विश्व राजनीति के मंच पर रूस की जी-8 में वापसी की चर्चा ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया है। इस विषय ने वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक रणनीति पर नए सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस साल जून में कनाडा में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में कहा कि 2014 में रूस को जी-8 से बाहर करना एक बड़ी गलती थी। उनके अनुसार यदि रूस उस समय जी-8 में होता, तो यूक्रेन युद्ध नहीं होता।

रूस ने ट्रम्प की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि वर्तमान विश्व में जी-7 जैसे समूह का कोई ठोस अर्थ नहीं है। ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि यदि रूस जी-7 में शामिल होता तो देश के सामने दुश्मन को सीधे वार्ता में देखना संभव होता और यूक्रेन में युद्ध जैसी घटनाएं नहीं होतीं।
जी-8 और रूस का इतिहास
जी-8 समूह में रूस की भूमिका और इतिहास महत्वपूर्ण है। 1975 में स्थापित जी-7 समूह में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, अमेरिका, फ्रांस और जापान शामिल थे। 1997 में रूस के शामिल होने के बाद समूह जी-8 के रूप में विकसित हुआ। 2014 में रूस ने यूक्रेन के क्राइमिया पर कब्ज़ा किया और इसके जवाब में उसे समूह से बाहर कर दिया गया। तब से यह समूह जी-7 के प्रारूप में वापस आ गया।
रूस की संभावित वापसी की चर्चा अब इसलिए उठी है क्योंकि यूक्रेन पर रूस का नियंत्रण पुनः बढ़ चुका है और वैश्विक शांति के लिए समझौते की संभावना तलाशी जा रही है। ट्रम्प की यूक्रेन पर 28-सूत्रीय योजना के अनुसार रूस को जी-8 में लौटाने के प्रस्ताव के साथ उसके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की बात की गई है। इस योजना में रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्रों की मान्यता और आर्थिक, तकनीकी और ऊर्जा सहयोग शामिल है।
पुतिन का पश्चिम के साथ दृष्टिकोण
पुतिन ने सत्ता संभालने के प्रारंभिक वर्षों में पश्चिम विरोधी रुख नहीं अपनाया था। 2000 में राष्ट्रपति बनने के समय पुतिन ने अमेरिका और यूरोप के साथ सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाए। उन्होंने यूरोप की संस्कृति और राजनीतिक ढांचे को रूस का हिस्सा माना और नेटो को शुरू में प्रतिद्वंद्वी नहीं माना।
लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस के हितों के खिलाफ कदम उठाए, जैसे 1999 में युगोस्लाविया पर बमबारी, एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि से अलग होना और नेटो का विस्तार, रूस में अमेरिका विरोधी मानसिकता बढ़ी। पुतिन ने धीरे-धीरे पश्चिम विरोधी रुख अपनाया।
वैश्विक प्रभाव और यूरोपीय दृष्टिकोण
रूस की जी-8 में वापसी का वैश्विक प्रभाव व्यापक होगा। यूरोप और अमेरिका को इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया है। जर्मन चांसलर ने कहा कि फिलहाल यह संभव नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकार मानते हैं कि रूस की मौजूदगी समूह के भीतर विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है और अन्य सदस्य देशों के निर्णयों पर संतुलन बनाने में मदद कर सकती है।
विशेषज्ञ स्टैनली जॉनी का कहना है कि अगर ट्रम्प की योजना अपनाई जाती है, तो रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्रों को मान्यता मिलेगी, यूक्रेन की सैन्य क्षमता सीमित होगी और नेटो में शामिल होने की उसकी इच्छा समाप्त होगी। इस स्थिति में यूरोप और यूक्रेन एक असंतुलित स्थिति में रहेंगे।
रूस और अमेरिका के बीच सहयोग
रूस की जी-8 में वापसी से अमेरिका और रूस के बीच आर्थिक, तकनीकी, ऊर्जा और खनिज साझेदारी की संभावना बढ़ेगी। ट्रम्प की योजना के अनुसार रूस को चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंधों से मुक्त किया जाएगा। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा संसाधनों और वैश्विक रणनीति में नई गतिशीलता पैदा करेगा।
रूस और नेटो के संबंध
नेटो का विस्तार रूस के पड़ोसियों तक पहुंच चुका है। रूस ने हमेशा इसे अपनी सुरक्षा के लिए चुनौती माना है। पुतिन सत्ता में आने से पहले अमेरिका और पश्चिम के प्रति रूचि रखते थे, लेकिन समय के साथ उनकी दृष्टि बदल गई। रूस के जनता में अमेरिका विरोधी रुझान 1990 के दशक में बढ़ने लगे।
लेवाडा सेंटर के सर्वे अनुसार, 1990 के दशक की शुरुआत में अधिकांश रूसी अमेरिका को एक रोल मॉडल और महाशक्ति के रूप में देखते थे। लेकिन अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय कार्रवाइयों ने इस दृष्टिकोण में बदलाव किया।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक महत्व
रूस की जी-8 में वापसी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक शक्ति संतुलन और शांति प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। समूह में रूस की मौजूदगी विरोधी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है और अन्य सदस्यों के निर्णयों पर संतुलन बनाती है। यह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को प्रभावित कर सकती है।
