह गया। वह सक्रिय रणनीतिक भूमिका निभा रहा है। हिंद महासागर में भारत की निगरानी क्षमता बढ़ने से चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर दबाव बना है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत इसी गति से अपने समुद्री नेटवर्क को मजबूत करता रहा, तो आने वाले वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन का प्रभाव सीमित हो सकता है। यही कारण है कि बीजिंग भारत की बढ़ती साझेदारियों को बेहद गंभीरता से देख रहा है।
अफ्रीका में बढ़ता प्रभाव
भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ समुद्री सहयोग भी तेज किया है। तंजानिया सहित कई देशों के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास और समुद्री सुरक्षा समझौते इसी दिशा में अहम कदम हैं।
अफ्रीका के पूर्वी तट पर भारत की सक्रियता चीन के लिए नई चुनौती मानी जा रही है। भारत यहां विकास सहयोग, प्रशिक्षण और मानवीय सहायता के जरिए अपनी विश्वसनीयता मजबूत कर रहा है।
समुद्री निगरानी का नया जाल
भारत हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों में तटीय रडार नेटवर्क स्थापित कर चुका है। इससे समुद्री गतिविधियों की निगरानी आसान हुई है। यह नेटवर्क चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य की समुद्री रणनीति केवल युद्धपोतों से तय नहीं होगी, बल्कि सूचना और निगरानी क्षमता भी उतनी ही अहम होगी। भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भारत की बदलती वैश्विक छवि
नेकलेस ऑफ डायमंड्स ने भारत की छवि को केवल क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़ाकर वैश्विक रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित कई लोकतांत्रिक राष्ट्र अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत को संतुलनकारी शक्ति मान रहे हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह विकासशील देशों के साथ बराबरी और सम्मान का व्यवहार करता है। यही वजह है कि कई छोटे देश चीन के मुकाबले भारत के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं।
भविष्य की बड़ी चुनौती
हालांकि भारत की रणनीति मजबूत दिख रही है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। चीन आर्थिक रूप से बेहद शक्तिशाली है और उसकी समुद्री क्षमता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भारत को अपनी नौसेना, समुद्री ढांचे और तकनीकी क्षमताओं में लगातार निवेश करना होगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी साझेदारियों पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति अब केवल युद्धपोतों से तय नहीं होगी, बल्कि भरोसे और आर्थिक सहयोग से भी प्रभावित होगी।
नेकलेस ऑफ डायमंड्स का बड़ा संदेश
नेकलेस ऑफ डायमंड्स आज भारत की उस नई सोच का प्रतीक बन चुका है, जिसमें सुरक्षा, विकास, साझेदारी और रणनीतिक संतुलन एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल चीन को जवाब देने की नीति नहीं, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने की व्यापक कोशिश है।
आने वाले वर्षों में यह रणनीति एशिया की भू-राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना तय है कि भारत अब समुद्री शक्ति के नए अध्याय की ओर तेजी से बढ़ चुका है और नेकलेस ऑफ डायमंड्स उसकी सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पहचान बनती जा रही है।
