सऊदी अरब और इजरायल — दो ऐसे देश जो दशकों से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहे हैं। एक तरफ इस्लाम का जन्मस्थान और अरब दुनिया का प्रभावशाली नेतृत्वकर्ता सऊदी अरब है, तो दूसरी तरफ यहूदी राज्य इजरायल, जिसके साथ अरब देशों का संघर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज है। लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि हालात बदल रहे हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के अमेरिका दौरे से पहले ही सऊदी अरब ने ऐसा बड़ा बयान दिया है जिसने पूरी दुनिया की नजरें खींच ली हैं।

अमेरिका दौरे से पहले बड़ा ऐलान
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस महीने अमेरिका का औपचारिक दौरा करने जा रहे हैं। यह यात्रा सिर्फ एक कूटनीतिक कदम नहीं बल्कि मध्य पूर्व की राजनीति में भूचाल ला सकती है। ऐसा माना जा रहा है कि सऊदी अरब अब्राहम समझौते (Abraham Accords) पर हस्ताक्षर कर सकता है — यानी इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को सामान्य कर सकता है।
हालांकि, रियाद ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया है कि ऐसा कदम तभी संभव होगा जब फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा देने की दिशा में ठोस रोडमैप तैयार किया जाए।
अब्राहम समझौते की पृष्ठभूमि
2020 में अब्राहम समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को ने इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। इस समझौते का उद्देश्य था — मध्य पूर्व में स्थिरता, व्यापारिक सहयोग और आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई को मजबूत करना। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया था। अब ट्रंप की नजर सऊदी अरब पर है — क्योंकि अगर सऊदी अरब जैसे शक्तिशाली मुस्लिम देश ने इजरायल को मान्यता दी, तो यह पूरे इस्लामी जगत की सोच को बदल सकता है।
ट्रंप और मोहम्मद बिन सलमान की मुलाकात
ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब पर लंबे समय से दबाव डालता रहा है कि वह इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करे। मोहम्मद बिन सलमान और ट्रंप की मुलाकात 18 नवंबर को वाशिंगटन में होने वाली है। कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि यह मुलाकात सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं होगी — यह तय करेगी कि आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व का राजनीतिक नक्शा कैसा दिखेगा।
फिलिस्तीन का मुद्दा बना मुख्य बाधा
सऊदी अरब का रुख फिलहाल साफ है — “जब तक फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए स्पष्ट योजना नहीं बनेगी, तब तक अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होंगे।”
रियाद की इस स्थिति का कारण सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थल — मक्का और मदीना — सऊदी अरब में हैं। ऐसे में, अगर सऊदी अरब ने इजरायल को मान्यता दी, तो यह अरब और मुस्लिम दुनिया में एक बड़ा राजनीतिक और धार्मिक तूफान पैदा कर सकता है।
गाजा युद्ध का असर
7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में इजरायल पर हुआ हमला और उसके बाद का युद्ध — इस क्षेत्र में तनाव को नई ऊंचाई पर ले गया।
गाजा में हुए इजरायली हमलों ने अरब जनता के बीच गुस्सा बढ़ा दिया। ऐसे माहौल में, सऊदी अरब अगर इजरायल के साथ समझौता करता है, तो उसे अपने ही लोगों और मुस्लिम देशों की आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।
सऊदी की रणनीति — “संतुलन का रास्ता”
सऊदी अरब आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अपने दो बड़े हितों में संतुलन बनाना है —
- अमेरिका और पश्चिमी देशों से गहरे रणनीतिक रिश्ते
- अरब दुनिया और मुस्लिम उम्माह की भावनाएं
मोहम्मद बिन सलमान इस द्वंद्व को बड़ी कुशलता से संभालने की कोशिश कर रहे हैं। वह अमेरिका को यह दिखाना चाहते हैं कि सऊदी एक आधुनिक, प्रगतिशील देश है जो क्षेत्रीय शांति के लिए तैयार है। लेकिन साथ ही वह यह भी नहीं चाहते कि मुस्लिम दुनिया उन्हें “इजरायल समर्थक” या “फिलिस्तीन विरोधी” समझे।
खशोगी हत्याकांड की छाया
यह यात्रा इसलिए भी खास है क्योंकि यह जमाल खशोगी हत्या कांड के बाद MBS की पहली वाशिंगटन यात्रा है। 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सऊदी की छवि को भारी नुकसान हुआ था। अब MBS इस यात्रा के जरिए अपने आप को एक “वैश्विक नेता” के रूप में पुनर्स्थापित करना चाहते हैं।
सऊदी की ‘विजन 2030’ और अमेरिका का समर्थन
MBS की सबसे बड़ी परियोजना — विजन 2030, जिसके तहत सऊदी को तेल-निर्भर अर्थव्यवस्था से हटाकर एक आधुनिक, विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था में बदलना है। इसके लिए उन्हें अमेरिका और पश्चिमी निवेश की जरूरत है। इसलिए, अमेरिका से रिश्ते मजबूत करना उनके लिए रणनीतिक रूप से बेहद आवश्यक है।
अगर सऊदी ने इजरायल को मान्यता दी तो क्या होगा?
- मध्य पूर्व में नया पावर बैलेंस बनेगा।
- ईरान और सऊदी के बीच तनाव बढ़ सकता है।
- अरब लीग के कई अन्य देश भी इजरायल से संबंधों को सामान्य कर सकते हैं।
- फिलिस्तीन पर दबाव बढ़ेगा कि वह शांति समझौते के लिए तैयार हो।
- अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र में और मजबूत होगा।
नतीजा — “नया मध्य पूर्व” या “पुरानी दुश्मनी की नई कहानी”?
मध्य पूर्व आज एक ऐसे मोड़ पर है जहां हर निर्णय इतिहास रच सकता है। अगर सऊदी अरब और इजरायल के बीच शांति समझौता होता है, तो यह न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक राजनीति को बदल देगा। लेकिन अगर यह कदम बिना फिलिस्तीन के समाधान के उठाया गया, तो यह पूरे मुस्लिम जगत में असंतोष का ज्वालामुखी भी भड़का सकता है। मोहम्मद बिन सलमान इस चुनौती को अपने तरीके से संभालने की कोशिश में हैं — जहाँ आधुनिकता, धर्म, और कूटनीति का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा।
