पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते बीते दो महीनों से अत्यधिक तनावपूर्ण बने हुए हैं। सीमा पर झड़पें और हवाई हमलों की घटनाओं ने दोनों देशों के बीच सुरक्षा और राजनीतिक हालात को अत्यंत जटिल बना दिया है। पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और असीम मुनीर के नेतृत्व वाली सेना ने अफगान तालिबान को एक बार फिर चेतावनी दी है। इस चेतावनी में पाकिस्तान ने तालिबान से सुलह का रास्ता अपनाने और सभी मांगों को मानने के लिए कहा है। यदि तालिबान ने इसका पालन नहीं किया, तो पाकिस्तान काबुल में सत्ता में बदलाव के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर सकता है।

पाकिस्तानी अधिकारियों और इंटेलिजेंस सोर्सेज ने इस संदेश को ‘आखिरी अल्टीमेटम’ के रूप में परिभाषित किया है। यह अल्टीमेटम तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बढ़ते हमलों और तालिबान की अनिच्छा के चलते दिया गया है। बीते महीनों में पाकिस्तानी पक्ष ने तुर्की की मध्यस्थता के तहत तालिबान से वार्ता की कोशिश की थी, लेकिन इसमें कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया। इस निराशा ने पाकिस्तान को काबुल में सीधे तौर पर शक्ति प्रदर्शित करने के कदम की ओर प्रेरित किया।
अफगान तालिबान की स्थिति को पाकिस्तान एक जियोपॉलिटिकल खतरे के रूप में भी देख रहा है। भारत के साथ अफगानिस्तान की बढ़ती नजदीकी ने इस चिंता को और अधिक बढ़ाया है। पाकिस्तान ने तालिबान विरोधी राजनीतिक और सैन्य नेटवर्क के साथ अपने संपर्क मजबूत करना शुरू कर दिए हैं। इसमें हामिद करजई, अशरफ गनी, अहमद मसूद और नॉर्दर्न अलायंस से जुड़े अन्य कमांडर शामिल हैं। पाकिस्तान ने इन नेताओं को सुरक्षित राजनीतिक मंच और संचालन के अवसर प्रदान करने की पेशकश की है।
बीते महीनों में बॉर्डर पर युद्ध जैसी परिस्थितियां पैदा हुईं। कतर और तुर्की की मध्यस्थता में सीजफायर की घोषणा हुई थी, लेकिन अब तनाव फिर से बढ़ गया है। TTP के हमलों को रोकने के लिए पाकिस्तान का कहना है कि तालिबान अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहा। वहीं, तालिबान का कहना है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं होने देगा। दोनों पक्षों के बीच यह तर्क पूरी तरह से अस्वीकृत है, और इस कारण पाकिस्तान ने हवाई हमलों की धमकी दी है।
पाकिस्तान की सेना ने सीमा पर सुरक्षा कड़ी कर दी है। ISI और अन्य खुफिया एजेंसियों ने भी अपनी गतिविधियों में वृद्धि की है। अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान विरोधी नेताओं और विपक्षी समूहों के साथ पाकिस्तानी अधिकारियों के संपर्क ने काबुल में संभावित शक्ति संघर्ष की दिशा में इशारा किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि तालिबान ने पाकिस्तान की मांगों को स्वीकार नहीं किया, तो काबुल में राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप की संभावना काफी बढ़ जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने क्षेत्रीय सुरक्षा की संवेदनशीलता को उजागर किया है। पाकिस्तान का मानना है कि तालिबान की अनिच्छा TTP के हमलों को बढ़ावा दे रही है, और इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने आवश्यक हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के विरोधी गुटों और नेताओं का समर्थन करके पाकिस्तान अपने हितों की रक्षा करना चाहता है। वहीं, तालिबान के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण दौर है, जिसमें उसे अपनी सत्ता और नियंत्रण बनाए रखना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस अल्टीमेटम ने दोनों देशों के बीच की जटिलता को और बढ़ा दिया है। यह केवल सीमा पर सैन्य तनाव नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गहन विवाद का प्रतीक है। पाकिस्तान की चेतावनी ने तालिबान को सीधे तौर पर चुनौती दी है और काबुल में संभावित शक्ति संघर्ष की संभावना को जन्म दिया है।
इस पूरे परिदृश्य में TTP का मामला सबसे संवेदनशील बनकर सामने आया है। पाकिस्तान का कहना है कि TTP के आतंकवादी अफगानिस्तान की जमीन से उनके सैनिकों और नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। इस स्थिति ने पाकिस्तान को कड़े अल्टीमेटम देने के लिए प्रेरित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि काबुल में तालिबान इस पर सही प्रतिक्रिया नहीं देता, तो पाकिस्तान द्वारा किसी प्रकार का सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप संभावित है।
पाकिस्तान-तालिबान गतिरोध ने न केवल दोनों देशों के बीच की सुरक्षा स्थिति को प्रभावित किया है, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी इसे गंभीर संकेत माना जा रहा है। अमेरिका, चीन और अन्य वैश्विक शक्तियां इस पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में काबुल और इस्लामाबाद के बीच घटनाओं का क्रम और तनावपूर्ण हो सकता है।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय मसला नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक संतुलन के लिए भी एक चुनौती बन गया है। शहबाज शरीफ सरकार और असीम मुनीर की सेना ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि यदि तालिबान ने अपनी भूमिका में सुधार नहीं किया, तो काबुल में संभावित सत्ता संघर्ष अनिवार्य हो जाएगा।
