पाकिस्तान की सेना एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में चर्चा का विषय बन गई है। इस बार वजह है उसका अरब और मुस्लिम देशों में तेजी से बढ़ता सैन्य प्रभाव, हथियार सौदे और एक ऐसे सैन्य गठबंधन की कल्पना, जिसे कई विश्लेषक “इस्लामिक NATO” कह रहे हैं। बीते कुछ महीनों में पाकिस्तान की फौज ने जिस तरह सऊदी अरब, खाड़ी देशों और अफ्रीकी मुस्लिम राष्ट्रों में अपनी मौजूदगी और प्रभाव को मजबूत किया है, उसने न केवल क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित किया है, बल्कि दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का हालिया बयान इसी बदले हुए परिदृश्य की ओर इशारा करता है। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के JF-17 लड़ाकू विमानों की अंतरराष्ट्रीय मांग तेजी से बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में हथियार निर्यात से पाकिस्तान को विदेशी कर्ज की जरूरत नहीं पड़ेगी। भले ही ख्वाजा आसिफ को अतिशयोक्तिपूर्ण बयान देने के लिए जाना जाता हो, लेकिन यह भी सच है कि पाकिस्तान का रक्षा क्षेत्र पिछले कुछ समय में अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय और आत्मविश्वासी दिखाई दे रहा है।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन का सहयोग माना जा रहा है। बीते एक दशक में चीन-पाकिस्तान रक्षा साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका दायरा अब तीसरे देशों तक फैलता दिख रहा है। JF-17 जैसे लड़ाकू विमान, जिन्हें चीन और पाकिस्तान ने मिलकर विकसित किया है, अब अरब और अफ्रीकी बाजारों में पेश किए जा रहे हैं। यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की सेना और रक्षा उद्योग एक नए दौर में प्रवेश करता नजर आता है।
अरब दुनिया में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। दशकों से पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी सऊदी अरब सहित कई खाड़ी देशों में प्रशिक्षण, सलाह और सुरक्षा सेवाओं से जुड़े रहे हैं। सऊदी सेना में पाकिस्तानी अधिकारियों की भूमिका लंबे समय से चर्चा में रही है। लेकिन हालिया समय में इस सहयोग का स्वरूप और अधिक संस्थागत और रणनीतिक होता दिख रहा है।
बीते साल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ, जिसे केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह समझौता प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, हथियार आपूर्ति और संयुक्त रणनीतिक समझ को भी दर्शाता है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर की मुलाकातें इसी गहरे होते रिश्ते का संकेत देती हैं।
पाकिस्तान की रणनीति स्पष्ट दिखती है। एक ओर वह आर्थिक संकट से जूझ रहा है, दूसरी ओर वह अपने रक्षा क्षेत्र को निर्यात आधारित मॉडल के रूप में पेश कर रहा है। अरब देशों की बड़ी सैन्य जरूरतें और उनकी विशाल वित्तीय क्षमता पाकिस्तान के लिए एक अवसर के रूप में देखी जा रही हैं। इसी कड़ी में सूडान जैसे देशों के साथ अरबों डॉलर के हथियार सौदों पर बातचीत की खबरें सामने आई हैं।
सूडान लंबे समय से आंतरिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता रहा है। ऐसे देशों के लिए अपेक्षाकृत सस्ते और परिचालन में आसान हथियार आकर्षक होते हैं। पाकिस्तान इसी जरूरत को भुनाने की कोशिश कर रहा है। JF-17 जैसे फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों को वह एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में पेश कर रहा है।
यहां यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान का रक्षा उद्योग पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। चीन की भूमिका इसमें निर्णायक है। तकनीक, डिजाइन और कई महत्वपूर्ण कलपुर्जों के लिए पाकिस्तान आज भी चीन पर निर्भर है। लेकिन वैश्विक बाजार में यह साझेदारी “मेड इन पाकिस्तान” के नाम से प्रस्तुत की जा रही है। इससे पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
इसी पूरे परिदृश्य के बीच “इस्लामिक NATO” की अवधारणा सामने आती है। पाकिस्तान लंबे समय से मुस्लिम देशों के एक ऐसे सैन्य गठबंधन की बात करता रहा है, जो पश्चिमी NATO की तर्ज पर काम करे। इस विचार में पाकिस्तान खुद को एक केंद्रीय भूमिका में देखता है। शुरुआती रूप में इस गठबंधन में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों की कल्पना की जा रही है।
तुर्की के साथ पाकिस्तान के सैन्य संबंध भी हाल के वर्षों में मजबूत हुए हैं। ड्रोन तकनीक, नौसैनिक सहयोग और संयुक्त अभ्यास इस साझेदारी का हिस्सा रहे हैं। सऊदी अरब की वित्तीय शक्ति, तुर्की की सैन्य तकनीक और पाकिस्तान की सेना को मिलाकर एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश दिखाई देती है, जो मुस्लिम दुनिया में एक सामूहिक सैन्य पहचान बना सके।
हालांकि इस विचार के रास्ते में कई व्यावहारिक और राजनीतिक अड़चनें भी हैं। मुस्लिम देशों के आपसी मतभेद, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और अलग-अलग वैश्विक झुकाव किसी भी ऐसे गठबंधन को जटिल बना देते हैं। फिर भी पाकिस्तान की कोशिश यह दर्शाती है कि वह खुद को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया में एक सैन्य नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
भारत के लिए यह परिदृश्य स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय माना जा रहा है। दक्षिण एशिया में पहले से मौजूद तनाव के बीच पाकिस्तान का अरब देशों में सैन्य प्रभाव बढ़ाना रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। खासकर तब, जब ये देश आर्थिक और कूटनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह सक्रियता केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक भी है। हथियार सौदे केवल व्यापार नहीं होते, वे दीर्घकालिक संबंध और निर्भरता भी पैदा करते हैं। प्रशिक्षण, रखरखाव और तकनीकी सहायता के जरिए पाकिस्तान इन देशों में अपनी स्थायी मौजूदगी बनाना चाहता है।
इसके साथ ही पाकिस्तान की सेना के भीतर यह धारणा भी मजबूत होती दिख रही है कि रक्षा निर्यात देश की अर्थव्यवस्था को संभालने का एक साधन बन सकता है। विदेशी मुद्रा की कमी, कर्ज और IMF जैसे संस्थानों पर निर्भरता से निकलने की चाह इस सोच को और बल देती है।
हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियां इस महत्वाकांक्षा के रास्ते में बड़ी बाधा हैं। एक तरफ देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है, दूसरी तरफ वैश्विक मंच पर खुद को एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करना आसान नहीं है।
फिर भी अरब दुनिया में पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सऊदी अरब, सूडान और अन्य मुस्लिम देशों के साथ बढ़ते रक्षा संपर्क यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में पाकिस्तान इस क्षेत्र में और सक्रिय हो सकता है।
यह पूरी कहानी केवल हथियार सौदों या सैन्य गठबंधन तक सीमित नहीं है। यह उस बदलते वैश्विक परिदृश्य का हिस्सा है, जहां उभरती और मध्यम शक्तियां अपने लिए नई भूमिकाएं तलाश रही हैं। पाकिस्तान भी इसी दौड़ में शामिल है, जहां वह चीन के सहयोग से मुस्लिम दुनिया में अपने लिए एक नई पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहा है।
