दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान अक्सर अपने राजनीतिक संकटों, आतंकवाद और आर्थिक बदहाली के लिए चर्चा में रहता है। लेकिन इस बार जो सच्चाई सामने आई है, उसने पूरे मानव समाज को झकझोर कर रख दिया है। पाकिस्तान के कुछ सीमावर्ती इलाकों में “दुल्हन बाजार” नामक एक काला कारोबार चल रहा है — जहां गरीब परिवार अपनी नाबालिग बेटियों को कुछ हजारों के लालच में बेच देते हैं। यह व्यापार न केवल शादी के नाम पर धोखा है, बल्कि इसके पीछे मानव तस्करी, यौन शोषण, और अंगों की अवैध बिक्री का भयावह जाल छिपा है।

कहां लगता है ‘दुल्हन बाजार’?
यह बाजार चीन से सटे पाकिस्तान के उत्तरी और पूर्वी इलाकों, खासकर पंजाब और सिंध प्रांत के गांवों में सक्रिय है।
यहां दलालों और तथाकथित ब्रोकर्स का एक नेटवर्क है, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की आड़ में मानव तस्करी को बढ़ावा देता है। इन गांवों में ईसाई और अल्पसंख्यक समुदायों के परिवार गरीबी और भुखमरी के कारण सबसे अधिक निशाने पर हैं।
कैसे होता है सौदा?
दलाल पहले गरीब परिवारों से संपर्क करते हैं। वे उन्हें शादी, पैसा और बेहतर भविष्य का सपना दिखाते हैं। फिर वे परिवारों से 12 से 18 वर्ष की उम्र की लड़कियों की तलाश करते हैं। इन लड़कियों को “दुल्हन” बनाकर चीनी नागरिकों को बेच दिया जाता है। एक लड़की की औसत कीमत 700 से 3200 अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹62,000 से ₹2.5 लाख) तक होती है।
मगर यह शादी नहीं, एक काला सौदा है। शादी के बाद अधिकतर लड़कियों का कोई पता नहीं चलता। कई को चीन में वेश्यावृत्ति, घरेलू नौकरानी या मानव अंगों की तस्करी में धकेल दिया जाता है।
गरीबी और मजबूरी का शिकार परिवार
पाकिस्तान में लगातार बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भुखमरी ने गरीब तबकों को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। जब किसी के पास खाने को नहीं, रहने को छत नहीं, तो वह “दहेज” या “बेहतर भविष्य” के नाम पर लालच में आ जाता है। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार —
“कई मामलों में परिवारों को नहीं पता होता कि उनकी बेटियां कहां ले जाई जा रही हैं। उन्हें यह बताया जाता है कि वे चीन में एक अमीर परिवार में शादी कर रही हैं।”
लेकिन सच्चाई यह है कि उन बेटियों की वापसी अब तक किसी ने नहीं देखी।
इस व्यापार में शामिल हैं पादरी और स्थानीय दलाल
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में कई स्थानीय ईसाई पादरी और समाजसेवी संगठनों के लोग भी शामिल हैं।
वे चर्च या धर्म के नाम पर भरोसा जीतते हैं और फिर परिवारों से संपर्क करवाते हैं। एक गुप्त रिपोर्ट के अनुसार, चीन-पाकिस्तान सीमा के पास हर महीने औसतन 200 से 250 लड़कियों की बिक्री होती है।
कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
पाकिस्तान सरकार और पुलिस प्रशासन इस पर चुप हैं। कई एनजीओ ने जब रिपोर्ट दर्ज करानी चाही, तो उन्हें धमकियाँ दी गईं।
एक एनजीओ कार्यकर्ता के शब्दों में —
“हमने जब 15 लड़कियों की तलाश में एक गांव में छापा मारा, तो स्थानीय पुलिस ने ही हमें रोक लिया। कहा गया कि यह मामला ‘संवेदनशील’ है।”
यह ‘संवेदनशीलता’ असल में अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच बन गई है।
चीन में लड़कियों की डिमांड क्यों बढ़ी?
इसका कारण है चीन की वन-चाइल्ड पॉलिसी (Single Child Policy), जो 1979 से 2015 तक लागू रही। इस नीति के चलते वहां लड़कों की संख्या लड़कियों से करोड़ों ज्यादा हो गई। अब चीन में ऐसे 4 करोड़ पुरुष हैं, जिन्हें शादी के लिए दुल्हन नहीं मिल रही। इस कमी ने पाकिस्तान जैसे गरीब देशों में “ब्राइड ट्रेड” को जन्म दिया।
‘शादी’ के बाद नरक जैसी जिंदगी
कई बची हुई पीड़ित लड़कियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयान दिया है कि शादी के बाद उन्हें बंद कमरों में रखा जाता था। उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। कई लड़कियां तो दो साल के भीतर लापता हो गईं। चीन के मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह व्यापार “आधुनिक युग की गुलामी” बन चुका है।
समाज की चुप्पी और इंसानियत की हार
यह घटना केवल पाकिस्तान की नहीं — बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सामाजिक विफलता का प्रतीक है। जब एक समाज गरीबी और धर्म के नाम पर अपनी बेटियों को बेच देता है, तो वह सभ्यता अपने आप में मर चुकी होती है। यह सिर्फ महिलाओं की नहीं, मानवता की तस्करी है।
अब क्या किया जाना चाहिए?
संयुक्त राष्ट्र (UN), अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन (Amnesty International) और महिला सुरक्षा परिषद को इस मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। जरूरत है ऐसे कड़े कानूनों की, जो इस अपराध को खत्म करने के साथ-साथ पीड़ितों को सुरक्षा और पुनर्वास दे सकें।
पाकिस्तान को भी अपनी धार्मिक और सामाजिक जड़ता से ऊपर उठकर इस अमानवीय व्यापार के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
निष्कर्ष
“दुल्हन बाजार” सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के उस अंधेरे कोने का सच है, जहां मासूमियत बिकती है, इंसानियत हारती है।
जब बेटियों की कीमत तय होने लगे, तो समझिए सभ्यता का अंत शुरू हो चुका है।
