सऊदी अरब ने 2025 में अपने इतिहास का सबसे भयावह रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इस साल अब तक 340 लोगों को फांसी दी जा चुकी है, जो 2024 के 338 मामलों के रिकॉर्ड को भी पार कर गया है। सऊदी गृह मंत्रालय ने हाल ही में पुष्टि की कि मक्का में सोमवार को तीन व्यक्तियों को हत्या के आरोप में फांसी दी गई। इस आंकड़े ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों और मानवाधिकार संरक्षणकर्ताओं में गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

सऊदी अरब में मौत की सजा के मामलों में अधिकांश लोग ड्रग्स संबंधित अपराधों में फंसे हुए थे। 340 में से 232 लोगों को इसी श्रेणी में मौत की सजा दी गई। मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार मौत की सजा केवल गंभीर अपराधों तक ही सीमित होनी चाहिए, जैसे जानबूझकर हत्या। लेकिन सऊदी अरब इस सीमा को लगातार पार कर रहा है। आतंकवाद के आरोपों में भी कई लोगों को मौत के घाट उतारा गया, जिसमें कई मामलों में आरोप अस्पष्ट और अत्यंत व्यापक कानूनों के तहत लगाए गए थे।
नाबालिग और विदेशी नागरिकों पर फांसी
सऊदी अरब में हाल के महीनों में दो ऐसे व्यक्तियों को भी फांसी दी गई, जो कथित अपराध के समय नाबालिग थे। यह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि का स्पष्ट उल्लंघन है, जिस पर सऊदी अरब स्वयं हस्ताक्षरकर्ता है। 2020 में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद सरकार ने दावा किया था कि नाबालिगों को मौत की सजा नहीं दी जाएगी। बावजूद इसके, हाल के महीनों में यह मामला सामने आया। ब्रिटेन स्थित मानवाधिकार संगठन Alqst का कहना है कि कम से कम पांच और ऐसे कैदी हैं, जिन्हें नाबालिग अपराधों के बावजूद कभी भी फांसी दी जा सकती है।
फांसी पाने वालों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है, विशेषकर ड्रग्स मामलों में। 2022 के अंत में सऊदी अरब ने ड्रग्स मामलों में फांसी की पुनः शुरुआत की थी, जिसे तीन साल के लिए रोका गया था।
मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
मानवाधिकार संगठन Alqst की शोधकर्ता नदीयीन अब्दुलअजीज ने कहा कि सऊदी अरब का यह रवैया जिंदगी के अधिकार के प्रति ‘निर्दयी और खतरनाक अनदेखी’ को दर्शाता है। उनके अनुसार कई मामलों में कैदियों से यातना द्वारा कबूलनामे लिए गए, खामियों से भरे ट्रायल हुए और फिर मौत की सजा दी गई।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, चीन और ईरान के बाद सऊदी अरब दुनिया में लगातार तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा फांसी देने वाले देशों में शामिल है। 2025 के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि यह स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और जीवन का अधिकार
मौत की सजा के मामलों में नाबालिग और विदेशी नागरिकों को शामिल करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि और अन्य मानवाधिकार समझौतों के अनुसार, नाबालिग अपराधियों को फांसी नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद, सऊदी अरब ने इस प्रतिबंध का उल्लंघन किया है।
मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब की न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। कई मामलों में आरोपों की पुष्टि अस्पष्ट रही, कैदियों को उचित कानूनी सुरक्षा नहीं मिली और यातना से कबूलनामे लिए गए। यह सभी कार्रवाई जीवन के मौलिक अधिकार के खिलाफ है।
ड्रग्स और आतंकवाद के मामले
सऊदी अरब में मौत की सजा के मामलों में सबसे ज्यादा संख्या ड्रग्स से संबंधित अपराधों में है। 232 लोगों को इसी अपराध में फांसी दी गई। इसके अलावा आतंकवाद और हत्या के आरोप में भी कई लोग मौत की सजा भुगत चुके हैं। कुछ मामलों में आरोप अस्पष्ट और व्यापक कानूनों के तहत लगाए गए, जिससे न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मृत्युदंड का दुरुपयोग न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और मानवाधिकार संरक्षण के सिद्धांतों के खिलाफ जाता है।
सऊदी अरब की न्याय प्रणाली की आलोचना
सऊदी अरब की न्याय प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार आलोचना कर रहे हैं। कई मामलों में ट्रायल में कानूनी खामियां रही हैं और आरोपी को उचित कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिला। Alqst और अन्य संगठनों ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि सऊदी अरब का यह रवैया दुनिया में जीवन के अधिकार के प्रति गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
2025 में सऊदी अरब ने मौत की सजा का नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। यह रिकॉर्ड केवल संख्या में नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया की पारदर्शिता और मानवाधिकार उल्लंघनों में भी अभूतपूर्व है। नाबालिग और विदेशी नागरिकों पर फांसी, यातना से कबूलनामे और अस्पष्ट आरोप यह स्पष्ट करते हैं कि देश में मृत्युदंड का दुरुपयोग हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह चुनौती है कि सऊदी अरब जैसे देशों में न्याय और मानवाधिकार के संरक्षण के लिए प्रभावी दबाव बनाए।
