सुगम्य इंदौर अभियान ने शहर के सरकारी और निजी भवनों की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इंदौर को देश के सबसे व्यवस्थित और आधुनिक शहरों में गिना जाता है, लेकिन जब बात दिव्यांगजनों की पहुंच और सुविधा की आती है, तो वास्तविकता बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। प्रशासन द्वारा शुरू किए गए इस विशेष अभियान में अब तक 188 भवनों की जांच की गई और परिणाम बताते हैं कि बड़ी संख्या में दफ्तर अब भी बुनियादी सुगम्यता मानकों से बहुत दूर हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 121 भवनों में लिफ्ट नहीं मिली, 60 भवनों में रैंप का अभाव था और 93 स्थानों पर व्हीलचेयर तक उपलब्ध नहीं थी। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन हजारों लोगों की रोजमर्रा की मुश्किलों का प्रतिबिंब हैं, जो हर दिन सरकारी कार्यालयों, संस्थानों और सेवाओं तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं। शहर में 70 हजार से अधिक दिव्यांगजन हैं, लेकिन उनके लिए व्यवस्था अब भी प्राथमिकता नहीं बन पाई है।
दिव्यांगों की राह क्यों कठिन
जब कोई व्यक्ति व्हीलचेयर पर निर्भर हो, दृष्टिबाधित हो या श्रवणबाधित हो, तब एक सीढ़ी, एक संकरा दरवाजा या बिना संकेत वाला गलियारा भी बड़ी बाधा बन जाता है। आम नागरिक जिन रास्तों से सहजता से गुजर जाते हैं, वही रास्ते दिव्यांगजनों के लिए असमानता का प्रतीक बन जाते हैं। सुगम्य इंदौर अभियान ने इसी असमानता को सार्वजनिक रूप से सामने रखा है।
सरकारी भवनों का उद्देश्य नागरिक सेवा है, लेकिन यदि वहां तक पहुंचना ही मुश्किल हो, तो सेवा का अधिकार अधूरा रह जाता है। कई दिव्यांग नागरिकों ने लंबे समय से शिकायत की थी कि कार्यालयों में न तो पर्याप्त रैंप हैं, न ही आरक्षित पार्किंग और न ही शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं। अब प्रशासनिक ऑडिट ने इन शिकायतों को तथ्य के रूप में प्रमाणित कर दिया है।
188 भवनों का बड़ा ऑडिट
सुगम्य इंदौर अभियान के तहत 20 अलग-अलग टीमें बनाई गईं, जिन्हें शहर के विभिन्न सरकारी और निजी भवनों का निरीक्षण सौंपा गया। इन टीमों को निर्देश दिया गया कि वे केवल सतही जांच न करें, बल्कि प्रवेश, निकास, रैंप की ढलान, लिफ्ट, शौचालय, ब्रेल साइन बोर्ड, व्हीलचेयर और पार्किंग जैसी सुविधाओं का विस्तृत मूल्यांकन करें।
अब तक जनपद पंचायत, नगर निगम, पुलिस विभाग, पोस्ट ऑफिस, मेडिकल कॉलेज, निजी कॉलेज, होटल, बैंकिंग संस्थान, औद्योगिक विभाग और कई अन्य कार्यालयों की जांच हो चुकी है। यह केवल प्रारंभिक रिपोर्ट है और जांच अभी जारी है। अंतिम रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
जिला पंचायत में बड़ी कमी
जिला पंचायत के अधीन आने वाले भवनों में सबसे अधिक निरीक्षण हुआ और सबसे ज्यादा कमियां भी यहीं सामने आईं। कई भवनों में दिव्यांग पार्किंग नहीं थी, बड़ी संख्या में व्हीलचेयर उपलब्ध नहीं थी और रैंप तथा लिफ्ट जैसी सुविधाएं भी अधूरी मिलीं। कई स्थानों पर दिव्यांग अनुकूल शौचालय भी नहीं पाए गए।
यह स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि जिला पंचायत से जुड़े भवनों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोग बड़ी संख्या में आते हैं। यदि यहां पहुंच आसान नहीं होगी, तो सबसे अधिक प्रभावित वही लोग होंगे जिन्हें पहले से ही अतिरिक्त सहारे की जरूरत है।
डाक विभाग की गंभीर हालत
सुगम्य इंदौर अभियान में डाक विभाग के भवनों की जांच ने भी चिंताजनक तस्वीर पेश की। अधिकांश भवनों में दिव्यांगों के लिए पार्किंग नहीं थी, व्हीलचेयर लगभग हर स्थान पर अनुपस्थित मिली और लिफ्ट व रैंप की स्थिति भी बेहद कमजोर रही। दिव्यांग अनुकूल शौचालय का अभाव लगभग पूर्ण रूप से देखा गया।
डाकघर अब केवल पत्र भेजने का स्थान नहीं, बल्कि बैंकिंग और सरकारी सेवाओं का भी केंद्र बन चुके हैं। ऐसे में इन भवनों का असुगम्य होना सीधे तौर पर हजारों नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करता है। सुविधा का अभाव यहां सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार जैसा अनुभव बन जाता है।
पुलिस और राजस्व विभाग
पुलिस विभाग और राजस्व विभाग के भवनों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही। पुलिस थानों और राजस्व कार्यालयों में रैंप, लिफ्ट और दिव्यांग पार्किंग जैसी सुविधाओं की भारी कमी सामने आई। यह विडंबना है कि जिन विभागों का काम नागरिक सहायता और प्रशासनिक न्याय सुनिश्चित करना है, वहीं तक पहुंचना कई लोगों के लिए सबसे कठिन है।
किसी व्यक्ति को यदि प्रमाण पत्र, शिकायत या कानूनी सहायता के लिए बार-बार कार्यालय जाना पड़े और हर बार सीढ़ियां और असुविधाएं सामने आएं, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं बल्कि संवेदनशीलता की कमी भी है। सुगम्य इंदौर अभियान ने इस पहलू को बहुत स्पष्ट कर दिया है।
उद्योग विभाग की बेहतर तस्वीर
जहां कई विभागों में गंभीर खामियां मिलीं, वहीं उद्योग विभाग के कुछ भवन अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में पाए गए। यहां रैंप, व्हीलचेयर, लिफ्ट और शौचालय जैसी सुविधाएं कई स्थानों पर उपलब्ध थीं। हालांकि दिव्यांगों के लिए अलग पार्किंग की कमी यहां भी सामने आई।
यह उदाहरण बताता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो व्यवस्था संभव है। समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि प्राथमिकता की है। कुछ विभागों ने इसे गंभीरता से लिया और परिणाम बेहतर दिखे, जबकि अन्य विभाग अब भी पुराने ढांचे और उपेक्षा में फंसे हुए हैं।
जांच में क्या देखा गया
सुगम्य इंदौर अभियान के तहत केवल यह नहीं देखा गया कि रैंप है या नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी जांची गई। क्या रैंप की ढलान मानक के अनुसार है, क्या दोनों ओर रेलिंग मौजूद है, क्या प्रवेश द्वार पर्याप्त चौड़ा है—इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखा गया।
दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल सूचना बोर्ड, ध्वनि संकेत और पथदर्शक ब्लॉक की भी जांच की गई। श्रवणबाधितों के लिए दृश्य संकेतक और सूचना बोर्ड की उपलब्धता को परखा गया। यानी यह केवल दिखावे की जांच नहीं, बल्कि वास्तविक उपयोगिता का परीक्षण था। यही इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
70 हजार लोगों की उम्मीद
इंदौर में 70 हजार से अधिक दिव्यांगजन विभिन्न आयु वर्गों में रहते हैं। इनमें छात्र, नौकरीपेशा लोग, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सभी शामिल हैं। उनके लिए शहर की संरचना केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वतंत्र जीवन का आधार है। यदि वे किसी दफ्तर, अस्पताल या कॉलेज तक आसानी से नहीं पहुंच सकते, तो उनका आत्मविश्वास और अवसर दोनों प्रभावित होते हैं।
सुगम्य इंदौर अभियान इन लोगों के लिए केवल सरकारी पहल नहीं, बल्कि सम्मान और समानता की उम्मीद है। वे चाहते हैं कि शहर उन्हें विशेष नहीं, बल्कि समान नागरिक के रूप में देखे। यही किसी भी आधुनिक शहर की असली पहचान होनी चाहिए।
कानून और वास्तविकता का अंतर
देश में दिव्यांगजन अधिकार कानून और सुगम भारत अभियान जैसे कई प्रावधान पहले से मौजूद हैं। कागजों पर व्यवस्था मजबूत दिखाई देती है, लेकिन जमीन पर स्थिति अक्सर अलग मिलती है। इंदौर का यह ऑडिट उसी अंतर को उजागर करता है।
जब कानून कहता है कि सार्वजनिक भवनों में सुगम पहुंच अनिवार्य है, तब इतने बड़े पैमाने पर कमियां मिलना प्रशासनिक लापरवाही का संकेत है। यह केवल सुधार का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी प्रश्न है। आखिर इतने वर्षों तक यह स्थिति बनी कैसे रही?
आगे क्या होना चाहिए
सिर्फ रिपोर्ट बनाना पर्याप्त नहीं होगा। सुगम्य इंदौर अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब इन कमियों को समयबद्ध तरीके से दूर किया जाएगा। भवनों में रैंप, लिफ्ट, व्हीलचेयर और पार्किंग जैसी सुविधाओं को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। साथ ही नियमित निरीक्षण भी जरूरी है ताकि सुधार स्थायी बने रहें।
निजी संस्थानों को भी इस जिम्मेदारी से अलग नहीं रखा जा सकता। होटल, कॉलेज, बैंक और कॉर्पोरेट कार्यालय भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं। यदि शहर को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो हर इमारत को समान अवसर का स्थान बनाना होगा।
निष्कर्ष में असली सवाल
इंदौर स्वच्छता में कई बार देश का नंबर एक शहर बन चुका है, लेकिन क्या वह सुगम्यता में भी उदाहरण बन पाएगा? यही सबसे बड़ा सवाल है। विकास केवल चमकती सड़कों और ऊंची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से तय होता है कि सबसे कमजोर नागरिक वहां कितनी गरिमा से जी सकता है।
सुगम्य इंदौर अभियान ने शहर को आईना दिखाया है। अब यह प्रशासन, संस्थानों और समाज पर है कि वे इस आईने को नजरअंदाज करते हैं या बदलाव की शुरुआत करते हैं। क्योंकि किसी शहर की असली प्रगति वही है, जहां हर नागरिक बिना रुकावट, बिना डर और बिना भेदभाव के आगे बढ़ सके।
